पनामा पेपर्स : मोदी निजाम की बेजान कार्रवाई
पनामा पेपर्स : मोदी निजाम की बेजान कार्रवाई
0 प्रकाश कारात
पनामा पेपर्स ने सारी दुनिया को इसकी एक झलक दिखा दी है कि किस तरह दुनिया भर में कर-स्वर्ग कहलाने वाली जगहों पर खोखा (शैल) कंपनियों और गोपनीय सत्ताओं का विस्तृत ताना-बाना बना हुआ है, जो दुनिया भर के धनवानों तथा ताकतवरों की कमाई छुपाने की जरूरतें पूरी करता है। इंडियन एक्सप्रैस ने ऐसे भारतीयों के नाम उजागर किए हैं जिन्होंने कानूनी सलाहकार फर्म मोसेक फोन्सेका की सेवाओं का उपयोग कर तैयारशुदा खोखा कंपनियां हासिल की थीं। फोन्सेका का मुख्यालय पनामा में है। इस तरह हासिल की गयी खोखा कंपनियां ब्रिटिश वर्जिन आइलेंड्स तथा केमन आइलेंड्स जैसे कर स्वर्गों में रजिस्टर करायी गयी थीं। यह पूरा का पूरा भंडाफोड़ मोसेक फोन्सेका से 2.6 टैराबाइट के 1 करोड़ 15 लाख दस्तावेजों के लीक हो जाने से ही संभव हुआ है। इंटरनेशनल कंसोर्शियम ऑफ इन्वेस्टीगेटिव जर्नलिस्टस (खोजी पत्रकारों के अंतर्राष्ट्रीय महासंघ) इन दस्तावेजों की गहराई से छानबीन की है और इस छानबीन के निष्कर्ष ही अब दुनिया भर में सौ से ज्यादा अखबारों ने छापे हैं। इंडियन एक्सप्रैस इस सामूहिक उद्यम का हिस्सा रहा है और उसने रिपोर्टों की पूरी शृंखला प्रकाशित की है, जिससे भारत में 500 लोगों के इस काले धंधे में संलिप्त होने का पता चलता है।
पनामा पेपर्स के रहस्योद्घाटनों ने पहले ही दुनिया भर में हंगामा कर दिया है। आइसलेंड के प्रधानमंत्री, गुन्नलाउग्सन को इस्तीफा देना पड़ा है। उसका नाम एक खोखा कंपनी खेालने के लिए आया है, जिसे बाद में उसकी पत्नी के नाम हस्तांतरित कर दिया गया था। प्रधानमंत्री का इस्तीफा, इस रहस्योद्घाटन के बाद संसद के सामने हुए जबर्दस्त विरोध प्रदर्शनों के बाद आया है। उधर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री ने, जिनकी बेटी तथा बेटों द्वारा कर स्वर्गों में खोखा कंपनियां खड़ी किए जाने का पता चला है, एक हास्यास्पद कार्रवाई में इस मामले की जांच करने के लिए, एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक कमेटी गठित की है। उधर ब्रिटिश प्रधानमंत्री को बड़ी कसरत से इसकी सफाइयां देनी पड़ रही हैं कि उन्होंने और उनके परिवार ने, मोसेक के जरिए उनके पिता द्वारा गठित एक फंड से वास्तव में लाभ लिया था या नहीं लिया था। दूसरे कई देशों ने भी अपने नागरिकों के इस काले धंधे में संलिप्त होने के रहस्योद्घाटनों की जांच के आदेश दिए हैं।
लेकिन, इस तरह की कार्रवाइयां ज्यादातर दिखावटी ही हैं। सचाई यह है कि यह किसी से छुपा हुआ नहीं है कि दुनिया भर के दौलतमंद तथा बड़े-बड़े कार्पोरेशन, अपना पैसा तथा परिसंपत्तियां खोखा कंपनियों में रखते हैं ताकि अपने देशों के कर कानूनों को धता बता सकें या धन-शोधन कर अपने काले धन को सफेद कर सकें। अपराध सिंडीकेट इस तरह के औजारों का इस्तेमाल नशीले पदार्थों की काली कमाई को लगाने और हथियार खरीदने के लिए करते हैं। फोन्सेका पेपर्स में पूरी 2 लाख 14 हजार ऑफ-शोर कंपनियों के बारे में जानकारियां मौजूद हैं। इसके अलावा अन्य कंपनियां भी हैं जो कर स्वर्गों में इसी तरह के धंधों में लगी हुई हैं। यह ऐसे विशद ताने-बाने की मौजूदगी की ओर इशारा करता है, जो दशकों में खड़ा किया गया है ताकि कार्पोरेशनों और धनवान तथा आपराधिक तत्वों की फलने-फूलने में मदद कर सके। कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी से संबद्ध अर्थशास्त्री, गाब्रिएल जुकमैन का कहना है कि विश्व वित्त संपदा का 8 फीसद हिस्सा, जो 76 खरब डालर बैठता है, ऑफ-शोर कर स्वर्गों में ही जमा है।
पनामा पेपर्स के इंडियन एक्सप्रैस के विश्लेषण में जो भारतीय नाम निकल कर आए हैं उनमें बड़े कारोबारी, राजनीतिज्ञ, फिल्मी सितारे, कार्पोरेट एक्जिक्यूटिव और वकील शामिल हैं। इससे पहले भी इंडियन एक्सप्रैस ने ही खोजी पत्रकारों के उसी परिसंघ के माध्यम से ऐसे भारतीयों की सूची प्रकाशित की थी, जिनके एचएसबीसी की स्विस ब्रांच में खाते थे। इसी प्रकार, इससे पहले लाइशेंस्टाइन बैंक में खाताधारकों के नाम भी सामने आ चुके हैं। इन सारे रहस्योद्घाटनों से साफ था कि किस तरह भारतीय धनवानों तथा कंपनियों द्वारा कर स्वर्गों का सहारा लेकर कर चोरी की जा रही है, अवैध रूप से हासिल की गयी संपदाओं को कमाई में लगाया जा रहा है और धन-शोधन के जरिए काली कमाई को सफेद किया जा रहा है।
