नोबेल पुरस्कार विजेता गुंटर ग्रास का निधन
नोबेल पुरस्कार विजेता गुंटर ग्रास का निधन
नोबेल पुरस्कार विजेता और वर्जनाओं को तोड़ने वाले जर्मन लेखक गुंटर ग्रास का 87 की उम्र में उनका निधन हो गया है।
16 अक्टूबर 1927 को गुंटर ग्रास सामान्य परिस्थितियों में पैदा हुए थे पर उनकी जिंदगी उतार चढ़ाव से भरी रही। उनके माता-पिता की ग्दांस्क शहर में उपनिवेशी सामानों की दुकान थी। ग्राहक गरीब थे, अक्सर खाते पर लिखवा जाते, मकान छोटा था, आसपास का माहौल कैथोलिक था। ग्रास ने 17 साल की उम्र तक विश्व युद्ध का आतंक देखा, 1944 में विमान रोधी टैंक दस्ते के सहायक के रूप में और बाद में कुख्यात नाजी संगठन एसएस के सदस्य के रूप में। लेकिन अपने इस अतीत को उन्होंने दशकों तक छुपाए रखा, जब बताया तो हंगामा मच गया। उस समय तो युद्ध के दिन काटने थे।
गुंटर ग्रास ने मुख्य रूप से ड्रामा, काव्य और उपन्यास लिखा। उनकी नामी रचनाओं में कैट एंड माउस, डॉग इयर्स, द मीटिंग एट टेल्गटे, द रैट, माई सेंचुरी, क्रैबवॉक शामिल हैं। इन उपन्यासों में राजनीतिक परिस्थितियों और सामाजिक बदलाव का चित्रण है। मसलन जीडीआर में 1953 के विद्रोह में बुद्धिजीवियों का योगदान, 1968 का छात्र आंदोलन, संसदीय चुनाव प्रचार, भविष्य से जुड़े मुद्दे या बाल्टिक सागर में शरणार्थियों से भरे जहाज का डूबना।
गुंटर ग्रास अत्यंत रचनाशील और बहुत सारी कलाओं को समर्पित बहुविध क्षमता वाले कलाकार थे। वे राजनीतिक मामलों में हस्तक्षेप के जरिए भी बहस पैदा करते रहे। लंबे समय तक वे जर्मनी में नैतिकता का पैमाना माने जाते रहे।
2012 में ग्रास की एक कविता "जो कहा जाना चाहिए" आई और हंगामा खड़ा कर गई। यह कविता इस्राएल की राजनीति पर कड़ी चोट थी। ग्रास ने ईरान पर इस्राएली परमाणु हमले के खिलाफ चेतावनी दी और इस्राएल की परमाणु क्षमता, और उसके कब्जे की नीति को विश्व शांति के लिए खतरा बताया।
गुंटर ग्रास को आलोचना के बाद इस्राएल में अवांछित घोषित कर दिया गया। उनके खिलाफ यहूदी विरोध के आरोप भी लगे।
यहां गुंटर ग्रास (ग्युंटर ग्रास) की रचना बेहद बतौर श्रद्दांजलि प्रस्तुत है, जिसका रूपांतरण किया है उज्ज्वल भट्टाचार्या ने-
बेहद
- ग्युंटर ग्रास
छुट्टी के दिनों के बीच
शाम को ज्योंही खामोशी छाती है
पढ़ता हूं ऑरवेल का काल्पनिक उपन्यास 1984,
जिसे मैंने 1949 में पहली बार
अलग़ ही अंदाज़ में पढ़ा था.
बगल में, सरौते और तंबाकू के पैकेट के पास,
पड़ी हुई है आंकड़ों की एक किताब,
आंकड़े हैं दुनिया की आबादी के,
कैसे उसे भोजन मिलता है – नहीं मिलता है,
सन 2000 तक बढ़ती हुई – तंग होती हुई.
बीच-बीच में,
जब मैं तंबाकू की ओर हाथ बढ़ाता हूं
या एक बादाम तोड़ता हूं,
वे परेशानियां मुझे घेर लेती हैं,
जो बिग ब्रदर या
प्रोटीन की विश्वव्यापी कमी की तुलना में
कहीं छोटी हैं,
लेकिन बाज़ नहीं आती हैं खींसे निपोरने से.
अब पढ़ता हूं मैं निकट भविष्य में जिरह के तरीकों के बारे में.
अब मुछे आंकड़ों का ख्याल रखना है :
दक्षिण एशिया में बाल-मृत्यु दर का
हाल का नमूना.
अब धुनने लगता हूं किनारों को,
क्योंकि छुट्टी से पहले मिटा हुआ झगड़ा
बंध चुका पैकेटों में : इल्सेबिल की इच्छाएं.....
बादाम के छिलकों से आधा ऐशट्रे भरा हा.
कुल मिलाकर सब कुछ हद से ज़्यादा.
कुछ न कुछ हटाना पड़ेगा : भारत
या अभिजात सामुहिकता
या हमारा जाना-पहचाना क्रिसमस.
रूपांतर - उज्ज्वल भट्टाचार्य


