देशपाल सिंह पंवार

यूं भूखा होना कोई बुरी बात नहीं है, दुनिया में सब भूखे होते हैं,

कोई अधिकार और लिप्सा का,कोई प्रतिष्ठा का,कोई आदर्शों का,

और कोई धन का भूखा होता है,ऐसे लोग अहिंसक कहलाते हैं,

मास नहीं खाते, मुद्रा खाते हैं

-दुष्यंत कुमार

चौतरफा घपलों-घोटालों का दौर है। तमाम चोर के विदेश में जमा काले धन का शोर है। कोई सियासतदां करता नहीं गौर है। जनता बोर है। छिन रहा कोर है। दिखता नहीं कोई छोर है। कहीं नहीं कोई ठौर है। अब बसंत की नहीं भोर है। मस्ती में नाचता नहीं मोर है। हिंदुस्तान पर घटा घनघोर है। लोकतंत्र का दुखता हर पोर है। पता नहीं, कौन-कौन, किस जगह, किस तरह, लूट की वजह से सराबोर है .हर पल सुनहरा कल इस गंदे जल की दलदल में फंसता जा रहा है। धंसता जा रहा है। पूरा देश ही इसमें बसता जा रहा है। आम जन मरता जा रहा है। जमाखोर-घूसखोर-सूदखोर-धनखोर हंसता जा रहा है। लोकतंत्र डरता जा रहा है।

हर नींव के नीचे घपला-घोटाला दफ्न है। जहां हाथ लगाओ-वहां करप्शन। जहां काली कमाई-वहां जश्न-सब मग्न। जो झेलता है वो कफ्न तक तरस जाता है। संत्री से मंत्री तक, बाबू से अफसर तक जिसका जहां दांव बैठ रहा है वो करप्शन की नाव में जनता व लोकतंत्र को घाव ही देता जा रहा है। गांव की छांव तक करप्शन की कांव-कांव गूंज रही है। अब तो कहा जाने लगा है,माना जाने लगा है कि बस वही सही है जिसकी कोई हैसियत नहीं है। सबकी ऐसी कैफियत है सौ फीसदी ऐसा मानने को फिलहाल दिल नहीं करता। तमाम ऐसे जरूर हैं जो इस राह पर नहीं है। इसी कारण ये देश चल रहा है। माना तमाम क्षेत्रों में हमने बेथाह तरक्की की पर इस कड़वे सच से कौन इंकार कर सकता है कि इस देश में जनता कंगाल-नेता व अफसर मालामाल हैं। 1971 में गरीबी हटाओ का नारा लगाया गया-किसकी गरीबी हटी-जनता की, घूसखोर नेताओं व करप्ट अफसरों की या धंधेबाजों की? सब सामने है। तमाम के वास्ते राजनीति जनसेवा की जगह मेवा कमाने का जरिया बन गई है। हर बार राज्यों से लेकर संसद तक ना जाने कितने दागी, घूसखोर व हत्यारे डुगडुगी पीटते नजर आते हैं। जीतने को हर हथकंडा अपनाते हैं। दो पैसा लुटाते हैं और फिर हजारों कमाते हैं। अब तौ आए दिन करप्शन के किस्सों ने राजनीति व लोकतंत्र के मायने ही बदल दिए हैं।

