परिवर्तन की बयार और बदगुमान मीडिया
परिवर्तन की बयार और बदगुमान मीडिया
लोकतन्त्र के बजाय कारपोरेट नियन्त्रित तानाशाही
को चुनने के लिए विवश तो नहीं हो रहे ?
सुन्दर लोहिया
देश और दुनिया में इस समय परिवर्तन की बयार बह रही है उससे भारतीय मीडिया जिस प्रकार से बेखबर है उससे इसकी गुलाम मानसिकता साफ झलक रही है। क्रिकेट के कर्कश शोर के बीच में क्रिकेट के भगवान बताये जा रहे सचिन को भारत रत्न के सम्मान का इतना बखान किया गया मानों भारत का नाम विश्व इतिहास में स्वर्णाक्षरों में लिखा गया हो। सचिन को भारत रत्न उनके शानदार खेल की बदौलत मिला जिसके वह हकदार हैं लेकिन मीडिया ने इस देश के एक वैज्ञानिक को इसी सम्मान से नवाजे जाने की खबर को हाशिये की लाइन में दिखा कर अपनी गैर जिम्मेवाराना नज़रिये और विज्ञान के प्रति उपेक्षा का प्रमाण ही पेश किया है। जबकि ब्रिटेन से बीबीसी की हिन्दी खबरों में चिन्तामणि नागेश रामचन्द्र राव को भारत रत्न सम्मान दिये जाने की खबर को उनके कार्य की पूरी जानकारी के साथ प्रसारित करते हुए बताया कि इस वैज्ञानिक के अनुसन्धान का महत्व सचिन के एक सौ शतकों से अधिक है। भारत में जितने भी खबरची चैनल हिन्दी में हैं उन सभी में सचिन के अलावा और कुछ नहीं था।
सवाल विज्ञान और खेल की तुलना का नहीं है। दोनों में उपलब्धियां सम्मानजनक हैं। किन्तु सचिन से यह अपेक्षित है कि वह भारत रत्न सचिन कहलाने के बाद उन कम्पनियों के उत्पाद का विज्ञापन बन्द करवा दें जिसमें सचिन का फोटो साथ में छपा हुआ हो या दिखाया गया हो। क्योंकि भारत रत्न सचिन किसी कम्पनी का सेल्समैन या ब्राण्ड एम्बेसैडर नहीं होना चाहिये। वैज्ञानिक राव के बारे में ऐसी कोई शंका नहीं है। लता मंगेशकर के गाने भी किसी कम्पनी द्वारा बेचे जाते हैं लेकिन उनको हम साबुन और टायर जैसे उत्पाद के समकक्ष नहीं रख सकते क्योंकि जो ग्राहक गाने का रिकार्ड खरीदता है वह लता की आवाज़ के जादू के वशीभूत होकर खरीदता है। इसमें लता की आवाज़ का जादू है जिसे कम्पनी बेच रही है। पर साबुन या टायर में सचिन का जादू नहीं वह कम्पनी का नाम है जिसे सचिन कम्पनी के लाभ के लिए प्रचारित करते हैं। आशा है सचिन इस ओर ध्यान देंगे।
परिवर्तन की बयार में दूसरी घटना माओवाद प्रभावित छत्तीसगढ़ से है जहां विधानसभा के लिए चुनाव समाचार पत्रों और चैनलों की सुर्खियों में है। वहां तमनार विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं ने मान्यताप्राप्त सभी राजनीतिक पार्टियों को अंगूठा दिखाते हुए अपनी तरफ से एक उम्मीदवार चुनाव में उतारा है। समय की पुकार को सुनते हुए तमनार विधान सभा क्षेत्र के मतदाताओं ने पर्यावरण और भूमि अधिग्रहण जैसे मुद्दों पर काम करने वाले राजेश त्रिपाठी के लिए चंदा इक्कठा करके चुनाव मैदान में उतारा है। इस परिवर्तनकारी समाचार के प्रसारण का श्रेय भी बीबीसी को ही प्राप्त है। इससे स्पष्ट हो जाता है कि हमारा मीडिया और हमारी जनता का रिश्ता क्या है? जनता की सकारात्मक पहल पर किसी चैनल ने बहस नहीं करवाई। वह जनता का प्रतिनिधि भले ही चुनाव हार जाये लेकिन उसकी उपस्थिति ने देश की अंघकार मय राजनीति में आशा की जो चिन्गारी पैदा की है वह इस अंधेरे से बाहर निकलने का रास्ता ज़रुर दिखायेगी।
जा़हिर है कि हमारे देश की प्रमुख दावेदार राजनीतिक पार्टियों के मुद्दे किस कदर जन विरोधी हैं। इस समय भाजपा और कांग्रेस में जो वाक्युद्ध चल रहा है उसमें इन मुद्दों की कहीं भनक भी नहीं सुनाई देती। क्या इन घटनाओं से यह सिद्ध नहीं हो रहा कि हमें अब अपने हुक्मरानों के सिर्फ चेहरे ही नहीं बदलने हैं हमें उनकी जात भी यानि वर्ग बदलने की भी ज़रूरत हैं।
तीसरी बात जो ध्यान आकर्षित कर रही है वह है कि इन राजनीतिक पार्टियों की अपेक्षा जनता ज़्यादा समझदार है। वह अपने असल तकलीफों को पहचानती हैं। उसने बता दिया कि उसके लिए मंहगाई समस्या नहीं हो सकती यदि उसके खेतों का अधिग्रहण न हो और उसके उत्पाद की उसे सही कीमत मिलती रहे। जब उसके उत्पाद भी मंहगे बिकेंगे और उसे सही कीमत मिलेगी तो वह मंहगा कपड़ा खरीद सकता है और उसे पैट्रोल और गैस की बढ़ी हुई कीमत अदा करने में कोई तकलीफ नहीं होगी। पर सरकार उसे खेतों से बेदखल कर रही है और उसकी खाद्य सुरक्षा का कानून बनाकर उसे ज़िन्दा रखने का आश्वासन दे रही है पर उसे इन्सानी रुतबा देने के लिए तैयार नहीं है। सवाल फिर भी बना रहता है कि यदि जनता ज़्यादा समझदार है तो वह अपनी समझदारी का लाभ क्यों नहीं उठाती ? शायद जनता की समझदारी स्थानीय स्तर पर सक्रिय रहती है इसका कोई अखिल भारतीय स्वरूप बन नहीं पाता इसलिए ऐसी कोशिशें स्थानीय स्तर पर उभर कर वहीं दब जाती हैं। जब कि यही मीडिया अब इतना बदगुमान हो रहा है कि मानो वह भाजपा के उम्मीदवार को प्रधानमन्त्री उतनी ही आसानी से बना देगा जितनी आसानी से उसने सचिन को भारतरत्न दिलवा दिया है। ऐसे नाजु़क समय में बुद्धिजीवियों के समक्ष सवाल है कि 2014 के संसदीय चुनाव में लोकतन्त्र के बजाय कारपोरेट नियन्त्रित तानाशाही को चुनने के लिए विवश तो नहीं हो रहे ?


