नेताजी अपने बेटे के लिए शंकर बन गए और सारा विष खुद पी गए
नेताजी अपने बेटे के लिए शंकर बन गए और सारा विष खुद पी गए
नेताजी अपने बेटे के लिए शंकर बन गए और सारा विष खुद पी गए
महेंद्र मिश्र
मुलायम सिंह यादव राजनीति में आने से पहले पहलवान थे। इसलिए उस पेशे के कुछ बुनियादी गुण उनके साथ आए हैं। मसलन अखाड़े में उतरने से पहले पहलवान यह तय कर लेता है कि विरोधी को किस दांव से चित्त करना है। राजनीति में भी नेता जी यह काम करते रहे हैं। और कई बार तो दांव ऐसा होता है कि लोग उसका अंदाजा भी नहीं लगा पाते हैं और चित्त हो जाते हैं। कई लोग तो चित्त होने पर भी उसे ही अपनी जीत समझते हैं।
लखनऊ में चला सफई दंगल भी इसी की एक मिसाल है। यहां भी सब कुछ नेताजी की मर्जी के मुताबिक ही हुआ। साढ़े चार साल पहले से लेकर मौजूदा समय तक सत्ता और काम का बंटवारा था। और आज भी है। लेकिन उसमें थोड़ा बदलाव आ गया है। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि पहले सत्ता का दोहन करना था। तो कोई भी उसका हिस्सेदार हो सकता था। लेकिन अब जब सत्ता हासिल करनी है। तो फिर उसकी जरूरतें अलग हैं। जिम्मेदारियां और जवाबदेहियां भी अलग हो जाएंगी।
मुलायम सिंह के सामने दो चुनौती थी। एक तो अखिलेश के स्वतंत्र नेतृत्व को स्थापित करना। दूसरा 2017 के चुनाव में पूरी मजबूती के साथ उतरना। लेकिन इन दोनों चुनौतियों से निपटने की राह में दो-तीन चीजें बाधक थीं।
यादव सिंह प्रकरण में राम गोपाल यादव के बेटे और सांसद अक्षय पर लगा भ्रष्टाचार का आरोप पूरे परिवार पर भारी पड़ रहा था। परिवार के गले पड़ा सीबीआई का यह पंजा बीजेपी के हाथ आ गया था। नतीजतन पार्टी उसके इशारे पर नाचने के लिए मजबूर थी। दूसरे हैं शिवपाल सिंह यादव जिनकी छवि एक भ्रष्ट नेता की है और साख दो कौड़ी की। इस कड़ी में आखिरी और इन सबसे ज्यादा खतरनाक शख्स अमर सिंह थे। उनके बारे में किसी को कुछ बताने की जरूरत नहीं है।
एक चीज यहां बताना जरूरी है। मुलायम सिंह यह समझ गए थे कि अखिलेश की लाख अच्छाइयां हों, उनकी छवि भी अच्छी हो। विकास के चंद सेहरे भी सिर पर हैं। बावजूद इसके केवल उनके बल पर चुनाव जीतना मुश्किल है। ऐसे में यह एक ऐसा आपरेशन था जिसमें पार्टी का कोई एक अंग नहीं बल्कि पूरे शरी की चीड़ फाड़ होनी थी। उसमें दिल-दिमाग से लेकर पूरा नर्वस सिस्टम सब शामिल थे। साथ ही इसमें यह भी तय था कि कुछ पुरानी मर्ज बनी रहेंगी। क्योंकि पार्टी जिस तरफ कदम बढ़ा रही है उसमें उनकी जरूरत भी है। लेकिन अगर कुछ कैंसरस हैं तो उन्हें काट कर फेंकना भी पड़ सकता है।
दरअसल लगता है कि नेता जी अब 2017 के लिए बिहार की तर्ज पर एक महागठबंधन बनाने की राह पर आगे बढ़ गए हैं। जिसमें कुनबे को एक करते हुए दूसरे दलों को जोड़ने की जरूरत होगी। इस रास्ते बीजेपी के खिलाफ एक ऐसे बड़े मोर्चे का निर्माण किया जाए, जो जनता में जीत का भरोसा पैदा कर सके। इस कड़ी में राम गोपाल यादव सबसे बड़ी बाधा थे। उनके भार को पार्टी अब आगे नहीं ढो सकती थी। बिहार में महागठबंधन के टूटने के पीछे वही कारण थे। और एक बार फिर अगर मुलायम सिंह आगे बढ़ते तो यह बिल्ली उनका रास्ता काट देती। लिहाजा उनका काम तमाम करना जरूरी था।
दूसरे थे भाई शिवपाल यादव जो कल तक मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे। सरकार से अलग हो चुके हैं। अब सरकारी बंगला तक उनके पास नहीं रहा। मुलायम के सेवादार की भूमिका में आ गए हैं। और उनके रहमोकरम के मोहताज हैं।
आखिरी बचे अमर सिंह। उनकी भूमिका अब मुलायम के सलाहकार की रह गई है। 2017 से लेकर 2019 तक में विपक्षी राजनीति में जो बड़े-बड़े खेल होंगे। उनमें इन सबकी ज्यादा जरूरत पड़ेगी। लेकिन इन सबको पालने-पोसने और उन्हें बनाए रखने का ठीकरा मुलायम सिंह के सिर फूटेगा। या फिर कह सकते हैं कि तात्कालिक तौर पर नेताजी अपने बेटे के लिए शंकर बन गए हैं। और सारा विष खुद पी लिए।
इस पूरी कवायद में अखिलेश सबसे मजबूत नेता बनकर उभरे हैं। जिसमें एक स्वतंत्र फैसला लेने और उस पर खड़े रहने की सलाहियत है। साढ़े तीन मुख्यमंत्रियों में अब तक आधे का खिताब पाने वाले अखिलेश के हाथ में आज पूरी सत्ता है। न कोई शिवपाल है। न कोई अमर दखल देने वाला। और पूरा मैदान उनके लिए साफ है। जिसमें रथयात्रा के जरिये वह अपने को और मजबूत कर सकते हैं। यह सब कुछ अब उनकी मेहनत और सूझबूझ पर निर्भर करेगा।
इस पूरे प्रकरण में पार्टी के एक वरिष्ठ नेता आजम खान की कोई भूमिका नहीं दिखी। हालांकि उन्होंने कुछ बयान जरूर जारी किया है। वह अल्पसंख्यक वोटों के सिलसिले में है। यह बयान भी इस प्रकरण से जुड़ा हुआ है। बावजूद इसके मुलायम सिंह अब जानते हैं कि अल्पसंख्यक वोट किसी मुस्लिम नेता का मोहताज नहीं रहा। उसके लिए सबसे पहले और उससे ज्यादा बीजेपी के खिलाफ एक बड़ी ताकत के तौर पर अपने को पेश करना जरूरी है। साथ ही वह यह भी जानते हैं माहौल ऐसा है जिसमें किसी मुस्लिम नेता को ज्यादा तवज्जो देना भी उल्टा पड़ सकता है। ऐसे में आजम खान एक नेता के तौर पर भले हों लेकिन चेहरे के तौर पर उनकी भूमिका बहुत ज्यादा नहीं बची है।


