तीस्ता सीतलवाड़

क्या फ़ेसबुक नफ़रत फैलाने वालों के दबाव और इशारे पर काम करता है?
क्या लाइक और शिकायत के गणित के ज़रिये तय होगा कि समाज के हित में क्या है और क्या नहीं ?
यह सवाल उठ रहा है दिल्ली विश्वविद्यालय के अध्यापक और हिंदी के मार्क्सवादी आलोचक आशुतोष कुमार के साथ हुए सुलूक से।
फ़ेसबुक ने उन्हें 24 घंटे के लिए ब्लॉाक किया और हमेशा के लिए ब्लॉक करने की धमकी दी। उनकी ग़लती यह थी कि उन्होंने नफ़रत फैलाने वालों की कारग़ुज़ारियों का पर्दाफाश करते हुए एक पोस्ट लिखी थी।
ज़ाहिर है, नफ़रती गुंडों ने गिरोह बनाकर उनकी शिकायत की जिसकी वजह से फ़ेसबुक ने ऐसा किया। लेकिन क्या फ़ेसबुक के पास कोई संपादकीय नीति नहीं है जिससे सही-ग़लत का वह फ़ैसला कर सके। अगर नहीं, तो समझिये कि ज़ुकरबर्ग ने आज़ादी का मंच नहीं, धंधा खड़ा किया है जो आने वाले दिनों में लोगों को मानसिक ग़ुलाम बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाएगा।
पढ़िये ब्लॉक रहने के दौरान मीडिया विजिल के लिए क्या लिखा आशुतोष ने–

फेसबुक ने मुझे 24 घण्टे के लिए ब्लाक कर दिया है , और स्थायी रूप से ब्लाक करने की धमकी दी है ।