पटना पुस्तक मेला

पटना। दो दर्जन से अधिक लेखकों, पत्रकारों व पुस्तक प्रेमियों ने पिछले माह जिलाधिकारी को पत्र लिखकर बीती 10 नवंबर से 24 नवंवर तक चले पुस्तक मेले की गड़बड़ियों की तरफ ध्यान दिलाते हुए माँग की थी कि पुस्तक मेला में पुस्तक-पाठक संस्कृति का विकास सुनिश्चित करने के लिए पुस्तक मेला के आयोजनों में सरकार की विभिन्न संस्थाएँ- बिहार राज्य सार्वजनिक पुस्तकालय प्राधिकार, ग्रंथ अकादमी, राष्ट्रभाषा परिषद, भाषा अकादमियों आदि को सहभागी बनाया जाए।

त्र में कहा गया है कि पुस्तक मेला लेखक व पाठकों के बीच सीधा संवाद स्थापित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण आयोजन होता है जिसे राज्य सरकार और जिला प्रशासन का सहयोग मिलना सर्वथा प्रशंसनीय व सकारात्मक काम है। मगर अफसोस है कि पटना पुस्तक मेला आयोजन समिति ने इसे अधिकतम कमाई का माध्यम बना दिया है। इस वर्ष पुस्तक मेला में स्थानीय प्रकाशकों, प्रमुख पुस्तक विक्रेताओं को स्थान नहीं देकर और लेखकों, कलाकारों की उपेक्षा करके आयोजन समिति ने मर्यादा की सारी हदें पार कर दी हैं। आयोजन की प्रमुख गड़बडि़याँ निम्नलिखित हैं:-

“बिहार सरकार ने 10 नवंबर से 24 नवंबर 2013 तक आयोजित पटना पुस्तक मेला के लिए गाँधी मैदान में रियायती दर पर जमीन उपलब्ध कराई थी। लेकिन पुस्तक मेला की आयोजन समिति ने पुस्तक स्टॉलों का किराया सामान्य से अधिक निर्धारित किया जिससे स्थानीय प्रकाशकों, यथा-भारती भवन, अनुपम प्रकाशन, जागृति, जानकी प्रकाशन, जनचेतना, वातायन, विशाल पब्लिकेशन सहित दर्जनों लोकभाषाई प्रकाशकों व पुस्तक विक्रेताओं को पुस्तक मेला में हिस्सेदारी करने का अवसर नहीं मिल सका। पुस्तक मेला में पुस्तक विक्रेताओं से मनमानी दर पर किराया वसूलने से आयोजक नाॅवेल्टी परिवार को लगभग 7 करोड़ रुपये से अधिक की आमदनी होने का अनुमान है। जबकि मेला में पुस्तकों के खरीदार पाठकों को दस प्रतिशत से अधिक रियायत नहीं मिल सकी। उल्लेखनीय है कि नेशनल बुक ट्रस्ट द्वारा आयोजित पुस्तक मेला की तुलना में पटना पुस्तक मेला में स्टाॅलों का किराया चार गुना अधिक रखा गया। हम पुस्तकप्रेमी, पाठकों, लेखकों, पत्रकारों की राय है कि अगर पुस्तक विक्रेताओं को मेला आयोजन समिति द्वारा रियायती दर पर स्टाॅल दिए जाते तो पुस्तक विक्रेता ग्राहकों को कहीं अधिक रियायत दे पाते। पुस्तक मेला आयोजन समिति ने आगंतुक पाठकों को जरूरी सुविधाएँ उलब्ध कराने का ध्यान भी नहीं रखा। मैदान में धूल नियंत्रण का कोई बंदोबस्त नहीं हुआ, ना ही पेयजल आदि की व्यवस्था की गई थी। आगजनी जैसी दुर्घटनाओं की रोकथाम की कोई व्यवस्था भी नहीं की गई।“

त्र में अनुरोध किया गया है कि पुस्तक मेला में पुस्तक-पाठक संस्कृति का विकास सुनिश्चित करने के लिए पुस्तक मेला के आयोजनों में सरकार की विभिन्न संस्थाएँ- बिहार राज्य सार्वजनिक पुस्तकालय प्राधिकार, ग्रंथ अकादमी, राष्ट्रभाषा परिषद, भाषा अकादमियों आदि को सहभागी बनाया जाए। जिला प्रशासन और राज्य सरकार सरकारी संस्थाओं के साथ सजग लेखकों, पाठकों की सहभागिता से एक निगरानी समिति का गठन करें जो भविष्य में पुस्तक मेला के आयोजन की निगरानी के लिये अधिकृत हो।

जिलाधिकारी, पटना को पत्र लिखने वालों में अमरनाथ (वरिष्ठ पत्रकार), पुष्पराज (पत्रकार, लेखक), रामचन्द्र लाल दास (वरिष्ठ अधिवक्ता, पटना उच्च न्यायालय), रणजीव (नदी-पानी विशेषज्ञ), अनन्त (स्वतंत्र पत्रकार), मनीष (स्वतंत्र पत्रकार), अभिषेक नंदन (स्वतंत्र पत्रकार), शरद रंजन शरद (कवि, पत्रकार), सचिन कुमार (शोध छात्र), जरिन फातिमा (पत्रकार), अभिनन्दन कुमार (कुमार विनीत पत्रकार), राजेश शुक्ला (वातायन), श्रीकांत व्यास (साहित्यकार), श्याम भद्र (स्वतंत्र पत्रकार), पुर्णेन्दु मुखर्जी (अवकाशप्राप्त प्राध्यापक), निवेदिता (वरिष्ठ पत्रकार), रजनी शंकर (पत्रकार), निलांशु रंजन (वरिष्ठ पत्रकार), मुन्ना कुमार झा (सामाजिक कार्यकर्ता), इन्द्रदेव राय (संयोजक मंडल सदस्य शरत् चन्द्र प्रेमचंद जयंती समिति), सुमन (प्रगतिशील साहित्य सदन), विशाल (विशाल प्रकाशन) व मंजेश राजधारी (सामाजिक कार्यकर्ता) शामिल हैं। पत्र की प्रतिलिपि अध्यक्ष, बिहार राज्य सार्वजनिक पुस्तकालय एवं सूचना केन्द्र प्राधिकार बिहार, पटना, सचिव, कला एवं संस्कृति विभाग, बिहार सरकार सचिव, मानव संसाधन विभाग, बिहार सरकार व मुख्यमंत्री, बिहार को भी प्रषित की गई थी।