नरेंद्र मोदी-अमित शाह की भाजपा का चेहरा अब संगीत सोम होंगे
नरेंद्र मोदी-अमित शाह की भाजपा का चेहरा अब संगीत सोम होंगे
अमलेन्दु उपाध्याय
तो अब तय माना जाए कि भारतीय जनता पार्टी अब पूरी तरह नमोमय हो गई है और भाजपा से “अवाजो” (अडवाणी, वाजपेयी, मुरली मनोहर जोशी) युग की औपचारिक विदाई का शंखनाद हो गया है। भाजपा के नए अध्यक्ष अमित शाह ने पार्टी के संसदीय बोर्ड और चुनाव समिति का गठन (Formation of Parliamentary Board and Election Committee) कर दिया है। प्रमुख बात यह है कि अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी जैसे आधार स्तंभ नेताओं को संसदीय बोर्ड से अलग कर दिया गया है। उनके लिए एक मार्गदर्शक मंडल तैयार किया है जिसमें इन तीनों नेताओं के अलावा राजनाथ सिंह और नरेंद्र मोदी को भी रखा गया है।
दरअसल भाजपा का यह कायांतरण यूँ तो पार्टी का अंदरूनी मसला है, लेकिन यह भाजपा की भविष्य की राजनीति का संकेत भी है कि आने वाले दिनों में पार्टी का असली चरित्र क्या होगा। हालाँकि पार्टी जिस तरह से लीपा-पोती करके अटल, अडवाणी और मुलरी मनोहर जोशी के अपमान को ढँकने की जितना कोशिश कर रही है उतना ही उसके अंतर्विरोध खुलकर सामने आ रहे हैं।
अटल बिहारी वाजपेयी को लेकर तो पार्टी का तर्क हो सकता है कि वह अस्वस्थ हैं और सक्रिय राजनीति में नहीं हैं, लेकिन लाल कृष्ण अडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के संबंध में यह तर्क कारगर नहीं है। जब सन् 1980 में भारतीय जनता पार्टी अस्तित्व में आई थी उस समय पार्टी को दो चेहरे अटल बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण अडवाणी ही हुआ करते थे, 90 के दशक के शुरूआत में इसमें मुरली मनोहर जोशी का नाम और जुड़ा और भाजपा के त्रिदेव अवाजो जी की मूर्ति बनी।
अजब इत्तेफाक है कि जिस पार्टी को 34 वर्ष तक अडवाणी जी ने अपने पसीने से सींचा उस पार्टी ने नरेंद्र दामोदर भाई मोदी के प्रधानमंत्री बनने के ठीक तीन महीने बाद उन्हें दूध में से मक्खी का तरह निकाल फेंका।
राजनीति में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं, लेकिन ऐसा उदाहरण सिर्फ भारतीय जनता पार्टी में ही देखने को मिलता है कि अपने संस्थापक सदस्य का पार्टी इस कदर अपमान करे। राजनीति में उतार-चढ़ाव आते होते हैं लेकिन 34 वर्ष तक पार्टी का झंडा उठाने वाले वयोवृद्ध नेता का ऐसा तिरस्कार नहीं किया जाता।
संभवतः सारी दुनिया में इस समय अडवाणी जी के अलावा क्या और कोई राजनितिज्ञ नहीं है जो 70 वर्ष से सार्वजनिक जीवन और लगभग 50 वर्ष तक भारत की राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान पर है ? अडवाणी की भूमिका जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी दोनों के गठन में रही है। अब अगर भाजपा उन्हीं अडवाणी जी को 50 साल के राजनीतिक जीवन का उनकी चला-चली की बेला में यही सिला देना चाहती है तो यह एक कैडर बेस- वैचारिक प्रतिबद्ध होने का दावा करने वाले दल के लिए चिंता का विषय होना चाहिए न कि हर्ष का।
