नोटबंदी की सारी कवायद बेमानी
जब नोटबंदी का कथित लक्ष्य ही पूरा नहीं हुआ तो काहे को इतना परेशान किया
तेजवानी गिरधर

एक ओर नोटबंदी से त्रस्त आम आदमी को कोई राहत नहीं मिल पाई है, दूसरी ओर सरकार नित नए फरमानों के जरिए भ्रमित कर रही है।
हकीकत तो ये है कि आंकड़ों के मुताबिक सरकार की भी अब यह मौन स्वीकृति है कि नोटबंदी से काला धन अलग-थलग नहीं हुआ है। अलबत्ता थोड़ा-बहुत खातों में आ गया है।
ऐसे में सवाल उठता है कि नोटबंदी की वजह से ठप अर्थ व्यवस्था, परेशान नागरिक, मंदी को झेलते बाजार, शादियों में घोर आर्थिक संकट और उससे भी अधिक तकरीबन अस्सी लोगों की मौत के लिए कौन जिम्मेदार है?
सरकार भले ही यह माने या न माने कि नोटबंदी का जो मूल मकसद था, वह पूरा नहीं हुआ, यहां तक कि बाद में बताए गए अन्य मकसद भी झूठे साबित हुए, मगर सच्चाई यही है कि सरकार ऐसी जगह पर आ कर खड़ी हो गई है, जहां से पीछे तो जाया ही नहीं जा सकता, आगे का रास्ता भी सुगम नहीं है।

सरकार एक चालाकी और कर रही है।
वह कैश लेस व लेस कैश का राग अलापते हुए ऑन लाइन पेमेंट को प्रोत्साहित करने के लिए रियायतें घोषित कर रही है, मगर तब भी सवाल ये ही उठता है कि क्या बिना नोटबंदी किए डिजिटल पेमेंट को प्रोत्साहित नहीं कर सकती थी।
बेशक, डिजिटल पेमेंट एक प्रगतिशील कदम है, मगर हमारे देश की धरातलीय सच्चाई ये है कि गांवों तक इसे पहुंचाना अभी इतना आसान नहीं है। अव्वल तो उस पर भरोसा कायम करने की जरूरत है, क्योंकि जैसे ही कैश लेस की चर्चा आई है, साइबर क्राइम का डर भी उभर कर आया है।
इसमें कोई दोराय नहीं कि नोटबंदी के कदम से आम जनता बेहद, बेहद परेशान है, अब तो भाजपाई भी अपनी खुसरफुसर में स्वीकार करने लगे हैं, मगर धरातल पर सरकार के कदम के खिलाफ वह रोष नजर नहीं आया, जो कि उसकी विकट परेशानी की एवज में नजर आना चाहिए था।

इसके कई कारण हो सकते हैं।
इनमें एक ये कि लाख परेशानी के बावजूद मोदी जनता में यह संदेश देने में कामयाब हो गए हैं कि उन्होंने देशहित में एक क्रांतिकारी कदम उठाया है, जिसके लिए थोड़ी बहुत तकलीफ तो उठानी ही होगी।
असल में काले धन के नाम पर जिस प्रकार हल्ला बोलते हुए मोदी ने यह कदम उठाया, वह इस अर्थ में लिया जा रहा है कि वे देश हित में कड़वी दवा पिला रहे हैं।
जिस प्रकार हड़बड़ी में ये कदम उठाया गया और उसके बाद अस्त व्यस्त हुए बाजार व जनता में मची अफरा तफरी से यह तो स्थापित हो ही गया है कि सरकार ने पूर्व तैयारी के नाम पर कुछ नहीं किया था। सारे नए नियम बाद में हालात को सुधारने के लिए लागू किए जा रहे हैं, हालांकि उनसे राहत पहुंची हो, ऐसा कहीं नजर नहीं आ रहा।
ऐसा प्रतीत होता है कि प्रयोजित तरीके से जिस प्रकार मोदी एक अवतार के रूप में उभर कर आए और जादूई तरीके से सत्ता पर काबिज हुए, जनता में वह नशा कहीं न कहीं अब भी बरकरार है।
बेशक लोग परेशान जरूर हैं, मगर शायद वे यही सोच रहे हैं इस कदम से आगे चल कर हालात बेहतर होंगे। कदाचित काला धन रखने वालों की हालत देख कर आम आदमी को जो खुशी मिल रही है, वह कहीं उसकी तकलीफ से ज्यादा भारी है।
एक वजह और नजर आती है। वो यह कि जनता प्रतिदिन बैंकों व एटीएम के बाहर लाइन लगा कर रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने में इतनी व्यस्त है, जो कि उसकी प्राथमिकता भी है, कि आक्रोष जाहिर करना गैरजरूरी और व्यर्थ हो गया है।

स्वाभाविक सी बात है, आम आदमी रोजी रोटी का जुगाड़ करे कि रोष जाहिर करने में अपना वक्त जाया करे।
उसके रोष को मुखर करने में विपक्ष भी नाकामयाब रहा। इसमें विपक्ष की एकजुटता का अभाव तो एक बड़ा कारण है ही, पहले से परेशान जनता को बंद अथवा कोई और आंदोलन करके परेशानी में डालने पर दाव उलटा पड़ने का भी अंदेशा रहा।
भारत बंद के आह्वान का ही मसला लीजिए, जिसकी कि कहीं स्पष्ट घोषणा नहीं हुई थी, फिर भी मोदी की आईटी सेना और भाजपा इस रूप में भुना ले गई कि भारत बंद विफल हो गया है। उसने इसे रूप में भुनाया कि जनता मोदी के कदम से खुश है, इस कारण बंद में विपक्ष का साथ नहीं दिया।
सोशल मीडिया पर तो हालत ये थी कि कथित से आहूत बंद के पक्ष में एक पोस्ट आती तो उससे दस गुना ज्यादा बंद के खिलाफ अपीलें पसर जातीं।
इसे भाजपा की चतुराई ही कहा जाएगा कि जो बंद आहूत ही नहीं किया गया, वह उसके विफल हो जाने को साबित करने में कामयाब हो गई।

इस उदाहरण से यह पता चलता है कि देश को किस खतरनाक झूठ का शिकार बनाया गया।
नोटबंदी की वजह से जो परेशानी हुई है और हो रही है, वह अपनी जगह है, मगर सोशल मीडिया पर आलम ये है कि तकलीफ से जुड़ी वीडियो क्लिपिंग से कई गुना अधिक मोदी के कदम की तारीफ वाली वीडियो क्लिपिंग रोज जारी हो रही हैं।
दिलचस्प बात ये है कि परेशानी वाले संदेश व लंबी लाइनों में हो रही परेशानी के वीडियो जहां वास्तविक हैं, वहीं तारीफ वाले संदेश स्पष्ट रूप से प्रायोजित हैं, फिर भी वे भारी पड़ रहे हैं।
यानि कि मोदी का आईटी सेल जबदस्त है। उसकी तुलना में विपक्ष बिखरा बिखरा सा है। हालत ये है कि राजनीतिक पंडित यह दावे के साथ कहने की स्थिति में नहीं हैं कि मोदी के इस कष्टदायक कदम का लाभ आगामी विधानसभा चुनावों में विपक्ष को मिलेगा या नहीं।