नोटबंदी - राजकीय आतंक की पराकाष्ठा, इस मौद्रिक तानाशाही और राजकीय आतंक के खिलाफ आवाज उठाएं
नोटबंदी - राजकीय आतंक की पराकाष्ठा, इस मौद्रिक तानाशाही और राजकीय आतंक के खिलाफ आवाज उठाएं
नोटबंदी - राजकीय आतंक की पराकाष्ठा, इस मौद्रिक तानाशाही और राजकीय आतंक के खिलाफ आवाज उठाएं
मधुवन दत्त चतुर्वेदी
महापीड़ा और क्षति जो नोटबंदी ने देश को दी, उससे देश उबरा नहीं है।
अभी भी ज्यादातर एटीएम चालू नहीं हैं और बैंक से अनुमन्य अधिकतम निकासी हो नहीं रही।
बेरोजगार हुए लोग बहाल नहीं हो पाए हैं और बाजार में मुद्रा की कमी से ठंडक है। किसान बेहाल और बर्बाद हैं। कहीं सब्जियां मुफ्त में बाँट रहे हैं तो कहीं फेंक रहे हैं। गुजरात में आंदोलित हैं, पर ख़बरों में नहीं हैं। पचास दिन मांगे थे पीएम ने, जो गुजर चुके हैं।
सपनों के भारत की जगह लकवाग्रस्त आर्थिक परिदृश्य सामने है। लेकिन खबरों से नोटबंदी के सवाल गायब हैं। मीडिया में असल सवालों पर न चर्चा है न नतीजों की कोई खबरें हैं।
प्रधानमंत्री से लेकर सरकार के सभी अंग और बीजेपी के सभी नेता नोटबंदी से जुड़े तथ्यों पर चुप हैं। यहाँ तक कि यह भी नहीं बताया जा रहा कि कुल कितने नोट बाहर थे और कितने जमा हो गए।
सरकार और आरबीआई इन पचास दिनों में रोज अपने वायदों से मुकरे हैं। मीडिया में नोटबंदी के नफे-नुकसान के आंकलन पर सन्नाटा पसरा है। राजकीय आतंक की यह पराकाष्ठा है। इस मौद्रिक तानाशाही और राजकीय आतंक के खिलाफ आवाज उठाइये। दूध के धुले तो न ये हैं न वे हैं।
पूंजीवादी पार्टियों के नेताओं में सात्विकता की बात बेमानी है। लेकिन जिस तरह खुद मोदी और बीजेपी के बाकी नेता न केबल भाषणों में विपक्षी नेताओं को धमकाते हैं बल्कि राज्यसत्ता का पूरा प्रयोग निर्लज्जता के साथ उन्हें डराये रखने के लिए कर रहे हैं, वह बहुत गलत है।
नोटबंदी पर ममता का मुखर विरोध सामने आया तो टीएमसी सांसदों के खिलाफ पुराने मामले में गिरफ़्तारी के लिए सीबीआई का उपयोग किया। राहुल और कांग्रेस के लोगों से कई बार सरेआम कहा गया कि मुंह न खोलें वरना अपने खिलाफ कार्यवाही को तैयार रहें।
मायावती, मुलायम सिंह आदि को डराकर रखने की ख़बरें आम हैं। केजरीवाल के विधायकों के खिलाफ दिल्ली पुलिस के दुरूपयोग की बदनाम कोशिशें जग जाहिर हैं। आखिर जनता के सवालों को उठाने पर यह धमकियाँ और कार्यवाहियां क्यों ? गलत लोगों के खिलाफ कार्यवाही करना सत्ता का कर्तव्य है।
सामान्य स्थिति में कार्यवाही न करके, कार्यवाही के अधिकार का प्रयोग इस बात के लिए सुरक्षित रखना कि यदि वे आपके गलत कामों पर बोलेँ तब इस अधिकार से उन्हें डराकर रोकेंगे खुद में बहुत बड़ा भ्रष्ट और तानाशाहीपूर्ण रवैया है। यह लोकतंत्र पर, जनहितों पर गहरी चोट है।