अब भाजपा के लोग तर्क दे रहे हैं कि हर दल में ऐसा ही होता है, जब नया नेता चुना जाता है तो वह अपनी अनुसार सारी चीजें तय करता है। यह निरा थोथा तर्क है। पहले तो यही बात कि क्या जो और दल करते आए हैं, भाजपा भी उसी ढर्रे पर चलेगी। यदि ऐसा ही है तो भाजपा को पार्टी विद डिफऱेंस का अपना नारा वापिस ले लेना चाहिए। दूसरी बात भाजपा में ही एक लंबा समय अडवाणी और वाजपेयी दोनों का रहा है, लेकिन न तो अडवाणी इस तरह से पार्टी पर हावी हो पाए कि वाजपेयी को दरकिनार कर दें और न वाजपेयी कभी ऐसा कर पाए कि अडवाणी को इस तरह दरकिनार कर दें। याद होगा कि वाजपेयी सरकार की आर्थिक नीतियों का दत्तोपंत ठेंगड़ी मुखर विरोध किया करते थे लेकिन तीन माह के मोदी के शासनकाल में पार्टी के अंदर ऐसी सारी आवाजें खामोश कर दी गई हैं। क्या भाजपा में इस समय ऐसा कोई नेता नज़र आता है जो मोदी या अमित शाह से अपनी मतभिन्नता प्रकट कर सके? जाहिर सी बात है, यह भाजपा के लिए आत्मचिंतन का विषय होना चाहिए कि उसका रास्ता किधर जा रहा है।
दरअसल मोदी –भागवत और अमित शाह के नेतृत्व में भाजपा अब जिस रास्ते पर जा रही है यह वो रास्ता है जिस में ओढ़ी गई शालीनता और सौम्य आचरण की अब कोई जगह नहीं है। भाजपा अब इस फर्जी शालीनता और सौम्यता के बोझ से मुक्त होना चाहती है। इसीलिए देखा जा सकता है कि प्रधानमंत्री की मौजूदगी में विपक्षी दलों के मुख्यमंत्रियों की किस तरह हूटिंग की जा रही है। जाहिर है भाजपा का यही असली चरित्र है और अब वह अडवाणी. वाजपेयी, जोशी जैसे मुखौटे उतारकर अपने असली रूप मोदी-शाह-संगीत सोम के रूप में सामने आ चुकी है। ऐसा होना ही था और यही भाजपा और अडवाणी-जोशी-वाजपेयी की नियति भी है। जिस संस्कृति को अवाजो जी चांदी का बरक लगाकर पालते पोसते रहे उसके फल उन्हें भी तो चखने ही थे।
सांप्रदायिक राजनीति का अपना चरित्र है। इस राजनीति में जो जितना ज्यादा उग्र और हिंसक होगा, वहीं हावी हो जाएगा। जाहिर सी बात है वाजपेयी अस्वस्थ हैं और अडवाणी व जोशी दोनों की शक्ति चुक चुकी है, इसीलिए मोदी और अमित शाह, भागवत की छत्रछाया में पनप रहे हैं और अपने घर के पुराने हो चुके साज-औ-सामान को ठिकाने लगा रहे हैं।
यदि भाजपा का संदेश समझना ही है तो मंगलवार की दो घटनाओं को जोड़कर साफ संदेश समझा जा सकता है। एक तरफ अवाजो जी मार्गदर्शक दीर्घा में धकेले जा रहे हैं तो उसी दिन केंद्र सरकार द्वारा उत्तर प्रदेश के सरधना से विधायक और मुजफ्फरनगर दंगों के आरोपी, संगीत सोम को जेड श्रेणी की सुरक्षा दिए जाने की घोषणा हो रही है। दरअसल उपचुनाव में करारी शिकस्त के तुरंत बाद संगीत सोम के जरिए भी एक संदेश दिया गया है। सोम से पहले जेड श्रेणी सुरक्षा अमित शाह को दी गई। याद रहे कि मुजफ्फरनगर दंगा, अमित शाह के भाजपा का यूपी प्रभारी बनने के बाद हुआ और इसके मुख्य शिल्पकार संगीत सोम थे जो शाह के निर्देश पर चलते हैं।
तो सोम के जरिए भाजपा ने अपना एजेंडा भी साफ कर दिया कि उत्तर प्रदेश को अभी और मुजफ्फरनगर देखने को तैयार रहना चाहिए। साथ ही मोदी-शाह की जोड़ी ने एक संदेश उत्तर प्रदेश (जो इस जोड़ी के लिए नया सिरदर्द बनने जा रहा है) के भाजपा नेताओं को भी दिया है। यह संदेश 2017 में उप्र में भाजपा का चेहरा बनने की कवायद में लगे राजनाथ सिंह, कलराज मिश्र, वरुण गांधी, योगी आदित्यनाथ और लक्ष्मीकांत वाजपेयी के लिए भी है कि अवाजो जी के अवसान के बाद भाजपा को मुखौटों की आवश्यकता नहीं रह गई है, नरेंद्र मोदी-अमित शाह की भाजपा का चेहरा अब संगीत सोम होंगे। लाल कृष्ण अडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी और मुरली मनोहर जोशी के साथ राजनाथ सिंह को मार्गदर्शक दीर्घा में सुशोभित करने का भी संदेश साफ है, अवाजो जी के बाद नेपथ्य में जाने की बारी अब राजनाथ सिंह की है। आप मानें या मानें।
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