पता नहीं कैसा फासीवाद है, मैं फिर से सोने जा रहा हूं
पता नहीं कैसा फासीवाद है, मैं फिर से सोने जा रहा हूं
इलाहाबाद से वापस आने के बाद आज मैं दिन भर सोया। समझ ही नहीं आ रहा कि इस देश में किसानों का असली खलनायक कौन है। मसलन, करछना के आठ गांवों में जेपी के पावर प्लांट के लिए सरकार ज़मीन कब्जाती है। कुछ किसान ज़मीन नहीं देते। कोर्ट में जाते हैं। कोर्ट कहती है कि जिन्होंने मुआवजा लिया है, वे उसे लौटाकर अपनी जमीन वापस ले लें। प्रशासन मुआवजा वापस लेने के लिए कोई कानूनी प्रक्रिया नहीं चलाता। इसके बजाय असहमत किसानों के परिवारों को जेल में डाल देता है और गांव में बलवा कर देता है। डीएम बदल दिया जाता है।
गांव वाले बताते हैं कि गांव में पुलिसिया हमला करवाने वाले डीएम कौशल राज शर्मा ने धमकी दी थी कि जिस तरह उसने मुजफ्फरनगर में दंगा करवाया था, वैसे ही यहां भी करवा सकता है इसलिए सुधर जाओ। उसका कानपुर तबादला हो जाता है। नया डीएम संजय कुमार आता है। कनहर गोलीकांड के बाद यही डीएम सोनभद्र में लाया गया था। वह अनौपचारिक बातचीत में पिछले डीएम को दंगा स्पेशलिस्ट बताता है। जनता उसे कवर-अप स्पेशलिस्ट कहती है। पत्रकार कहते हैं कि जिन जमीनों को लेकर मामला फंसा है, वे सारी अधिग्रहण से पहले एडीएम और एसडीएम की पत्नियों और सगे-संबंधियों के नाम कर दी गई थीं, इसलिए किसानों को मुआवजा वापसी का नोटिस नहीं दिया जा रहा कि बात कहीं खुल ना जाए।
इस दौरान एक किसान नेता राजबहादुर पटेल के सिर पर 12000 का ईनाम रख दिया गया है। वह भागा फिर रहा है। इस कहानी की जितनी भी परते हैं, आश्चर्यजनक रूप से सभी में से कंपनी का जिक्र गायब है। एक कहानी किसान बनाम सरकार की है। दूसरी कहानी सपा बनाम भाजपा की है। तीसरी कहानी में कांग्रेस का एक नेता है। चौथी कहानी में नौकरशाहों का भ्रष्टाचार है। दिल्ली में बैठे हम लोग कहानी को एक ही चश्मे से देखते हैं: पूंजीवाद, फासीवाद, आर्थिक सुधार और विस्थापन। अजीब देश है। कोई भी कहानी सीधी नहीं है। पता नहीं कैसा फासीवाद है। मैं फिर से सोने जा रहा हूं।


