"पदोन्नति में आरक्षण का विरोध नहीं तो लोकसभा में वोट नहीं"-यूपी में कर्मचारियों का नारा
"पदोन्नति में आरक्षण का विरोध नहीं तो लोकसभा में वोट नहीं"-यूपी में कर्मचारियों का नारा
उ प्र में मतदान के तीसरे चरण के पहले पदोन्नति में आरक्षण पर राजनीतिक दलों से रुख साफ़ करने की मांग
उदित राज के बयान से कर्मचारियों में गुस्सा
पदोन्नति में आरक्षण का विरोध नहीं तो लोकसभा में वोट नहीं
लखनऊ। उ प्र के 18 लाख कर्मचारी ,अधिकारी और कई लाख सेवानिवृत्त कर्मी व उनके परिवार जन पदोन्नति में आरक्षण का समर्थन करने वाले तथा इस बाबत वोट की राजनीति में चुप्पी साधे राजनतिक दलों की "वोट की राजनीति का वोट से करारा जवाब" देंगे।
सर्वजनहिताय संरक्षण समिति उ.प्र. ने कांग्रेस एवं भाजपा सहित सभी राजनीतिक दलों से मांग की है कि वे प्रदेश में तीसरे चरण के मतदान के पहले पदोन्नति में आरक्षण पर अपने दल की राय स्पष्ट करें जिससे प्रदेश के सरकारी विभागों, निगमों के कर्मचारी, अधिकारी एवं सेवानिवृत्त कार्मिक यह तय कर सकें कि वे तथा उनके परिवारजन लोकसभा चुनाव में उन्हें वोट दें या न दें। समिति ने पदोन्नति में आरक्षण पर भाजपा में हाल में ही आये उदित राज के बयानों पर नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए भाजपा अध्यक्ष श्री राजनाथ सिंह से मांग की है कि वे यह स्पष्ट करें कि भाजपा पदोन्नति में आरक्षण के विरोध में दिए गए मा सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का सम्मान करेगी और इस सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को पलटने हेतु राज्यसभा में पारित 117 वें संविधान संशोधन बिल का पुरजोर विरोध करेगी।
समिति के अध्यक्ष शैलेन्द्र दुबे तथा प्रमुख पदाधिकारियों ए ए फारुकी,एच एन पांडेय,आर के सिंह,एस आर सोनी,डी सी दीक्षित,कायम रज़ा रिजवी,कमलेश मिश्र,रामराज दुबे,आर पी उपाध्याय,शिवगोपाल सिंह,ओंकार नाथ तिवारी,राम सेवक शुक्ल,ज्ञानेश्वर,संजीव रत्न,नूर आलम,दूध नाथ मिश्र,यू पी सिंह,समरजीत सिंह,पी के दीक्षित,त्रिवेणी मिश्र,शिव प्रताप सिंह,पी के सिंह,एस पी सिंह,वाई एन उपाध्याय,सुशील त्रिपाठी,डॉ मौलेंदु मिश्र,रमाकांत दुबे,सर्वेश शुक्ल,अजय तिवारी,राजीव श्रीवास्तव,देवेन्द्र द्विवेदी,प्रमोद दुबे,अजय सिंह,आर एस सिन्हा,विजय त्रिपाठी,आलोक मिश्र ने आज यहाँ जारी बयान में कहा कि जिस प्रकार राज्यसभा में प्रमुख राष्ट्रीय दलों ने मिलकर 117 वां संविधान संशोधन बिल पास किया था उससे प्रदेश के कर्मचारियों में इस बाबत काफी चिंता है और यह ज़रूरी हो गया है कि राजनीतिक दल अपना रुख स्पष्ट करें जिससे कोई भ्रम न रहे। उन्होंने कहा कि पदोन्नति में आरक्षण के चलते मायावती सरकार के पांच वर्षों के शासन के दौरान सामान्य व पिछड़े वर्ग के कार्मिकों की पदोन्नति पूरी तरह ठप्प रहीं और लम्बी लड़ाई के बाद मिले मा सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलटने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जायेगा।
समिति के पदाधिकारियों ने कहा, इस मामले में भाजपा में हाल ही में आये उदित राज के बयान कि भाजपा ने पहले भी तीन बार संविधान संशोधन कर पदोन्नति में आरक्षण दिया था और अब पुनः दलितों को इस मामले में कोई शंका नहीं होनी चाहिए,से सामान्य व पिछड़े वर्ग के कार्मिकों में भारी गुस्सा है अतः भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह को स्थिति स्पष्ट करना चाहिए।
