दो सौ सात फुट की ऊंचाई पे तिरंगा और राष्ट्रीय शर्म
दो सौ सात फुट की ऊंचाई पे तिरंगा और राष्ट्रीय शर्म
हम अपने तिरंगे झंडे को सात फुट से दो सौ सात फुट ऊँचा ले जाने की तैयारी में लग गए हैं, उसी अनुपात में हमारी राष्ट्रीय शर्म भी सतह से दो सौ सात फुट नीचे चली गयी है....
वर्ष दो हज़ार सात के गुर्जर आंदोलन में हिंसा और आगजनी का हाल देख सुप्रीम कोर्ट ने उसे राष्ट्रीय शर्म का नाम दिया था... नौ साल बाद हम राष्ट्रीय शर्म की पता नहीं कितनी निचाइयो में पहुँच गए हैं .....
आरक्षण के नाम पर हमने एक मरी चुहिया की खाल में भुस भर कर रखा हुआ है..... जब तब उसे हांडी से निकाल कर दरवज्जे पर टांग दिया जाता है और जितने दिन वो चौखट पर टंगी रहती है दस से बीस हज़ार करोड़ का वारा न्यारा हो जाता है .... दसियों ज़िंदा इंसान लाशों में तब्दील हो जाते हैं .... न जाने कितनी ट्रेनें और वाहन फूँक दिए जाते हैं..... शहर और गाँव श्मशान सरीखे बन जाते हैं.... कई हज़ार घंटे ज़िंदगी ठहर जाती है.... तब सरकार को कुछ कर गुजरने का ख़याल आता है ....
आरक्षण रूपी प्लेग के देश के किसी भी हिस्से में फैलने का कोई समय तय नहीं है .....असल में आरक्षण के असली हकदार तो दलित ही थे..... बाद में कई जातियों को पिछड़ा वर्ग में लाकर उनको भी आरक्षण का लाभ दे दिया गया ... अब लंगर लगा कर आरक्षण बांटा जाता है...... होना तो ये चाहिए था कि समय सीमा तै कर आरक्षण बांटने का धंधा बंद कर दिया जाता ... लेकिन जब मामला वोट बैंक से जुड़ा हो तो भुस भरी चुहिया हरे पत्ते वाली मूली का काम देती है ... जिसको दिखा कर झौवा भर वोट तो हासिल हो ही जाते हैं..... जातियों की इस देश में कभी कोई कमी रहनी नहीं .... दो-चार सौ साल तो आराम से कट जाएंगे ....
बजट आने में अब कुछ ही दिन बचे हैं.... उसके लिए एक सुझाव अपन का भी है .... बजट पे पलने वाले मंत्रालयों में एक राष्ट्रीय शर्म मंत्रालय भी शामिल किया जाए .... इस मंत्रालय में सरकारी या गैर सरकारी दोनों कारणों से धन की बर्बादी का ब्यौरा शामिल किया जाए और इस विशेष मद के लिए कहाँ कहाँ से पैसा जुटाया जाना है, उन स्रोतों की खोज पर कुशलता से काम हो .... क्योंकि सरकार की बेवक़ूफ़ियाना हरकतें और हम भारतीयों की ठाठे मारती ज्वलंत भावना हर समय कुछ कर गुजरने को आमादा रहती है और यह बिना पैसे के संभव नहीं .....


