नई दिल्ली। नेपाल की भूकंप त्रासदी के बीच जहां नेपाल में राहत व बचाव कार्य चालू हैं, वहीं नेपाली मीडिया में लगातार भारत के राहत कार्यों को लेकर सवालिया निशान लगाती खबरें प्रकाशित हो रही हैं। प्रमुख नेपाली अखबार कांतिपुर के रेडियो कांतिपुर ने एक रिपोर्ट प्रकाशित की और कई सवाल खड़े किए। इधर भारतीय मीडिया नेपाकिस्तान द्वारा भेजी गई राहत सामग्री को लेकर भारत में घृणा अभियान चलाया। पवन पटेल इस रपट में कुछ बिंदु उठा रहे हैं।
भारत में मोदी राज के उदय से एक महत्वपूर्ण परिघटना का जन्म हुआ है, जो इतने बडे पैमाने पर न देखा गया, न सुना गया। काम धेले भर का नहीं, पर प्रचार की गोयबल्स शैली वाली हिंदूवादी राजनीति। मोदी सरकार का ताजा शिकार नेपाल की भूकंप त्रासदी से उत्पन्न हुए राहत और बचाव कार्य हैं। हमारा पड़ोसी देश नेपाल 25 अप्रैल से भूकंप की त्रासदी से दो चार है, तब मानवीय उद्धार पर भी मोदी की हिन्दूवादी परिघटना की छाप आसानी से देखी और समझी जा सकती है। आम जनमानस की नज़र में यह एक शर्मनाक बात है, कि नेपाल की भूकंप त्रासदी के बीच चल रही ‘मानवीय राहत उद्धार कार्य’ के बीच मोदी सरकार ने इसे राजनीतिक स्टंटबाजी के रूप में की ‘ह्यूमनटेरियन डिप्लोमेसी’ का नाम दिया है।
भारत और चीन दो बड़े पड़ोसियों ने नेपाल के इस संकट की घड़ी में 25 अप्रैल (भूकंप वाले दिन) की शाम को राहत टीमें रवाना कर दी थी। यहाँ तक कि छोटे से देश भूटान ने भी अपने प्रधानमंत्री को भेजकर सहायता पैकेज में 10 करोड़ रुपए की राशि और अपनी आर्मी के जवान भेजे। पाकिस्तान व श्रीलंका से लेकर बांग्लादेश भी पीछे नहीं हटा। यूरोप और लैटिन अमेरिका, अफ्रीका के विभिन्न देशों से लेकर व अमेरिका तक सभी ने।
लेकिन भारतीय सत्ताधारी वर्ग ऐसे किसी भी क्षण को, यहाँ तक कि मानवीय त्रासदी के क्षणों में भी अपनी वर्चस्व की राजनीति किये जाना को जाया नहीं करना चाहता, इसलिए वह एक से एक कमाल के हिंदुत्ववादी पैंतरे दिखाता है। पाकिस्तान के साथ चलो मान लिया, भारत खेल के मैदान में भी ऐतहासिक रूप से जारी परंपरागत ‘दुश्मनी’ निभाता है, तो इसके दुष्प्रभाव नेपाल की भूकंप त्रासदी के बीच भी देखे जायेंगे? यह तो हद ही हो गयी। 26 अप्रैल से पाकिस्तान ने अपनी आर्मी का 30 बेड का मोबाइल हॉस्पिटल काठमांडू में संचालित किया है और साथ ही राहत सामग्री भेजी है। 3 दिनों पहले सुना गया है कि ट्विटर के माध्यम से बाबा रामदेव ने पाकिस्तान द्वारा भेजी खाद्य सामग्री में गौमांस (बीफ मसाला) पाए जाने का वितंडा खड़ा किया. रामदेव दरअसल भूकंप आने के पहले से काठमांडू में युग शिविर चला रहे थे और इस त्रासदी के बाद सुषमा स्वराज के विशेष हेलीकॉप्टर भेजने पर भी भारत नहीं आये और अभी तक बचाव कार्य में लगे हैं। लेकिन इस बात को नेपाली मीडिया के एक अखबार (प्रचंड-बाबूराम के कैश माओवादी समर्थित नेपाली अखबार ‘नया पत्रिका दैनिक’) को छोड़कर किसी ने तूल ही नहीं दिया। जैसा कि भारतीय अख़बारों में इसे तूल देकर प्रचारित किया जा रहा है। खबर है, कि प्रधानमंत्री कोइराला ने इस पर जाँच दल बिठाने की बात कही है, जबकि परसों यानि 29 अप्रैल को ही काठमांडू स्थित पाकिस्तान दूतावास ने इस सवाल पर बाकायदा एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर इसका स्पष्ट शब्दों में खंडन किया।
शायद मोदी राज और रामदेव टाइप बाबाओं को इस बात का ज्ञान नहीं है, कि भले ही नेपाल में गौ मांस पर प्रतिबन्ध लगा हुआ है (यह प्रतिबन्ध बहुसंख्यक आदिवासी जनजाति समूहों के जबरदस्त विरोध के बावजूद 1990 के दशक में लगाया गया था, जब नेपाल में राजतंत्र के जमाना था). लेकिन नेपाल के इन जनजाति ‘हिन्दू’ समुदायों को क्या कहा जाए जिसकी भोजन संस्कृति में ही गौवंश का मांस एक अनिवार्य चीज़ है। क्यूंकि यदि ये हिन्दू देश की जनसँख्या में एक दूसरी समुदाय में चिन्हित कर दिए गए, तो नेपाल में असली हिन्दू तो केवल ऊँची हिन्दू जातियां यथा पहाड़ के बाहुन, छेत्री-ठकुरी और तराई के ब्राह्मण-राजपूत रह जायेंगे, जिनकी संख्या सब मिलकर 35 प्रतिशत भी नहीं पहुँचती। तब तो नेपाल के बहु प्रचारित हिन्दू देश जिसकी आबादी में 85 प्रतिशत हिन्दू है, तब क्या होगा?
पवन पटेल
पवन पटेल, लेखक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र बिभाग में पीएचडी हैं और आजकल वे ‘थबांग में माओवादी आन्दोलन’ नाम से एक किताब पर काम कर रहे हैं; वे भारत-नेपाल जन एकता मंच के पूर्व महा सचिव भी रह चुके हैं।