नोट बंदी बन गई किसानों के शोषण का हथियार
मसीहुद्दीन संजरी

आजमगढ़, 19 नवंबर। नोट बंदी से घर चलाने और रबी की बुवाई का संकट झेल रहे किसानों का शोषण हो रहा है।

साहूकार देहातों में धान की खरीदारी आधे दाम पर कर रहे हैं और पैसों के लिए किसान अपनी फसल बेचने पर मजबूर है।

गांवों में घूम कर साहूकार किसानों से नए नोट के बदले धान की खरीदारी 1200 रू प्रति कुंतल कर रहे हैं। लकिन नोट बंदी के बाद भयानक मुद्रा संकट झेल रहे किसानों को वही साहूकार पुराने नोटों में 800 रू प्रति कुंतल का दाम दे रहे हैं। जबकि धान की खरीदारी का सरकारी मूल्य 1500 रू प्रति कुंतल है।

दूसरी तरफ ग्रामीण क्षेत्रों में बैंक जब चाहते हैं पैसा नहीं है कह कर लेन देन बंद कर दे रहे हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में आज कई स्थानों पर एक हज़ार रूपया प्रति व्यक्ति खुदरा नोट दिए, वह भी केवल उन लोगों को जिनके बैंक में एकाउन्ट हैं। जबकि सरकार ने सीधे नोट बदलने वालों के लिए भी 2000 रू की सीमा निर्धारित की है।

जहां तक एकाउन्ट से पैसे निकालने का सम्बंध है तो वह सीमा 24000रू प्रति व्यक्ति प्रति सप्ताह है।

एक तरफ सरकार कहती है कि धन की कमी नहीं है। दूसरी तरफ बैंक और पोस्ट आफिस में बताया जा रहा है कि धन नहीं आया। आखिर इनमें झूठा कौन है।
क्या सरकार देश से झूठ बोल रही है? उसे गरीब–किसानों की कोई चिंता नहीं है?
क्या बैंक और पोस्ट आफिस से पैसे कहीं और जा रहे हैं? क्या चोर दरवाजे से काले धन को सफेद किया जा रहा है?

सवाल अनेक हैं जवाब एक भी नहीं।