पृथक् बटोही

हमारे इन्जीनियरिंग कॉलेज के बगल में मेडीकल कॉलेज था। डॉ अग्रवाल वहाँ प्रोफेसर व् लॉन टेनिस में हमारे पार्टनर थे। वे कहते थे- खाने के साथ अमरुद खाओ और मेरे जैसी सेहत पाओ। अमरूद ( पेरू) अपनी भी कमजोरी रही है सो सोमवार को ऑफिस के पीछे गाँव की बगिया से अमरूद खरीदे, ताजे थे और कुछ ज्यादा कच्चे भी सो गाड़ी में ही रख दिये। आज छठे दिन नजर पड़ी चखे तो मधुरम्-मधुरम् लगे। खबरें भी इसी तरह हैं, उनके विश्लेषण पक कर आयें तो मधुरम्- मधुरम्।

इस खबर की शुरूआत मेरे अमरुद खरीदने के दिन से हुयी, तय किया गया कि नामजद लोगों के चुनाव लड़ सकने वाला अध्यादेश लाया जाय, अगले दिन वह कैबिनेट ले आयी, उसी दिन आंध्र के रेड्डी व दलित ईसाईयों के प्रतिनिधि जगन मोहन को साल भर बाद जेल से निकाल दिया गया, उसके दो दिन बाद बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दे दिया गया। माथा ठनका, जो पार्टी अपने सहयोगियों को अपना बुखार भी नहीं दे वो ऐसी दिलदार, अरे भई हुआ क्या है! एक के बाद एक सम्भावित घटक खुश किये जा रहे हैं- लालू, रेड्डी, नितीश तीनों साधे जा रहे हैं। अब तो लगता है सादगी के पुजारियों और मजदूरों पर बपौती वाली हंसिया हथोड़ा सरकार से वित्तीय रूप से कंगाल, पश्चिम बंगाल की सत्ता पायी ममता को भी कहीं आर्थिक पॅकेज व मन्त्रालय की घोषणा ना हो जाये!

हमारी बुद्धि को झटका जब लगा जब आज भाजपाई 'शेर' की दहाड़ से पहले कल गान्धीलोक के युवराज दहाड़ने लगे, देश ने इनका ऐसा गुस्सा मुम्बई हमले पर भी नहीं देखा था। युवराज सम्भालिये गुस्से को, राजनीति है पपा के टाइम की तरह कोई एन टी रामा राव सरीखा पिल ना जाय और गर्दा उड़ जाये।

सोशल मीडिया में भी ढेरो विचार देखे मसलन प्रवक्ता.काम के संजीव कहने लगे- यह विपक्षी नेतृत्व (आडवाणी) का दबाव है। स्वतंत्र पत्रकार शिवानन्द सहर को कल तक अध्यादेश के बचाव में खड़े कांग्रेसजनों की स्थिति की चिंता हैं तो ब्लॉगर धीरेन्द्र पाण्डेय का प्रश्न "व्यक्तिवाद बनाम वास्तविक लोकतंत्र के द्वंद को टटोलता है"। सुप्रीम कोर्ट ने कहा तो अध्यादेश ले आये अब सुप्रीमो ने कहा तो पीछे हट जायेगी सरकार की नज़र में किसका महत्व ज्यादा है? " तो प्रो बी.कामेश्वर राव साहब इसे हिंदी फिल्मो के नायक की कहानी मानते हुये लिखते हैं " राहुल की गिरती साख को बचाने के लिये उसे हीरो के रूप में प्रोजेक्ट करने के लिये सुनियोजित नाटक था"

मुझे वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला साहब की बात याद आ रही है जो उन्होंने राज्य सभा में प्रधानमन्त्री के आक्रामक भाषण के बाद कहा था, वे कह रहे थे की "मैं पिछले दो साल से देख रहा हूँ कि प्रधानमन्त्री को अकेला छोड़ देते है कांग्रेस के लोग जबकि गांधी परिवार पर बात होते ही टूट पड़ते हैं।" सच भी है कल भी वे ही नपे, उनकी विदाई तक लगता है सारे बखेड़े उनके नाम कर दिये जायेंगे। पहले प्रधानमन्त्री लोग किचेन कैबिनेट से प्रभावित होते थे पर अब तो एक्स्ट्रा कांस्टीट्यूश्नली अपरोक्ष रूप से गवर्नड होते हैं। ऐसे में गवर्नड करने वालों का कहना कि मैं इस फैसले से सहमत नहीं, हास्यास्पद है।

कल की खबर जो भी हो अभी पकी नहीं, पर मीडिया ने 'एंग्री यंग मैंन' की भूमिका में राहुल को पहुँचा दिया है। यह ठीक पिछले साल यूपी चुनावों के आगाज़ करते इन्हीं साहब के फूलपुर सभा में दिये गये भाषण सरीखा है जब उन्होंने यूपी वालों को उनकी हालत पर झिंझोड़ते हुये कहा था अन्य राज्यों में क्यों माँगने जाते हो? खैर, उसके बाद एंग्री यंग मैन ने उस मंगतई रोकने के लिये क्या किया इसका पता नहीं पर कल फिर अपनी बमकिले तेवर को अपनी छवि में दिखाया है। वे अपने कम्पीटीशन समझा रहे हैं कि तुम्हारी दहाड़ में वो दम नहीं कि सरकार घुटने टेक दे, साथ ही मानो कह रहे हों "मैं यह बात फोन पर भी कर सकता था मगर माइक पर करके मैं तुम्हे चुनौती देता हूँ।"