नवरूणा केस- कंकाल की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने में दिक्कत क्या है?
नवरूणा केस- कंकाल की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने में दिक्कत क्या है?
क्यों बरती जा रही हैं एक मेडिकल रिपोर्ट को लेकर इतनी गोपनीयता ?
अपराधियों को पकड़ने में काम आएगी क्या शरीर की जांच रिपोर्ट ??
अभिषेक रंजन सिंह
जब पहली बार बिहार पुलिस ने कंकाल नवरूणा का होने का दावा किया तो नवरूणा के घरवालों ने आरटीआई के जरिए फोरेंसिक जांच रिपोर्ट की कॉपी मांगी। लेकिन मामले की जांच कर रहे नगर थाना के एसएचओ ने 21/2/2013 को दिए एक जबाबी पत्र में यह कहकर जानकारी देने से साफ मना कर दिया कि "यह रिपोर्ट confidential document of investigation है", जबकि उसी रिपोर्ट के आधार पर 29/12/2012 को पुलिस डीएनए टेस्ट की अनुमति लेने अदालत चली गई थी, जहां से उसे 4/1/2013 को अनुमति भी मिल गई। नवरूणा के शुभचिंतकों की तो छोड़ ही दीजिए, क्या परिजनों को भी यह रिपोर्ट देखने का हक नहीं था कि उस रिपोर्ट में आखिर कौन सी बात ऐसी लिखी है जिस पर उनकी बेटी के जिंदा होने या न होने को साबित करने के लिए ब्लड सैंपल लिया जाएगा?? कौन सा कानून बिना किसी का पक्ष जाने समझे बगैर उसके हितों का फैसला करता हैं? लेकिन इस मामले में नवरूणा के परिजनों का पक्ष स्थानीय अदालत ने नहीं सुना। आखिरकार वह एक पेज का हाथ से लिखा हुआ अस्पष्ट और चिकित्सकीय दृष्टि से संदिग्ध माने जाने वाली रिपोर्ट को सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी नोटिस के जबाब में कोर्ट में कई महीनों बाद पेश किया गया, जिसकी धज्जियां उड़ाने की तैयारी थी। लेकिन कोर्ट ने डिटेल मे सुनने की बजाए सीबीआई को जल्दी से जल्दी जांच करने का आदेश सुना डाला। फिर वह रिपोर्ट अप्रासंगिक हो गई। लेकिन "सेम स्क्रिप्ट" की कहानी दुबारा दिखाई दे रही।
अब तक पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक नही हुई है कि आखिर उस रिपोर्ट में कौन सी बातें इस बात पर मुहर लगाती है कि कंकाल के अवशेष बायोलॉजिकली नवरूणा के ही हैं? क्या कंकाल के सब अवशेष एक ही व्यक्ति के थे? क्या पहले हुई जांच व इस बार हुई जांच के रिपोर्ट समान हैं या अलग-अलग? सीआईडी द्वारा कंकाल को दुबारा जांचने की बात सामने आई थी, उस जांच रिपोर्ट का क्या हुआ? रिपोर्ट के अनुसार मृत शरीर को कंकाल में बदल जाने की इतनी जल्दबाजी क्यों थी? क्या कंकाल में बदलने के लिए किसी केमिकल का उपयोग किया गया था?? आदि आदि।
3-4 पन्ने की रिपोर्ट की दो लाइनें दिखाकर नवरूणा को मार देने की खबर सुना दी गयी और हम आंख मूंदकर मान जाएं कि नवरूणा मर गई!! दुनिया मान जाए, जब तक पूरा माजरा खुद न देख लें, मैं कम से कम नहीं मानता। रिपोर्ट परिजनों को दिखायी जा सकती है, मीडिया को दिल्ली से व्यवस्थित तरीके से इसके बारे में बताया जा सकता है, तो रिपोर्ट क्यों नहीं सार्वजनिक की जा सकती?
प्रश्न है कि मीडिया भी इस रिपोर्ट की जांच पड़ताल अपने तरीके से करवाती तो क्या बिगड़ जाता? सीबीआई अधिकारियों पर पूरा विश्वास है। साथ ही हमें डॉक्टरों की भाषा समझ नहीं आती। लेकिन नवरूणा के कई शुभचिंतक देश दुनिया मे डॉक्टरी की अच्छी पढ़ाई किए हुए हैं, वे पूरी रिपोर्ट को देखना चाहते हैं! क्या उन्हें यह जानने का हक नहीं है कि वह जांच रिपोर्ट सही है अथवा नहीं?
जानकारी के लिए बता दूँ कि 26 नवंबर 2012 को नवरूणा के घर से सटे एक दस इंच के सीमेंटेड नाले से एक कंकाल संदिग्ध परिस्थितियों मे बरामद हुआ। खास बात यह थी कि उस कंकाल के मिलने से लगभग दस दिन पहले ही उस नाले की कथित तौर पर सफाई हुई थी और जब कंकाल मिला तो दुबारा सफाई उसी जगह से शुरू की गई जहां से कंकाल मिला। सभी प्रत्यक्षदर्शियों सहित जितने भी वरिष्ठ अधिकारियों ने कंकाल को स्वयं देखा या उस कंकाल की तस्वीर देखी, सबने इसे 30-40 वर्ष की उम्र वाले किसी वयस्क का कंकाल माना। यहां तक कि, उस कंकाल को परिजनों को दिखाने की भी जरूरत पुलिस ने नहीं समझी, जो परिजन प्रत्यक्षदर्शियों द्वारा किसी बड़े का कंकाल बताए जाने की वजह बताते हुए उसे देखने नहीं गए। लेकिन कंकाल मिलने के एक दिन बाद सारा माजरा ही बदल गया। किसने कंकाल डाला? कब डाला? अगर मृत शरीर डाला तो कैसे डाला कि किसी को भी दुर्गन्ध नहीं महसूस हुई? आदि सवाल भी अप्रासंगिक हो गए! केवल डीएनए, डीएनए की गूँज सुनाई देने लगी! नवरूणा पूरे परिदृश्य से गायब कर दी गई। क्यों?
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