नया का नया
नया का नया
रिवायत है कि नया साल मुबारक कह दिया जाए – अब इस पर बहस हो सकती है कि कौन सा नया साल । किसम – किसम के , धरम-धरम के , परंपरा – परंपरा का भरा है नया साल । फिलहाल यह है गुलामी कॅलेंडर का नया साल । यही सरकारी ही नहीं सामजिक चलन में है । हिम्मत हो तो कहिए नहीं देता नया साल मुबारक ।
मुझमें पहले भी हिम्मत नहीं थी , आज भी नहीं है । अब किस में हिम्मत है कि देश के विदेश बिहार के निर्वहन कुमार का निमंत्रण ठुकराए कि नया साल के मौके पर मुख्य मंत्री आवास नुमा प्राचीर में जा कर निर्वहन कुमार का अभिनंदन न करे । बड़ा मजा आता है जी । यहां आज के दिन काफी नीरा राडिया नुमा जीव भी दिख जाते हैं । अगर मुख्य मंत्री ने मुस्करा दिया तो जीवन धन्य । नाम ले के पूछ लिया कि कैसे हो घोंघाप्रसाद वसंतलाल – तो हाय मैं कुरबान । निर्वहन कुमार नेकनाम हुआ , जनता तेरे लिए । नया साल खुले आम हुआ जनता तेरे लिए ।
घोंघाप्रसाद जी कितने चमचागिरी करेंगे निर्वहन कुमार की । थोड़ा बहुत बसंतलाल जी के लिए भी छोड़ दीजिए । विधान परिषद और राज्य सभा की सदस्यताअभी बहुत दूर है 2012 में । उस साल भी नया साल आएगा । कमबख्त नया साल न
हुआ महंगाई हो गई कि आती ही रहती है साल दर साल । रुठ गई इसी बात पर महंगाई माई कि पहले तो कीमत बढ़वाते हो , फिर मुझे डायन कहते हो । यह तो कहते नहीं कि कितने लोगों की मैं लक्ष्मी हूं । मरदुआ भ्रष्टाचार भइया को
तो बड़े बड़े लोगों का तमगा पहनाय देते हो । हम तो औरत जात इसलिए डायन का रुतबा थमा देते हो । गब्बर जी के बाप जब्बर जी भी इस पर कहते हैं कि बहुत नाइंसाफी है । जब्बर जी भी आज कल बहुत हलकान हैं । बिना बात के परेशान
हैं । ई जब्बर जी कौन हैं । अरे यार जब्बर जी , जब्बर जी होते हैं । कभी जिसकी लाठी उसकी भैंस होते थे , अब जिसका वोट उसका राजपाट होते हैं ।
राजपाट में भ्रष्टाचार खुले आम होता है अफसर के लिए ।
बसंतलाल जी काहे बदनाम करते हो अफसर लाल को – नेता जी पर चुपचाप हो । तो प्यारे लाल नेता जी पर का बोलें । उन पर बोले का काम नेता जी का ही है ।
उन पर मुन्नी यूं ही तो जी जान से बदनाम न हुई और शीला जो कहती है कि तेरे हाथ नहीं आनी । यह भी कोई बात है कि जिसे भी जी में आता है , नेता जी को गरियाता है । बंद करो नया साल में नेता जी को गरियाना ।
न्यायमुर्ति जी भी कोई कम नहीं हैं । उनको भी तो जमाने को दिखाना है ।
जनता जनार्दन जी भी किसी से कम नहीं हैं । जनता जनार्दन जी जो ठहरे ।
महंगाई डायन का भी मजा ले लेते हैं । भ्रष्टाचार भइया को सह भी लेते हैं
, कर भी लेते हैं । हर बात पर हंसते हैं , हर बात पर रोते हैं । पर कुछ नहीं करते हैं । इसमें कुछ मुसाफिर चंद्र भी होते हैं जो बेबस से नारा लगाते हैं जिंदा कौमें पांच साल इंतजार नहीं करती । सिनेमा में मन लगाते हैं । टीवी के रियलिटी शो में फंस जाते हैं । जनता जनार्दन जी नया साल
में कुछ नया का नया न हुआ तेरे लिए ।


