जुगनू शारदेय
ली मैंने कसम ली , ली तुमने कसम ली – नहीं होंगे जुदा अपनी अक्लमंदी से ।
मेहरबान – कदरदान – खानदान – प्याज दान – सब्जी दान यानी दान ही दान कसम क्या चीज है कि खाई भी जाती है और ली भी जाती है । कसम दी भी जाती है ।ऐसा लगता है कि कसम कई घूसनुमा चीज है जिसका इस्तेमाल हर कहीं हो सकता है । यह मामूली चीज भी नहीं है । कितनी शान से कहा गया , मेरा वचन – गीता की कसम । यहां बात बहुत साफ है कि गीता की कसम सिर्फ अदालत में ही मान्य है । यह चुनाव में , प्रशासन में और असली हीराबाई राजनीति में मान्य नहीं है । हीराबाई के बारे में विशेष जानकारी के लिए पढ़िए फणीश्वरनाथ रेणु की कहानी मारे गए गुलफाम उर्फ अपने वक्त की फ्लॉप फिल्म तीसरी कसम । अब यहां यह जानकारी जरूरी है कि तीसरी कसम में ही गाना था कि ‘ सजन रे झूठ मत बोलो , खुदा के पास जाना है । ‘ अब सजन को किसी के पास नहीं जाना है ।
फिर भी झूठ नहीं बोलते हैं क्योंकि अब वह सजन नहीं , धनमन जी कहलाते हैं । अब झूठ बोलने पर कौवा भी नहीं काटता ,बल्कि कौवा कांव – कांव करता है । जैसे कांग्रेसी हुलहुल गांधी ने कह दिया कि गठजोड़ की राजनीति के कारण ही सरकार की परेशानी है ।
भइए , आप मालिक हो धनमन के , वारिस हो हीरा बाई के – हिम्मत है कि धनमन गठजोड़ की राजनीति करे । बेचारा तो जबरदस्ती फंसा है । वरना मस्त रहता विश्व बैंक के पेंशन से । छोटा परिवार है – सुखी परिवार है । बाल बच्चे सब रोजगार में लगे हैं । आपने फंसा रखा है दो दो कसम खिला कर धनमन को कि राजपाट चलाओ । इसका एक मतलब यह होता है कि तुम गाली खाओ – हम देश में कांव कांव करेंगे कि हमारी अकेली सरकार होती तो महंगाई रुक जाती ।
लीजिए , हमसे भी वही गलती हो गई जो धनमन से लगातार हो रही है कि महंगाई को रोकना है । धनमन के पास सांस्कारिक भ्रामकीय प्रशिक्षण होता या समाजवादीय जनदर्शन होता तो रोकने की बात नहीं करते । मिटाने या हटाने की बात करते । जैसे भ्रामकीय मन और समाजवादीय जनदर्शन का मन मोह लिया पिंजड़े वाली मुनिया है तो धनमन क्या करे । धनमन तो गाता रहता है कि जो मैं होता प्याज का बोरा बरस पड़ता वोटर तेरे अंगने में । जो मैं होता वोटर महंगाई की महंगिया तो कुहुक पड़ती तेरे अंगने में । पर धनमन को पता है कि वह कुछ भी नहीं है । बड़ा हीरा बाई के नाम पर शेखी मारेगा तो चार चपंडुक – पांच तबलची बैठ कर सारंगी रुदन सुनेंगे धनमन का और चाय पी ,हंसे – फोटो में दांत दिखाया और आज करै सो काल करै , जब सरकार चलेगी दो हजार चौदह को । हम बहुत संवेदनशील हैं । यूं समझिए कि महंगाई उम्र की तरह बढ़ती रहती है । यह दाढ़ी – मूँछ नहीं की छंटाई हो सके ।
धनमन इस बात को खूब समझता है । बहुत पहले उसने पहली कसम खाई थी कि कुछ नहीं करना है । किया तो वही किया जो हीरा बाई ने कहा कि भारत निर्माण कर दिया । अब इंडिया में महंगाई बढ़ गई तो मैं क्या करूं । दूसरी कसम भी धनमन ने खा ली कि किसी मामले में कुछ नहीं करना है । जो करना है मंत्रियों का समूह करे । अगर इसने कुछ नहीं किया तो मैं क्या करुं ।
तीसरी कसम धनमन खाने वाला नहींहै । दूसरी कसम तक ही जिंदा रहता है गुलाम । बाकी समझें हीरा बाई और हुलहुल गांधी ।