नोटबंदी-समाज को भ्रष्ट करने की प्रक्रिया, देश के साथ ऐसा मजाक नहीं किया जा सकता मि. मोदी
महेंद्र मिश्र

देश के साथ ऐसा मजाक नहीं किया जा सकता है। और एक शासक अपनी जनता से करे यह तो कतई अक्षम्य है।
मोदी जी का भ्रष्टाचार के सामने ये समर्पण है।
कहां तो कहा गया था कि नोटबंदी से आतंकवाद खत्म होगा। फर्जी नोटों की कब्र खुदेगी और भ्रष्टाचार की जड़ पर चोट होगी। लेकिन 20 दिनों पहले जहां से चले थे वहीं फिर आकर खड़े हो गए।
नतीजा ढाक के तीन पात है।

अब खुद सरकार ने कालाधन खपाने का नया विकल्प दे दिया है।
50 रखकर 50 देने की नई स्कीम सामने है।
दो महीने पहले खत्म हुई योजना से महज 7 फीसदी ज्यादा टैक्स देकर।
चंद दिनों पहले जिन नोटों को रद्दी कागज का टुकड़ा करार दिया गया था, उसे फिर जिंदा कर दिया गया।

इसके पहले रोजाना कोई नई-नई घोषणा होती रही।
इतिहास में इस तरह की कई नजीरें हैं जिनमें शासकों के फैसले का खामियाजा जनता को भुगतना पड़ा है, और शासक भी उसकी मार से नहीं बच सके। मुगल शासक मोहम्मद शाह रंगीला उसी में से एक है। जिसे जनता की कोई फिक्र नहीं थी। और उसकी सनक उस पर भारी थी।
दौलताबाद को रद्द कर फिर से दिल्ली को राजधानी बनाने का तुगलक का फरमान याद किया जा सकता है। जब तुगलक की पूरी सेना थक हारकर तबाह हो गई और उसका शासन भी जाता रहा।

हिटलर का रूस पर आक्रमण इसी कड़ी का हिस्सा है।
जब रुस की सेना से ज्यादा साइबेरियाई सर्दी उसके सैनिकों पर भारी पड़ी। इसने सिकंदर महान के एशिया कूच के आखिरी दुस्साहस की याद दिला दी। जब उसे भारत से खाली हाथ लौटना पड़ा। रास्ते में उसके सैनिक और वो खुद भूख-प्यास से मारे गए।
सरकार भले ही नोटबंदी की बंदी की औपचारिक घोषणा न करे लेकिन उसका अब कोई मतलब नहीं रह गया है। उससे कालाधनधारियों को परेशानी तो नहीं होगी लेकिन जनता की मुसीबतें जरूर पहले की तरह बनी रहेंगी।
हां एक फायदा जरूर हो सकता है पटेल के हस्ताक्षरों के नोट बाजार में आ जाएंगे। और मोदी साहब के शासन की याद दिलाते रहेंगे। लेकिन इसकी कीमत बहुत बड़ी चुकानी पड़ी है।
80 से ज्यादा लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। और हजारों शादियां रोकनी पड़ीं। कई जगहों पर लोग अपनी इज्जत और स्वाभिमान को गिरवी रखते देखे गए।
दिन-रात, सोते-जागते कतारें 1 अरब 25 करोड़ लोगों के जीवन का हिस्सा बन गईं।

नोटबंदी न हुई अलादीन का चिराग हो गया।
मोदी साहब ऐसे जादूगर हो गए एक फूंक मारेंगे सब दुरुस्त। लेकिन हकीकत की धरातल से उठकर बात जब सपनों में होने लगती है तो उसके टूटने में देर ज्यादा नहीं लगती है।
आतंकवाद के खात्मे का सच सामने है।
बीजेपी समर्थक नोटबंदी से सीमापार आतंकवाद के खात्मे का दावा करते नहीं थकते थे। लेकिन सच यही है कि इस दौरान आतंकी हमले बदस्तूर जारी रहे।
घाटी में मंगलवार को ही एक हमले में 2 अफसरों समेत सात सैनिक शहीद हो गए।
कहां तो सर्जिकल स्ट्राइक को युद्धबंदी का हथियार बनना था, कहां वो सैनिकों की मौत का मुहाना बन गई।
ऊरी के बाद का ये सबसे बड़ा नुकसान है और सर्जिकल स्ट्राइक के बाद सैनिकों की शहादत का सिलसिला जारी है।
यह मीडिया की मोदी पर मेहरबानी है कि वो मुद्दा नहीं बन रहा है। कोई दूसरी सरकार होती तो उसका अब तक जीना दूभर हो जाता।

