दूसरी पार्टी में दिखी जमीं तो अपनी पार्टी में दिखने लगी कमी
दूसरी पार्टी में दिखी जमीं तो अपनी पार्टी में दिखने लगी कमी
अंशुल तिवारी
मैनपुरी। विधान सभा चुनाव के लिये प्रत्याशियों की घोषणा के साथ ही नेताओं की दलगत आस्था भी डगमगाने लगी है। जिस पार्टी के लिये अभी तक राजनीति कर रहे थे उसी पार्टी में कमियां निकाल नेता अपने नये ठिकानों की तलाश में निकल पडे हैं। कुछ को ठिकाना मिल चुका है तो कुछ संभावित ठिकाने में राजनीतिक लाभ की समीक्षा करने मंे जुटे हैं।
समाजवादी पार्टी द्वारा सदर सीट के लिये विधान सभा प्रत्याशी पद की घोषणा के साथ ही समाजवादी पार्टी के कई दिग्गज नेताओं ने जब बगावत की कोशिश की तो उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। पार्टी से निष्कासित दिग्गज नेताओं ने मैनपुरी बचाओ संघर्ष समिति का गठन कर सपा के विरूद्ध चुनाव मैदान में आने का ऐलान कर दिया है।
चुनावी दिनों में नेताओं के दल बदलने का ये किस्सा नया नहीं है। वर्ष 2004 के चुनावों में भी जनपद के वरिष्ठ नेताओं ने कपडों की तरह दल बदले थे। बलराम सिंह यादव ने अपने पुत्र अजय यादव को टिकिट न मिलने पर समाजवादी पार्टी से तब नाता तोडा था जब वह इसी संसदीय क्षेत्र से सपा संासद थे। हालांकि उन्होंने न तो सांसद पद से इस्तीफा दिया था और न ही समाजवादी पार्टी ने उन्हें निकाला। सपा संासद के रूप में बलराम सिंह यादव जाने वाले मैनपुरी की सदर सीट से जब विधान सभा प्रत्याशी के तौर पर युवा नेता राजू यादव के नाम की घोषणा हुई तो सपा के कई दिग्गज नेताओं की दलगत आस्था डगमगा गई। राजू यादव के नाम की घोषणा के साथ ही समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता के.सी.यादव, पूर्व विधायक उर्मिला यादव, ललित प्रताप यादव समेत सपा में जल्दी में शामिल हुये कई नेता भी बगावत पर उतर आये जिसके बदले में सपा मुखिया ने बगावत करने वालों को बाहर का रास्ता दिखा दिया।
सपा से निष्कासन के बाद दिग्गज नेताओं ने मैनपुरी बचाओ संघर्ष समिति का गठन कर डाला और भाजपाई नाव में सवारी की और बाद में भाजपा के टिकिट पर लोकसभा चुनाव में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव से मुकाबला किया। यही नहीं जनपद में भाजपा का बजूद बनाने वाले रामबाबू कुशवाह ने भी 2004 के चुनाव में भाजपा को अलविदा कह समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया था। लेकिन सपा से उनकी दोस्ती लंबी नहीं चली और 2004 के ही उप चुनाव में वे फिर भाजपा में लौट आये और भाजपा के लोकसभा चुनाव में उम्मीदवार भी बने।
पिछले विधान सभा चुनाव में करहल से टिकिट न मिलने पर सपा छोडकर कांग्रेस में शामिल हुये एसपीएस यादव को कांग्रेस ने हाथों हाथ लेकर प्रदेश महासचिव बनाया। वहीं लगातार दो बार मैनपुरी सदर सीट से भाजपा विधायक अशोक चैहान भी भाजपा से मोहभंग होने के बाद हाथी पर सवार हो गये हैं।
वर्ष 2012 के विधान सभा चुनाव की सरगर्मियां तेज होते ही एक बार फिर नेताओं के दल बदलने का दौर शुरू हो गया है। समाजवादी पार्टी का गढ कहे आगामी विधान सभा चुनाव में चारों विधान सभाओं से प्रत्याशियों को चुनाव मैदान में उतारने की घोषणा कर दी है। कुछ समय पहले जो नेता सपा की उपलब्धियों को गिनाते नहीं थकते थे उन्हीं को अब पार्टी में दोष नजर आने लगा है और वह जनता को पार्टी की कमियां गिना रहे हैं। वहीं पहले ही सपा से दूरी बनाकर बसपा का दामन थामने वाले सुजान सिंह यादव भी यादव समाज के दूसरे गुट घोसी समाज को अपना पुरजोर समर्थन दे रहे हैं। पंचायत चुनाव के दौरान सपा में शामिल हुये पप्पू चैधरी ने भी घोसी समाज के कई कार्यकर्ताआंे और नेताओं के साथ कांग्रेस का हाथ थाम लिया है। साथ ही सपा, बसपा और भाजपा के कई वरिष्ठ और छुटभैये नेता जिनको अपनी पार्टियांे में अपना हित नजर नहीं आ रहा था उन्होंने कांग्रेस के हाथ को इस उम्मीद के साथ थामा है कि शायद उन्हें कांग्रेस में मनचाहा मान-सम्मान मिल सके। अब देखना यह है कि पार्टी से दलगत आस्था डगमगाने वालों को दल बदलने के बाद कितना लाभ मिल पाता है।


