नोटबंदी में ग़रीबों की ज़िंदगी बेहाल; सकारात्मक कदम उठाये प्रशासन
नोटबंदी में ग़रीबों की ज़िंदगी बेहाल; सकारात्मक कदम उठाये प्रशासन
नोटबंदी में ग़रीबों की ज़िंदगी बेहाल; सकारात्मक कदम उठाये प्रशासन
इंदौर, 29 नवंबर, 2016.
नोटबंदी से ग़रीबों व मज़दूरों को जिन परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, वे सरकार की कल्पनाओं में भी शामिल नहीं हैं। प्रधानमंत्री को लगता है कि इस देश के ग़रीबों के पास भी इतनी बचत है कि वे 50 दिनों तक घर बैठ कर खा सकते हैं। क़रीब 20 दिनों से मंडियाँ बंद पड़ी हैं, हम्माल बेकार हैं, रबी की बुआई के लिए पैसों की किल्लत है और शहरों में निर्माण गतिविधियाँ लगभग बंद हो गई हैं। केन्द्र सरकार ने नोटबंदी से जुड़े हुए जो कदम उठाये हैं, उनसे ग़रीबों के लिए रोज़गार का बड़ा संकट खड़ा हो गया है।
हालात को देखते हुए आज वामपंथी दलों, समाजवादी पार्टी, और अन्य अनेक जन संगठनों व संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने इंदौर कलेक्टर को सकारात्मक सुझाव देते हुए 29 नवंबर 2016 को ज्ञापन सौंपा।
ज्ञापन सौंपने गए प्रतिनिधिमंडल में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के ज़िला सचिव रुद्रपाल यादव, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के ज़िला सचिव कैलाश लिंबोदिया, संदर्भ केन्द्र से अर्थशास्त्री डॉ. जया मेहता, मध्य प्रदेश प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव विनीत तिवारी, आम आदमी पार्टी के जयप्रकाश, समाजवादी पार्टी के गोपाल कुशवाह और अक़बर शामिल थे।
ज्ञापन में कहा गया है कि जो सवाल राष्ट्रीय राजनीति के स्तर पर हल होने हैं, उनके लिए हमारे राजनीतिक अभियान और कार्यक्रम चल रहे हैं किंतु शहर के मेहनतकश और आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों के लिए कुछ राहत के उपाय स्थानीय प्रशासन के स्तर पर किये जा सकते हैं।
ज्ञापन में कहा गया है कि नोटबंदी का सबसे बुरा असर निर्माण कार्य में लगे मज़दूरों पर हुआ है।
रियल स्टेट के कारोबार में मंदी आने से दैनिक वेतन पर काम करने वाले दिहाड़ी मज़दूरों के सामने रोज़गार का भीषण संकट खड़ा हो गया है।
अनेक ऐसे महिला-पुरुष मज़दूर हैं जिन्हें 8 नवंबर की नोटबंदी की घोषणा के बाद से उन्हें एक भी दिन काम नहीं मिला है। जिन्हें काम मिला भी है उन्हें भुगतान बंद हो चुके 1000 और 500 के नोटों में किया जा रहा है जिसे वे कमीशन देकर 100, 200 और कभी 300 रुपये कम में भी चला रहे हैं।
आसपास के ग्रामीण इलाकों के भी बुरे हाल हैं। मंडियाँ बंद हैं और प्रदेश में हज़ारों हम्माल बेरोज़गार हैं। रबी की बुआई पर भी बुरा असर पड़ा है।
ज्ञापन में कलेक्टर से माँग की गई है है कि महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी योजना के क्रियान्वयन पर विशेष ध्यान देने के साथ ही इंदौर के शहरी मज़दूरों के लिए भी शहरी रोज़गार की इसी तरह की योजना बनाई जाए और शासकीय काम खोले जाएँ ताकि इन मज़दूरों को रोज़गार हासिल हो सके।
अराजकता की स्थिति न बने इसके लिए ये आवश्यक है कि मज़दूरों को रोज़गार उपलब्ध करवाया जाए।
ज्ञापन देने गए प्रतिनिधिमंडल में शामिल अर्थशास्त्री डॉ. जया मेहता ने कलेक्टर पी. नरहरि को कहा कि हम लोगों ने अनेक जगह पाया कि अनेक मज़दूरों के पास किसी किस्म का कोई कार्ड नहीं है, जबकि वो इसी शहर में किराये से मकान लेकर बरसों से रह रहे हैं।
ज्ञापन में कलेक्टर को ये सुझाव भी दिया गया है कि मज़दूर चौकों पर और ग़रीब बस्तियों में युद्धस्तर पर उनके पहचान पत्र, ग़रीबी रेखा के कार्ड और उनके अधिकार की अन्य सुविधाएँ देने के लिए ज़रूरी कागज़ात तैयार करवाये जाएँ और इनके आधार पर स्थानीय ज़िला प्रशासन से ऐसी व्यवस्था करवाई जाए कि ग़रीब लोगों की राशन, चिकित्सा, आवास और शिक्षा की आवश्यकताएं ज़रूर और बिना देरी के पूरी हों।
ज्ञापन में ये भी माँग की गई है कि जब तक नोटबंदी से उपजी अव्यवस्थाएँ और परेशानियाँ दूर न हो जाएँ तब तक ग़रीबों के आवास को अतिक्रमण या स्वच्छता मिशन या किसी भी अन्य वजह से उजाड़ना बंद किया जाए।
प्रतिनिधिमंडल ने नरहरि को बताया कि नोटबंदी के बाद से अनेक जगह अतिक्रमण हटाने के नाम पर और हाल में नगर निगम ने नंदानगर, बाणगंगा और महू रोड से स्वच्छता अभियान के नाम पर ग़रीब लोगों के घर तोड़े हैं। द्वारिकापुरी में लोगों को अपना सामान निकालने का भी मौका नहीं दिया। जब ग़रीब लोग इतनी मुश्किलें झेल रहे हैं तो उनकी रिहायश या रोजगार को तोड़ना अमानवीय है और इस पर तुरंत रोक लगनी चाहिए।
इस पर कलेक्टर नरहरि ने कहा कि अमानवीयता नहीं होनी चाहिए और अगर कहीं ऐसा हुआ है तो उसकी शिकायत करवाएँ। उन्होंने ये भी कहा कि अभी अनेक शासकीय योजनाओं तक ग़रीबों की पहुँच आसान बनाने के लिए अनेक नियमों में ढिलाई की गई है।
प्रतिनिधिमंडल ने ये माँग भी कि मज़दूर चौकों पर मज़दूरों के मज़दूर कार्ड बनवाने हेतु श्रम विभाग की ओर से विशेष प्रयास किये जाएँ।
प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों ने कहा कि इन कामों में हमारे संगठन भी मदद के लिए तैयार रहेंगे।
ज्ञापन देने गए प्रतिनिधिमंडल ने कलेक्टर से पी. नरहरि से ये भी कहा कि जिस तरह से नोटबंदी के बाद परिस्थितियाँ बन रही हैं, उनसे निकट भविष्य में जनता की परेशानियाँ बढ़ सकती हैं। अगर ज़िला प्रशासन हमारे सुझावों पर ध्यान दे तो इंदौर में उठाये गए कदम पूरे देश के लिए मिसाल बन सकते हैं और आम जनता भी राहत महसूस करेगी।
कलेक्टर नरहरि ने प्रतिनिधिमंडल को आश्वासन दिया कि वे इन सुझावों पर ज़रूर गौर करेंगे।