समिति के पदाधिकारियों ने कहा कि सर्वजनहिताय संरक्षण समिति उ प्र, उ प्र के 18 लाख कर्मचारियों व अधिकारियों का एक गैर राजनीतिक संगठन है जिसका उद्देश्य कर्मचारी हितों के लिए संघर्ष करना है और समिति का फैसला है कि लोकसभा चुनाव में पदोन्नति में आरक्षण समर्थक दलों या इस मामले में वोट की राजनीति के बहाने चुप्पी साधने वाले दलों का विरोध किया जायेगा। उन्होंने कहा कि सरकारी सेवाओं में ज्येष्ठता व श्रेष्टता के बजाये जाति के आधार पर पदोन्नति की वकालत करने वालों की वोट की राजनीति का वोट से दिया जायेगा करारा जवाब।
इस संबंध में कर्मचारियों के नेता शैलेन्द्र दुबे ने भारतीय जनता पार्टी के नेता नरेंद्र मोदी को एक खत भी लिखा है, जो इस प्रकार है-
पत्र सं0 16/पदोन्नति में आरक्षण दिनांक - 16.03.2014
सेवा में,
मा0 श्री नरेन्द्र मोदी जीो
प्रधानमंत्री पद के भाजपा के प्रत्याशी
भारतीय जनता पार्टी
नई-दिल्ली।
विषयः- पदोन्नति में आरक्षण सम्बन्धी 117वें संविधान संशोधन बिल को पूरी तरह वापस कराने हेतु।
महोदय,
आपको विदित ही है कि संसद के शीतकालीन सत्र में केन्द्र सरकार ने अनुसूचित जाति/जनजाति के कार्मिकों को सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण देने हेतु 117वां संविधान प्रस्ताव विगत 17 दिसम्बर 2012 को राज्यसभा में पारित कराया है। यह संविधान संशोधन प्रस्ताव वोट की राजनीति के चलते पारित कराया गया है जिससे 27 अप्रैल‘2012 को इस सम्बन्ध में मा0 सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये फैसले (2011 के सिविल अपील नं0 2608) को निष्प्रभावी किया जा सके। राज्यसभा में बिल पारित कराने हेतु आपके दल ने व्हिप जारी किया, जो अत्यन्त दुर्भाग्यूपर्ण है।
2. उल्लेखनीय है कि इसके पूर्व भी मा0 सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों को निष्प्रभावी करने हेतु चार बार संविधान संशोधन किये जा चुके हैं। 77वां संविधान संशोधन 17 जून‘1995 को, 18वां संविधान संशोधन 09 जून‘2000 को, 82वां संविधान संशोधन 08 सितम्बर‘2000 को, और 85वां संविधान संशोधन 04 जनवरी‘2002 को किया गया। इस प्रकार विगत में किये गये चार संविधान संशोधन में से तीन संविधान संशोधन एन0डी0ए0 सरकार द्वारा किये गये हैं। इन सभी संविधान संशोधनों के जरिये मा0 सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों को निष्प्रभावी किया गया है। अब पांचवीं बार राज्यसभा में किये गये 117वें संविधान से देश भर के सामान्य व अन्य पिछड़े वर्ग के 78 प्रतिशत कर्मचारियों-अधिकारियों व समाज के बड़े हिस्से में भारी आक्रोश है। पदोन्नति में आरक्षण व परिणामी ज्येष्ठता के कारण अनुसूचित जाति/जनजाति के 20-25 साल कनिष्ठ कार्मिक अपने से वरिष्ठ सामान्य व अन्य पिछड़े वर्ग के कार्मिकों के बाॅस व सुपरबाॅस बन जाते हैं जिससे सामान्य व अन्य पिछड़े वर्ग के 78 प्रतिशत कार्मिकों के पदोन्नति के अवसर समाप्त हो जाते हैं, उनमें भारी कुण्ठा उत्पन्न होती है और उनकी तथा विभाग की कार्यक्षमता पर भारी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
