मोदी की नोटबंदी ने अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी, बची खुची जीएसटी तोड़ देगी

मसीहुद्दीन संजरी

पांच महीने की गिनती के बाद रिजर्व बैंक ने बताया कि 99% प्रतिबंधित नोट बैंक में वापस आ गए। लेकिन उसने यह नहीं बताया कि बाकी 1% नोट के बैंक में न पहुंचे इसके लिए उसने सरकार के साथ मिलकर कौन-कौन से जतन किए थे?

नोट बंदी के बाद जो एक प्रतिशत प्रतिबंधित नोट बैंकों में जमा नहीं हो पाए वह काला धन नहीं है। वह गरीबों खासकर गृहणियों की कमाई है जो समय सीमा के अंदर बैंकों में जमा नहीं कर सकी थीं। हां, उसमें उन नोटों का भी हिस्सा है जो नेपाल में रह गयीं या अप्रवासी भारतीयों की जेबों में पड़ी रह कर रद्दी कागज़ में तबदील हो गयीं। नोट बंदी को कामयाब बताने की सनक में इन रूपयों को जमा होने से रोकने के लिए कानूनी बाधाएं तो खड़ी ही की गयीं साथ ही बैंकों पर भारी दबाव था कि पुराने नोट कम से कम जमा होने चाहिए क्योंकि सरकार को उसमें काला धन ढूंढना था। इसलिए यह माना कि 1% बैंकों में न पहुंचने वाली नोट काला धन है बिल्कुल गलत है।

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नोट बंदी के वह शुरूआती दिन याद कीजिए जब कूड़ेदान में पांच सौ और हज़ार के नोट फेंके हुए दिखाएजाते थे, नदियों में नोट की गडि्डयों की बहती हुई तस्वीरें समाचार माध्यमों की शोभा बढ़ाती हुई नज़र आती थीं। तब अपने ही पैसों के लिए बैंकी लाइन में खड़ा गरीब सारी मुसीबतें झेल कर इसलिए खुश होता था कि काला धन वीर अमीरों पर मोदी जी ने गहरा वार किया है। दमन, शोषण और गरीबी की मार झेलने वाले उस वर्ग को संतोष मिलता था कि कुछ भी हो आज वह लोग परीशान हैं जिनके चेहरे उसकी गरीबी का उपहास उड़ाते हुए दिखते थे। उसे यह कहां मालूम था कि मोदी सरकार और संघ का पूरा नेटवर्क उसकी इसी कमज़ोरी का फायदा उठा कर अपनी सनक भरे फैसले को उस पर थोप रहा था।

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जहां अल्पसंख्यकों की उल्लेखनीय आबादी थी वहां अलग तरह का प्रचार किया गया। गरीब हिंदू वर्ग को साम्प्रदायिकता का पाठ पढ़ा कर यह बताया गया था कि मुसलमान तुम से ज़्यादा परीशान है। उसे वही कूड़ेदान में पड़े नोट के बंडल दिखाए जाते थे और गंगा में बहती नोटों से भरी बोरी उसकी दिन भर की थकान को कम कर देती थी।

अब जबकि रिज़र्व बैंक के आंकड़ों ने इस बात की पुष्टि कर दी कि 99% पुराने नोट बैकों में वापस पहुंच गए तो यह भी साबित हो गया कि कूड़ेदान में पड़े नोटों के बंडल या नदियों बहती नोट भरी बोरियां एक छलावा था और सोझी समझी रणनीति के तहत नोट बंदी जैसे आत्मघाती फैसले को सही साबित करने के लिए सब कुछ गढ़ा गया था। लेकिन याद कीजिए उस समय किस तरह से मीडिया इस फैसले की वाहवाही कर रहा था। स्तम्भकारों की फौज अखबारों के पन्नों को रंग रही थी। टीवी एंकरों की लनतरानी तो याद ही होगी। सोशल मीडिया पर सरकार और संघ पोषित सेना सरकार के एक गलत फैसले को सही साबित करने के लिए विरोधियों का पीछा कर रही थी।

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इसे इसलिए भी याद रखिए क्योंकि जीएसटी के मामले में यही तमाशा आप देख चुके हैं और आने वाले समय में ऐसे और तमाशे देखने को मिल सकते हैं जो देश की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ सकती है। देश की जीडीपी चिन्ताजनक स्थिति में पहुंच चुकी है। अब नहीं जागे तो आगे सोने की फुर्सत ही नहीं मिलेगी।

देश एक भयंकर आर्थिक मंदी की तरफ बढ़ रहा है।