इलेक्ट्रीसिटी संशोधन बिल 2014 केन्द्रीय कैबिनेट के निर्णय का बिजली इंजीनियरों ने किया विरोध
निजी घरानों को मुनाफा और आम जनता को टैरिफ में भारी वृद्धि का बिल वापस न लिया गया तो राष्ट्रव्यापी आन्दोलन होगा
लखनऊ। इलेक्ट्रीसिटी संशोधन बिल 2014 के विरोध में आल इन्डिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन ने बिजली कर्मचारियों के महासंघों के साथ मिलकर नेशनल कोआर्डिनेशन कमेटी ऑफ़ इलेक्ट्रिसिटी इम्प्लोयीस एंड इन्जीनियर्स के बैनर तले राष्ट्रव्यापी संघर्ष का ऐलान किया है। फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे ने बताया कि इलेक्ट्रीसिटी संशोधन बिल 2014 के विरोध में आल इंडिया पावर इन्जीनियर्स फेडरेशन ने लोक सभा की बिजली मामलों की स्टैन्डिंग कमेटी एवं इसके चेयरमैन डा0 किरीट सोमैय्या को गत जनवरी माह में विस्तृत ज्ञापन भेज कर प्रस्तावित संशोधन बिल को वापस लेने की मांग की थी और स्टैन्डिंग कमेटी के समक्ष अपनी बात रखने हेतु समय माँगा था, किन्तु बार-बार अनुरोध के बावजूद कमेटी ने आल इंडिया पावर इन्जीनियर्स फेडरेशन या किसी भी कर्मचारी या उपभोक्ता फेडरेशन को समय नहीं दिया और अपनी एक तरफ़ा रिपोर्ट दे दी जिसे विगत सप्ताह केन्द्रीय मंत्रिमंडल ने मंजूरी दे दी है। अब इलेक्ट्रीसिटी संशोधन बिल 2014 को संसद के मानसून सत्र में पारित कराने की योजना है।
इस सम्बन्ध में फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे ने प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी को पत्र भेजकर प्रभावी हस्तक्षेप करने की मांग की है और कहा है कि बिल को जल्दबाजी में पारित न किया जाये और बिजली की बेहतरी हेतु बिजली इंजीनियरों और बिजली उपभोक्ताओं की इस बारे में राय ली जाये। बिजली अभियंताओं ने प्रस्तावित संशोधनों को जन विरोधी करार देते हुये कहा है कि संशोधन बिजली आपूर्ति के निजीकरण हेतु किया जा रहा है, जिसमें निजी घरानों के मुनाफे का खास ध्यान रखा गया है जबकि आम जनता पर टैरिफ में भारी वृद्धि का बोझ डालने की तैयारी हैं।
आल इन्डिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे ने बताया कि संशोधन बिल से साफ है कि केन्द्र सरकार टैरिफ नीति में व्यापक परिवर्तन करने जा रही हैं जिससे निजी आपूर्ति कर्ताओं को कोई हानि न हो और बिजली की पूरी लागत टैरिफ बढ़ाकर आम जनता से वसूली जा सके। उन्होंने बताया कि इलेक्ट्रीसिटी एक्ट 03 की धारा 61(डी) में लिखा है कि उपभेक्ता हितों को ध्यान में रखते हुये बिजली की लागत की वसूली तर्क संगत तरीके से की जायेगी। अब 61(डी) में संशोधन प्रस्ताव में लिखा गया है कि सप्लाई लाइसेन्सी द्वारा बिजली लागत की पूरी वसूली की जायेगी जिससे लाइसेन्सी को कोई घाटा न हो और तदनुरूप धारा 62 के अनुसार टैरिफ तय किया जायेगा। स्पष्ट है कि संशोधन निजी घरानों के पक्ष में है जबकि जनता को बढ़े टैरिफ का बोझ उठाना होगा।उन्होंने बताया कि इसी दृष्टि से नेशनल टैरिफ पालिसी में बदलाव किया जा रहा है।
