धीरेश सैनी

इन कुछ पंक्तियों को विस्तार से उदाहरणों के साथ भी कहा जा सकता है पर यह काम किसी और के लिए :

लोग कहते हैं कि गांधी न होते तो नेहरू ये न होते, वो न होते।

गांधी बड़े नेता थे। बड़े व्यक्तित्व। वक़्त और जनमानस की नब्ज को पहचानने वाले।

फिर भी, मुझे लगता है कि नेहरू न होते तो गांधी ये गांधी न होते। गांधी के भीतर के पिछड़े-दकियानूस गांधी को नेहरू कवर करते हैं। और पूरी कांग्रेस को, एक बड़े आंदोलन को और देश की छवि को भी। जैसे आम्बेडकर, जैसे मौलाना आज़ाद और कुछ मुट्ठी भर से भी कम लोग। नेहरू यह बहुत सहज ढंग से करते हैं।

(यह सरलीकरण न किया जाए कि मैं कह रहा हूँ कि गांधी किसी नेहरू पर ही निर्भर थे। जैसा कि मूर्ख और धूर्त लोग कहते हैं कि नेहरू के निर्माता गांधी थे।)

नेहरू न होते तो कांग्रेस तभी आज के समय की डफर कांग्रेस होती और देश तभी गाजे-बाजे के साथ उस गड्ढे में खड़ा किया जाता जिसमें आज किया जा रहा है।

इस बात को हमारे से ज्यादा नेहरू के दुश्मन जानते हैं और लगातार कहते भी हैं। नेहरू का 'भूत' अभी तक उन्हें बाधा महसूस होता है।

नेहरू भी नेहरू न होते अगर गांधी, अम्बेडकर, मौलाना आज़ाद और कुछ अन्य समकालीन और पूर्ववर्ती न होते जिनके साथ उनके गहरे विरोधाभास भी थे। वे सब जिनका यक़ीन एक इंसानी समाज के निर्माण में था। मतलब विरोधाभासों और असहमतियों के बावजूद ये सब एक कॉमन जगह तैयार करते थे जहां वे फैसले संभव हो सके जो मोटे तौर पर किसी एक के लिए लग सकते हैं।

धीरेश सैनी की एफबी टाइमलाइन से