3. उल्लेखनीय है कि पदोन्नति में आरक्षण के मामले में मा0 सर्वोच्च न्यायालय ने एम नागराज बनाम भारत सरकार (2002 के सिविल रिट पिटीशन 61) के मुकदमें में 19 अक्टूबर‘2006 को दिये गये फैसले में पदोन्नति में आरक्षण पर संवैधानिक नीति स्पष्ट कर दी है और स्पष्ट दिशा निर्देश जारी करते हुए कहा है कि पदोन्नति में आरक्षण देने के पहले बाध्यकारी कारण (compelling reasons) प्रमाणित करने होंगे जिनमें संख्यात्मक आंकड़े देकर प्रत्येक मामले में पिछड़ापन, समुचित प्रतिनिधित्व न होने और प्रशासनिक क्षमता पर पड़ने वाले प्रभाव सम्मिलित है। अत्यन्त दुर्भाग्य का विषय है कि मा0 सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का सम्मान करने के बजाय राजनीतिक कारणों से उसे निष्प्रभावी करने हेतु 117वां संविधान संशोधन प्रस्ताव लाया गया है।
4. आपके संज्ञान में लाना है कि सामाजिक न्याय के नाम पर पदोन्नति में आरक्षण दिये जाने से अनुसूचित जाति/जनजाति के 20-25 साल कनिष्ठ कार्मिक अपने से 20-25 साल वरिष्ठ सामान्य व अन्य पिछड़े वर्ग के कार्मिकों के बॉस व सुपरबॉस बन रहे हैं जो सामान्य व अन्य पिछड़े वर्ग के लिये रिवर्स डिस्क्रिमिनेशन (Reverse Discrimination) साबित हो रहा है। यह व्यवस्था सरासर अन्यायपूर्ण है। 117वां संविधान संशोधन 17 जून‘1995 अर्थात लगभग 19 वर्ष पूर्व से लागू होगा। इसका अर्थ यह है कि 19 वर्ष पूर्व से देश के कई करोड़ कर्मचारियों व अधिकारियों की वरिष्ठता सूची बदली जायेगी। जूनियर कर्मचारी सीनियर बनाये जायेंगे। इस प्रक्रिया से न केवल सामाजिक समरसता बिगड़ेगी, आपसी मुटाव बढ़ेगा, अपितु व्यापक प्रशासनिक अराजकता व्याप्त हो जायेगी। यह परिस्थितियां राष्ट्रहित में नहीं है।
5. इन परिस्थितियों में बार-बार संविधान संशोधन किये जाने से कर्मचारियों व अधिकारियों में जबरदस्त रोष है। सर्वजन हिताय संरक्षण समिति, उ0प्र0 के 18 लाख कर्मचारियों व अधिकारियों का प्रतिनिधि संगठन है जो सरकारी सेवाओं में ज्येष्ठता व श्रेष्ठता के सर्वमान्य सिद्धान्त के पक्ष में संघर्षरत है।
6. अतः आपसे निवेदन है कि व्यापक राष्ट्रहित में पदोन्नति में आरक्षण समाप्त करने के मा0 सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का सम्मान करने और राज्य सभा में पारित 117वें संविधान संशोधन बिल को निरस्त कराने हेतु आप अपने दल के चुनाव घोषणापत्र में स्पष्ट उल्लेख करने की कृपा करें जिससे प्रदेश के 18 लाख कर्मचारी, शिक्षक, उनके परिवारजन और अधिवक्ता व बुद्धिजीवी यह निर्णय ले सकें कि आगामी लोकसभा चुनाव में वे आपके दल को वोट दें या न दें। उम्मीद है कि आप वोट की राजनीति से ऊपर उठकर व्यापक राष्ट्रहित में सरकारी सेवाओं में ज्येष्ठता व श्रेष्ठता की नीति का सम्मान करेंगे।
सादर!
भवदीय,
(शैलेन्द्र दुबे)
संयोजक
प्रतिलिपि प्रतिष्ठा में -
1. मा0 श्री लालकृष्ण आडवाणी जी, नई दिल्ली।
2. मा0 श्रीमती सुषमा स्वराज जी, नेता विपक्ष लोकसभा नई दिल्ली।
3. मा0 श्री अरूण जेटली जी, नेता विपक्ष राज्यसभा नई दिल्ली।
4. मा0 श्री लक्ष्मीकान्त बाजपेयी जी, अध्यक्ष उ0प्र0 भाजपा लखनऊ।
(शैलेन्द्र दुबे)
संयोजक