प्रधान मंत्री को भेजे गए पत्र में फेडरेशन ने सात मुख्य सवाल उठाये हैं। पहला यह कि 2019 तक सबको बिजली मुहैय्या कराने के लिए संशोधन बिल में क्या प्राविधान है और साढ़े तीन लाख करोड़ रु से अधिक घाटे में चल रही बिजली वितरण कम्पनियाँ इस संशोधन की किस धारा से घाटे से उबर पाएंगी और सबको बिजली देने का लक्ष्य कैसे पूरा होगा। दूसरा यह कि बिजली आपूर्ति के नए प्रायवेट लायसेंसी बिजली आपूर्ति करने में अपना मुनाफा देखते हुए सामान्य घरेलू उपभोक्ता और औदोगिक / वाणिज्यिक उपभोक्ताओं के बीच भेदभाव करेंगे तो इससे निपटने का संशोधन बिल में क्या प्राविधान है। तीसरा यह कि प्रस्तावित संशोधन के बाद कहीं आम घरेलू उपभोक्ताओं को ही बिजली दरों में भारी वृद्धि का झटका तो नहीं झेलना पड़ेगा। चौथा यह कि जब निजी सप्लाई कम्पनियाँ मुनाफे का सौदा करेंगी तो सरकारी आपूर्ति कंपनी के पास केवल ग्रामीण, बी पी एल और कम राजस्व वाले उपभोक्ता ही बचेंगे तो ऐसे में सरकारी कंपनी और अधिक घाटे में चली जायेगी परिणामतः गरीब उपभोक्ताओं के लिए बिजली मिलेगी ही नहीं। पांचवा यह कि सौर ऊर्जा व पवन ऊर्जा जैसे गैर परंपरागत क्षेत्र को प्रोत्साहन, छठा यह कि रेगुलेटरी कमीशन को स्वायतत्ता देने के लिए संशोधन बिल में क्या प्राविधान है और सातवां यह कि कहीं संशोधन बिल अनावश्यक कानूनी झगड़ों और मुकदमेबाजी को जन्म तो नहीं देगा।
फेडरेशन ने कहा है कि एक ओर केन्द्र सरकार 2019 तक सबको बिजली मुहैय्या कराने की बात कह रही है, जिसके लिये 15.7 लाख करोड़ रू0 खर्च होने का अनुमान है जिसमें 5.27 लाख करोड़ रू0 वितरण कम्पनियों के घाटे की भरपाई के लिये है, दूसरी ओर वितरण व आपूर्ति को अलग कर आपूर्ति हेतु निजी घरानों को लाइसेन्स देने का संशोधन बिल लाया गया है जिससे वितरण कम्पनियों का घाटा और बढ़ेगा तो 2019 तक सबको बिजली देने का लक्ष्य कैसे पूरा हो सकेगा। फेडरेशन ने कहा कि बिजली आपूर्ति में मोबाइल के सिम कार्ड की तरह आपूर्ति कर्ता कम्पनियां बदल सकने की बात करना जनता के साथ धोखा है क्योंकि भारत में बिजली का गम्भीर संकट है और कम्पटीशन सरप्लस स्थिति में होता है जब कि कमी की स्थिति में ब्लैक मार्केट होता है। उन्होंने कहा कि केन्द्र सकरार की पहली प्राथमिकता वितरण कम्पनियों को घाटे से उबारना, ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू व सिंचाई के फीडर अलग करना, बिजली उत्पादन बढ़ानें हेतु कोयला व गैस की आपूर्ति सुनिश्चित करना, ट्रान्समिशन की क्षमता बढ़ाना होना चाहिए जिसके लिये इलेक्ट्रीसिटी (अमेण्डमेन्ट) बिल 2014 में क्या प्रविधान है यह स्पष्ट नहीं है।
फेडरेशन ने आरोप लगाया कि केन्द्रीय कैबनेट द्वारा जल्दबाजी में संशोधन बिल स्वीकृत किये जाने का मुख्य मकसद निजी घरानों को बेजा लाभ पहुंचाना है जिसका पुरजोर विरोध किया जायेगा।