नेतानयाहू, अपने दादा-परदादाओं की चीखें तुम्हें सुनाई देती हैं ?
नेतानयाहू, अपने दादा-परदादाओं की चीखें तुम्हें सुनाई देती हैं ?
उज्ज्वल भट्टाचार्या
आज मैं रिटायर्ड हूँ और मेरे जन्म से पहले से ही फ़लस्तीन के साथ नाइंसाफ़ी शुरू हो चुकी है, बढ़ती जा रही है। लोग हमास के राकेटों पर उंगली उठा रहे हैं, मैं भी असैनिक नागरिक निशानों पर हमलों के ख़िलाफ़ हूँ, उनकी पुरज़ोर निंदा करता हूँ।
सिर्फ़ एक बात बता दीजिये : इन साठ-सत्तर सालों के दौरान अधिकतर ऐसे दौर रहे हैं, जब राकेट नहीं चलते रहे, और इज़रायल की धौंसबाज़ी चलती रही, उनकी ज़मीन पर यहूदी बस्तियों का विस्तार जारी रहा, उनके इलाकों को उजाड़कर वहां से इज़रायल में पानी ले जाया जाता रहा। नाइंसाफ़ी दूर करने की बात तो भूल जाइये, उसे बढ़ाया जाता रहा। फ़लस्तीनी बच्चों की चौथी पीढ़ी शरणार्थी शिविरों में पल रही है, हर किशोर को इज़रायली सुरक्षा बलों की ज़्यादतियों का शिकार होना पड़ा है - जी हाँ, हर किशोर को।
हिटलर के हाथों मारे गये निर्दोष यहूदियों की संतानें आज हिटलर की राह पर चल रही हैं। गाज़ा में फ़लस्तीनी बच्चों को जैसे मारा जा रहा है, उसी तरह यहूदी बच्चों को नाज़ियों ने मारा था। नेतानयाहू, अपने दादा-परदादाओं की चीखें तुम्हें सुनाई देती हैं ?
फ़लस्तीनी बच्चों का ख़ून नाज़ी यातना शिविरों में हलाक किये गये यहूदी बच्चों का ख़ून है। जियनवादियों के हाथ अपने पुरखों के ख़ून से रंगे हैं।