मोदी ने सरकार बनाने से पहले तो इसके बड़े-बड़े दावे किए थे कि काला धन खोदकर निकालेंगे और विदेश में जमा कराया गया पैसा देश में वापस लाएंगे आदि। लेकिन, उनकी सरकार इन वादों को पूरा करने के मामले में पूरी तरह से नखदंतहीन साबित हुई है। ताजा रहस्योद्घाटनों के बाद, मोदी सरकार ने एलान किया है कि प्रधानमंत्री के ही निर्देश पर, एक विशेष बहु-एजेंसी ग्रुप का गठन किया जा रहा है जो कर स्वर्गों में भारतीयों द्वारा खड़ी की गयी ऑफ-शोर कंपनियों के सभी मामलों की छानबीन करेगा। वित्तमंत्री अरुण जेटली ने भी इस संबंध में काफी बतकही की है कि किस तरह इस प्रकार के रहस्योद्घाटन विदेश में अवैध रूप से छुपाकर रखे गए पैसे को वापस लाने में मदद करेंगे। लेकिन, इस सरकार का अब तक का रिकार्ड उसकी बातें के संबंध में कोई भरोसा नहीं जगाता है। मोदी सरकार बने दो साल हो गए हैं और जहां तक बाहर से काल धन वापस देश में लाने का सवाल है, इस सरकार ने शायद ही कुछ किया है। जिन लोगों ने पैसा अवैध रूप से देश से बाहर गुप्त खातों में जमा कराया है और खोखा कंपनियां चला रहे हैं, उनके मामले को मोदी सरकार सिर्फ कानूनी-गैर-कानूनी के तकनीकी नजरिए से ही देख रही है। पहले आए रहस्योद्ïघाटनों के नतीजे में उन लोगों को सिर्फ कुछ नोटिस दिए गए हैं, जिन्होंने अवैध रूप से दूसरे देशों में पैसा जमा कर के रखा है और खोखा कंपनियां चला रहे हैं। जहां तक जेटली के इस दावे का सवाल है कि बहुपक्षीय संधियों से भारत को इस तरह की अवैध गतिविधियों का पता लगाने में मदद मिलेगी, वह शायद ख्याली पुलाव ही पका रहे हैं। सभी जानते हैं कि मिसाल के तौर पर पनामा ने आर्थिक सहयोग तथा विकास संगठन (ओ ई सी डी) द्वारा सूत्रबद्घ की गयी इंटरनेशनल ऑटोमैटिक इन्फॉर्मेशन एक्सचेंज ट्रीटी पर दस्तखत ही नहीं किए हैं। वैसे भी ऐसी संधियों में छोड़े जाने वाले चोर दरवाजे, कर स्वर्गों द्वारा इस तरह के निर्देशों का अनदेखा किया जाना सुनिश्चित करने के लिए काफी होती हैं।
वित्त मंत्री और रिजर्व बैंक के गवर्नर इसकी भी रट लगाए हुए हैं कि दूसरे देशों में किए जाने वाले इन कंपनी-अधिग्रहणों तथा खातों में अनेक जायज भी हो सकते हैं। यह असली मुद्दे से बचकर निकलने की कोशिश करना है। वर्ना सरकार को खोखा कंपनियों के अधिग्रहणों और कर स्वर्गों में गुप्त खाते चलाए जाने को वैधता प्रदान करने की क्या जरूरत है? इससे पहले सरकार कुछ खातों तथा कुछ व्यापारिक सौदों के संबंध में अपनी पूछताछ में मोसेक फोन्सेका से जानकारियां हासिल करने में ही विफल रही थी। इसके बावजूद, हमारी सरकार ने एक असहयोगी कर क्षेत्र के रूप में पनामा को काली सूची में डालने के कदम उठाने की जरूरत नहीं समझी, जबकि फ्रांस की सरकार ने उसके मामले में ठीक यही कदम उठाया था।
अगर मोदी सरकार काले धन, कर चोरी तथा धन शोधन पर अंकुश लगाने के लिए प्रति वाकई गंभीर है, उसे भारतीयों के ऐसी खोखा कंपनियां हासिल करने और कर स्वर्गों में गुप्त खाते चलाने पर एक सिरे से प्रतिबंध लगा देना चाहिए। इसके अलावा, पानामा पेपर्स में जो नाम आए हैं, उनसे जुड़े अवैध धन तथा परिसंपत्तियों को जब्त किया जाना चाहिए। लेकिन, यह सरकार ऐसा करने की हिम्मत ही नहीं कर सकती है क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय वित्त का समूचा ताना-बाना ही, कर स्वर्गों तथा खोखा कपंनियों के विशद संजाल के साथ गुंथा हुआ है। आखिरकार, पिछली एनडीए सरकार ने ही बाहर से वित्तीय निवेशों के लिए मॉरीशस मार्ग खोला था, जो काले धन के शोधन का तथा घुमाकर देश का पैसा वापस लाने का एक बहुत बड़ा स्रोत बन गया है।
पनामा पेपर्स पर सरकार ने जिस तरह की कार्रवाई करती नजर आ रही है, वह इसी को साबित करती है कि मोदी सरकार सिर्फ मामले की सतह के ही खुरचकर रह जाएगी। वह कर स्वर्गों, धन शोधन तथा काले धन के उत्पादन के पूरे ढांचे को छूने के लिए भी तैयार ही नहीं है। 0


