नीलाभ की कद-काठी गजब की थी। उतनी ही ताकतवर थी उनकी जिजीविषा
उर्मिलेश

नीलाभ जी से मेरी पहली मुलाकात सन 1977 या 78 की है।
केपी सिंह(दिवंगत साथी) के साथ सिविल लाइन्स स्थित नीलाभ प्रकाशन गया था। वहां से आकर देर तक काफी हाउस बैठे। वह बगल में ही था। फिर न जाने कितनी बार हम लोग मिले। छात्रजीवन के दौरान हमारी एक स्टडी सर्किल होती थी। यदाकदा नीलाभ भी उसमें आये।

बहुत घनिष्ठता का दावा नहीं कर सकता। लेकिन वह जब भी मिलते, उसी इलाहाबादी उत्साह से।
हाल के दिनों में कई बार मन करता, कहूं कि भाई नीलाभ, आपको बहुत लिखना-पढ़ना है, अनावश्यक लफड़े क्यों पालते हैं! अपनी सेहत और रचनात्मक सक्रियता पर ध्यान दीजिये।

पर वह उम्र में बड़े थे और समझ में भी। मैं क्या कहता!
मुझे अब भी लगता है, नीलाभ को अभी जिन्दा रहना था। काफी समय तक। उऩकी कद-काठी गजब की थी। उतनी ही ताकतवर थी उनकी जिजीविषा। पर वह आज चले गये। गहरा दुख हो रहा है। सलाम और श्रद्धांजलि ,साथी नीलाभ।