वामपंथ को अपना मीडिया तन्त्र विकसित करना चाहिये ?
डॉ. गिरीश, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के सचिव हैं। उत्तर प्रदेश में वामदलों की बची हैसियत से कहीं ज्यादा सक्रिय रहते हैं। पिछली 30 सितंबर को भाकपा ने लखनऊ में एक बड़ी रैली की लेकिन राहुल बाबा और मोदी की रैलियों की सीधी कवरेज देने वाले तथाकथित तटस्थऔर निष्पक्ष मीडिया में यह रैली प्रमुख खबर न बन सकी। डॉ. गिरीश ने इसी संदर्भ में इंकलाब जिंदाबाद ब्लॉग पर पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित एक लेख लिखा है और सवाल किया है कि भाकपा अथवा अन्य वामदलों के प्रति मीडिया ऐसा घिनौना रवैय्या क्यों अपनाता है? हस्तक्षेप के पाठक भी इस लेख को पढ़कर मीडिया की तटस्थता का जायजा ले सकते हैं। (संपादक-हस्तक्षेप)

30 सितम्बर को लखनऊ में भाकपा की विशालकाय रैली में भाग लेकर उत्साह से लबरेज पार्टी और जन संगठनों के नेता और कार्यकर्ता अगले दिन जब अपने-अपने जिलों में वापस पहुँचे तो सभी को इस बात की उत्सुकता थी कि रैली की खबर अख़बारों में पढ़ी जाये, और तमाम लोगों ने अलग-अलग अख़बार खरीद डाले। लेकिन उन्हें यह देख कर भारी हैरानी हुयी कि किसी भी अख़बार में रैली के बारे में एक भी पंक्ति का समाचार नहीं था। गुस्से और हताशा में उन्होंने मुझे फोन किये। अख़बारों पर तो खीझ उतारी ही मुझे भी नम्रता पूर्वक नसीहत दी कि हमें मीडिया से रिश्ते बढ़ाने चाहिये, मीडिया मैनेजमेंट दुरुस्त करना चाहिये वगैरह-वगैरह। कईयों ने तो गुस्से में यह भी कहा कि हमें टी.वी.चैनल्स के खिलाफ प्रदर्शन करना चाहिये, अख़बारों की होली जलानी चाहिये और उन्हें सबक सिखाना चाहिये। यहाँ स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि राज्य नेतृत्व मीडिया को पर्याप्त तरजीह देता है। यहाँ उल्लेखनीय है कि रैली की खबरें लखनऊ में समाचारपत्रों ने प्रकाशित की थीं। लेकिन वे लखनऊ संस्करणों तक सीमित थीं। बगल के जिलों बाराबंकी अथवा उन्नाव तक में किसी भी अख़बार में एक पंक्ति भी पढ़ने को नहीं मिली। अलबत्ता उर्दू अख़बारों और हिंदी के अख़बार ‘कल्पतरु एक्सप्रेस’ ने खबर को प्रदेश भर में छापा। इसी तरह रैली में किये गये आह्वान पर 21 अक्टूबर को जिलों-जिलों में सफल सत्याग्रह/ जेल भरो आन्दोलन चलाया गया। जिलों में मीडिया के लिये इसकी खबर को नजरंदाज करना सम्भव नहीं था और सम्बन्धित जिले की खबर उस जिले के पन्ने पर सिमट कर रह गयी। प्रदेशव्यापी कार्यक्रम की यह खबर भी मीडिया ने स्थानीय बना कर रख दी।