नोटबंदी का सबसे बड़ा लाभ नकली नोटों का खात्मा बताया गया था।
2000 की नोट देखकर लोगों को अपना बचपन याद आ जाता है। जब वो नकली नोटों के साथ खेला करते थे। जिनकी हू बहू शक्ल कुछ ऐसी ही होती थी। जानकारों का कहना तो यहां तक है कि इसके लिए अलग से ब्लाक भी बनाने की जरूरत नहीं है। इसकी फोटोस्टेट कॉपी इससे ज्यादा असली दिखेगी। किसी आतंकी गिरोह ने नहीं बल्कि मध्य प्रदेश के कुछ बच्चों ने यह प्रयोग कर डाला और उसे बाजार में चला भी दिया।
बैंकिंग व्यवस्था का झोल ये है कि आम लोगों तक पहुंचने से पहले इसकी गड्डियां आतंकियों तक पहुंच गईं।
चंद दिनों पहले मारे गए कुछ आतंकियों के पास से मिली नई नोटें इसकी खुली गवाह हैं।
जिस भ्रष्टाचार के खात्मे का सबसे ज्यादा ढोल पीटा जा रहा था, वो इस तरह से फूटेगा इसका किसी को अंदाजा भी नहीं रहा होगा। खुलेआम खुली बाजार में नोटों की 30 से 35 फीसदी पर बदली हो रही है। यहां तक कि बैंकों की चेस्ट से सीधे कालाधनधारियों के घरों में पैसे जा रहे थे। निजी बैंक इसके सबसे बड़े साधन बन गए।
कई बैंकों में तो रात-रात भर नोटें बदलने की खबरें आयी हैं।
बैंकों के पिछले दरवाजे कालाधनधारियों के लिए थे। सामने जनता कतार में खड़े रहने के लिए अभिशप्त थी। सरकार चला रही पार्टियों के कालेधन की व्यवस्था सरकारी बैंकों के जरिये हुई। तो विपक्षी दलों ने अपने प्रत्याशियों और कार्यकर्ताओं के जरिये उसे ठिकाने लगवाया। नतीजा यह था कि सारा पैसा जमा होता दिख रहा था।
बताया जा रहा है कि 19 दिन में 8 लाख करोड़ से ज्यादा पैसा बैंकों में जमा हो गया है। और अभी योजना को 32 दिन बचे हैं। अगर यही गति जारी रही तो सारा पैसा बैंकों में होगा। और सरकार की पूरी योजना पर पानी फिर जाएगा। लिहाजा सरकार ने भागते भूत की लंगोटी को पकड़ना ही सही समझा। और उसने फिफ्टी-फिफ्टी योजना का ऐलान कर दिया। वरना उसके पास दिखाने के लिए अब कुछ होगा भी नहीं।
वैसे भी अगर खुली बाजार में 30-35 पर बदली की सुविधा मिल रही हो तो कितने लोग सरकारी प्रस्ताव में रुचि दिखाएंगे। उसके बारे में कुछ कहना मुश्किल है लेकिन आसार बहुत कम हैं।
हां इस कड़ी में एक बात जरूर हो गई कि सरकार ने समाज के बड़े हिस्से को भ्रष्टाचार का नमक चटा दिया।
इसमें कालाधन धारी अपने रिश्तेदारों से लेकर परिवारियों और साथ काम करने वाले कर्मचारियों से लेकर गरीब तबके तक को काली नोटों को सधाने का हथियार बना दिए।
समाज को भ्रष्ट करने की इस प्रक्रिया ने उसमें शामिल जनता के नैतिक बल को कमजोर कर दिया है। आज नहीं इसके नतीजे दीर्घकालिक होंगे।