वैसे ये रोग आज का नहीं है। जब आबादी को आजादी मिली थी, तोहफे में बरबादी भी मिली थी। वह भी तब जब राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने 1937 में ही करप्शन के खिलाफ बिगुल फूंक दिया था। उनका मानना था कि करप्शन की दीमक एक दिन सारे देश को चाट जाएगी। इसी कारण वे चाहते थे कि जब देश आजाद हो तो सामाजिक क्रांति के सहारे हर घर आबाद हो। बापू अच्छी तरह जानते थे कि जिन हाथों में सत्ता जाएगी, उनमें से ढेरों ऐसे हैं जो इस राह पर जाएंगे। इसी कारण वे हमेशा करप्शन पर सब कांग्रेसी नेताओं को आगाह करते रहते थे। पर बापू के जाते ही तमाम कांग्रेसी उनके अनमोल वचन का गबन कर गए। पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के समय में करप्शन की जो घुन लगी-सरदार मनमोहन सिंह के समय में उसकी धुन पर अब देश के सारे चुन-मुन तक थिरकते नजर आ रहे हैं। आजादी के एक साल के अंदर यानि 1948 में पहला घोटाला सामने आया-जीप घोटाला। सेना के वास्ते जीपें खरीदी गई थीं। खास शख्स ने रोल अदा किया था। मोल-तोल हुआ था। पर कुछ दिन बाद ही पोल-खोल के बोल के ढोल पिटने लगे थे। आवाज आई-खरीद में झोल है। करप्शन के इस घोल में जीपें आईं पर घटिया और ज्यादा दाम पर। हल्ला हुआ। लंदन में तत्कालीन उच्चायुक्त वी के के मेनन इसमें फंसे। पर सियासत को खेल-खेल में खेल करने की ट्रेनिंग मिल चुकी थी। जिस पर आरोप लगे वो लंदन से हटाए गए पर नेहरू मंत्रिमंडल में जगह पा गए। सेना प्रमुख थिम्मैया को नाप दिया गया। 1955 में नेहरू जी ने घोटाले की फाइल बंद कर दी। फाइल तो बंद हो गई पर इस जीप खरीद घोटाले का खेला हमने चीन के साथ 1962 की जंग में झेला जब इन जीप की जरा सी मिट्टी-गिट्टी में सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई थी। उस वार में हार बार-बार आज तक कचोटती आ रही है। हिंदुस्तान की जमीन पर आज तक चीन की बीन बज रही है। 1951 में एक और घपला सामने आया। मुदगल कांड। फेस बचाने को नेहरू जी ने जांच के लिए एडीगोरवाला को केस सौंपा। एडीगोरवाला ने रिपोर्ट दी- नेहरू कैबिनेट के कई मंत्री और ज्यादातर अफसर करप्ट हैं। जनहित व देश हित से ज्यादा वे सारे स्वहित में लीन हैं। ऐसे मंत्रियों व अफसरों को हटाने की सिफारिश सरकार यानि नेहरू जी से की गई। पंडित जी हिम्मत नहीं जुटा पाए। रिपोर्ट रद्दी में गई। पर यह जरूर बता गई कि देश किस राह पर है। शायद उस वक्त जवाहर लाल नेहरू की कोई मजबूरी रही होगी। लौहपुरुष सरदार पटेल की बेटी मणिबेन की डायरी में इसका खुलासा किया गया है। इस डायरी का फिर से प्रकाश्न एक किताब के रूप में होने जा रहा है। 16 साल तक कांग्रेस के हर कदम की साक्षी रहीं मणिबेन की किताब में लिखा गया है कि सरदार पटेल ने करप्शन के चलते रफी अहमद किदवई को हटाने की पंडित जी से गुजारिश की थी। जिसे ठुकरा दिया गया था। किदवई ने खुलेआम कहा था कि अगर उन्हें हटा दिया गया तो वे सरकार के साथ-साथ पंडित नेहरू के राज तक खोल डालेंगे। काश उस वक्त पंडित जी सख्त हो जाते तो आज देश की तस्वीर कुछ और होती। करप्ट नेताओं व अफसरों पर लगाम नहीं लग पाई। नतीजा सब बेलगाम हो गए। इसके बाद की याद बेहद कड़वी है। एक के बाद एक घपला-घोटाला। इसके अलावा हत्या समेत दूसरे तरह के तमाम आरोपों से नेता दागदार और लोकतंत्र शर्मसार होता गया। 1957-58 में मुंदड़ा डील लोकतंत्र की खाल को छील गई। मामला ढंग से बंद तक नहीं हुआ था कि 1963 में मालवीय-सिराजुद्दीन स्कैंडल ने कांग्रेस के दामन पर एक और दाग लगा दिया। 1963 में प्रताप सिंह कैरो केस बम की तरह फटा। पर किसी मंत्री या मुख्यमंत्री का कुछ नहीं बिगड़ा। ना ही किसी ने इस्तीफा दिया। सरदार पटेल सरीखे नेता चुपचाप देखते रहे। झेलते रहे। हमेशा की तरफ हर कांड के बाद कमेटी बना दी जाती थी। बिल्कुल आजकल भी ऐसा ही होता है.संथानाम कमेटी ने 1964 में रिपोर्ट दी। साफ-साफ लिखा था कि 16 साल से देश के कुछ मंत्री खुलेआम जनता का पैसा लूट रहे है