सवाल यह है कि भाकपा अथवा अन्य वामदलों के प्रति मीडिया ऐसा घिनौना रवैय्या क्यों अपनाता है? जबकि हम हर पल हर घड़ी खुली आँखों से देख रहे हैं कि छोटे-बड़े तमाम पूँजीवादी दलों के अदने नेताओं और अत्यंत छोटी घटनाओं की खबरें न केवल लाइव चलाई जाती हैं अपितु पूरे-पूरे दिन उन्हें खबरिया चैनलों पर चला कर औसत दर्शक के साथ बलात्कार किया जाता है। अख़बार भी उन्हें आवश्यकता से अधिक जगह देते हैं। यह सर्व विदित है कि आज का विशालकाय मीडिया कॉर्पोरेट घरानों के हाथों में है और उन्हीं के हित पोषण में लगा रहता है। कॉर्पोरेट जगत अपने हितों के लिये पूरी तरह चौकन्ना है और अपने मीडिया पर उसका पूरा-पूरा कंट्रोल है। निष्पक्षता का उसका साइन बोर्ड आज तार-तार हो चुका है। टी.आर.पी.बनाये रखने को यदा-कदा कुछ वाम नेताओं को भी दर्शा दिया जाता है, परन्तु जनता के हित में की जाने वाली वामपंथ की बड़ी से बड़ी कार्यवाही का ब्लैकआउट किया जाता है। ऐसा इसलिये हो रहा है कि यह केवल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और वामपंथ ही है जो किसानों,कामगारों और आम जनता के हितों पर चोट कर रहे कॉर्पोरेट घरानों और पूँजी समूहों की लूट को न केवल समझता है अपितु उसको रोकने और बेनकाब करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा। ऐसे में आखिर क्यों पूँजीवादी मीडिया भाकपा और वामपंथ को बढ़ावा देने वाले समाचारों को महत्त्व देगा? ‘हित अनहित पशु पक्षिन जाना’।

ऐसे में अपनी ख़बरों, अपने राजनैतिक कर्तव्यों और अपनी गतिविधियों को न केवल आम जनता अपितु अपने कार्यकर्ताओं तक पहुँचाने के लिये हमें आत्म निर्भर बनना होगा। वर्ग विरोधियों से दया अथवा सदाशयता की उम्मीद करना अकर्मण्यता अथवा कायरता ही कही जायेगी। यह कटु सत्य है कि आज हम उत्तर प्रदेश में अपना दैनिक समाचार पत्र तो क्या साप्ताहिक पत्र तक निकालने की सामर्थ्य नहीं रखते। पर जरूर हम एक दिन पहले अपना साप्ताहिक पत्र निकालेंगे और फिर दैनिक भी। हौसला बुलंद हो और इरादा पक्का तो कोई काम असम्भव नहीं है। लेकिन यह तो आगे की बात है। लेकिन हमारा पार्टी जीवन लगातार प्रकाशित हो रहा है और पार्टी सम्बंधी तमाम समाचार और जानकारियाँ हमें उपलब्ध करा रहा है। परन्तु हम उसको लेकर कतई गम्भीर नहीं हैं। सवाल उठता है कि क्या हमारे एक-एक कार्यकर्ता को उसका पाठक और ग्राहक नहीं होना चाहिये? क्या हमें अपने हमदर्दों, शुभचिंतको, पड़ोसियों और मित्रों को उसका ग्राहक और पाठक नहीं बनाना चाहिये? क्या जनसंगठनों के नेताओं और कार्यकर्ताओं को इसके प्रचार-प्रसार और ग्राहक विस्तार के काम को गम्भीरता से नहीं लेना चाहिये। अवश्य ही हम सबको वह सब कुछ करना चाहिये कि हमारा अपना पार्टी जीवन हमारे हर कार्यकर्ता तक पहुँचे और हर शुभचिंतक को पढ़ने को मिले। यह कार्य कमेटियों में फैसला लेने अथवा कोटा निर्धारित करने से होने वाला नहीं है। आज यह हमारे लिये एक बड़ी चुनौती है और इस चुनौती को हमें मिशन के तौर पर लेना होगा। हम सब मिल कर इस चुनौती को स्वीकार करें और अक्टूबर, नवम्बर और दिसम्बर माहों में पार्टी जीवन के रिकॉर्ड तोड़ ग्राहक बनायें। लाल सलाम।

डॉ. गिरीश