मोहम्मद आसिफ इकबाल
हम सब जानते हैं कि भाजपा और संघ के तीन मुख्य मुद्दे हैं, राममंदिर, संविधान की धारा 370 को खत्म करना और देश में एक जैसा नागरिक कोड लागू करना। लेकिन इन तीनों ही मुद्दों से जनता को आजकल सरोकार नहीं है, इस लिए इनको छोड़ कर कुछ दूसरे सामाजिक और राजनीतिक मुद्दे उठाए जा रहे हैं। जिसमें सर्वश्रेष्ठ पवित्र गाय का मुद्दा आजकल ज़ोरों पर है। यही वजह है कि देश में आए दिन गाय के बहाने ज़ुल्म व ज्यादतियों का सिलसिला बढ़ता जा रहा है। यहाँ तक कि समस्या ने गंभीर स्थिति इख्तियार कर ली है।
गाय जो किसी के पास पवित्र है, इसका अर्थ यह नहीं है कि जिनके पास वह केवल एक जानवर है, उनके साथ अत्याचार और दुर्व्यवहार किया जाए।

दूसरे शब्दों में कानून को हाथ में लेना किसी भी तरह से उचित नहीं है।

वहीं तथ्य यह है कि जब से वर्तमान नरेंद्र मोदी सरकार सत्ता में आई है, तब से उन सभी अपराधियों पर कानूनी पकड़ कमज़ोर हुई है, जो गाय की आड़ में अपने खतरनाक इरादों को अवैध तरीके से प्राप्त करना चाहते हैं।
फिर जिस तरह अभी हाल में गुजरात में मरी गाय की खाल उतारने वाले चार दलित युवकों की पिटाई का वीडियो सोशल मीडिया द्वारा सामने आया वह न केवल कानून एवं व्यवस्था की खराब स्थिति को बयान करता है बल्कि यह घटना अपने आप में कई सवाल भी खड़े करती है।
पुलिस के अनुसार वेरावल में कथित शिवसेना कार्यकर्ताओं ने पिछले हफ़्ते कुछ दलितों को तब पीटा था जब वो जानवर की खाल उतार रहे थे। हालांकि बाद में गुजरात में शिवसेना ने अपने कार्यकर्ताओं के इस मामले से जुड़े होने से इनकार किया है। लेकिन यह बात आपकी जानकारी में होगी कि उन चार दलितों को बदमाशों ने पूरे शहर में घूमाकर बेरहमी से पीटा था। जिसके बाद छह बदमाशों को गिरफ्तार किया गया, वहीं तीन अधिकारी भी सस्पेंड किए गए।
इस दुखद घटना के बाद दलितों ने उग्र प्रदर्शन किए और पुलिस के अनुसार सात लोगों ने आत्महत्या की कोशिश की। राज्य में मुख्यमंत्री आनंदीबेन ने जांच के आदेश दिए हैं और चार पुलिस कर्मचारियों को निलंबित भी किया है।

पिटाई का प्रतिशोध सुरेंद्र नगर में भी देखने को मिला है।
दलित समाज के लोग मरी हुई गाय को ट्रकों में भरकर कलक्ट्रेट दफ्तर पर पहुंच गए, और वहाँ पटक कर यह बोलते दिखे कि, संभालो अपनी मांओं को।
दलित युवकों की पिटाई के विरोध का आंदोलन और विरोध का ये तरीका पूरे गुजरात में शुरू हो चुका है। लोग मरी हुई गाय को सरकारी अधिकारियों के दफ्तर पर पहुंचा रहे हैं। मरी हुई गाय को कलेक्टर दफ्तर पर पहुंचाने का तरीका पूरे गुजरात में फैलता जा रहा है। साथ ही सोशल साइट्स पर ये तरीका वायरल हो रहा है।

लोग इसे दलित समाज के विरोध प्रदर्शन का गुजरात मॉडल नाम दे रहे हैं।
वहीं यह भी सत्य है कि गौरक्षा दल के नाम पर हर तरफ गली मौहल्ले में गुंडागर्दी के अलावा कुछ और नही हो रहा है। यही वजह है कि आए दिन मारपीट की घटनाएं सामने आ रही हैं। यह घटनाएं राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में उस वक़त सामने आना शुरू हुईं जब बिसाहड़ा में 28 सितम्बर 2015 को 50 वर्षीय अखलाक की गौमांस खाने के आरोप में हत्या की गयी थी। एक समूह ने पीट-पीट कर इख़लाक़ को हलाक कर दिया था।

....लेकिन यह वाकया सांप्रदायिक नफरत का पहला वाकया नहीं था।
साल 2014 में भी 2 अगस्त को दिल्ली के नजफगढ़ इलाके के छावला गांव में पुलिस जांच चौकी पर एक मिनी ट्रक को रोका गया। एक ओर जब ट्रक का ड्राइवर पुलिस को जाने देने के लिए मना रहा था, तभी कुछ ग्रामीण ट्रक के चारों ओर जमा हो गए और बेरहमी से उस ड्राइवर को पीट-पीट कर मार डाला।
हिमाचल प्रदेश में 16 अक्टूबर 2015 को एक 28 वर्षीय ट्रक ड्राइवर नोमन को भीड़ ने गौ तस्करी के आरोप में पुलिस की मौजूदगी में हत्या कर दी थी।
9 अक्टूबर को कश्मीर के उधमपुर जिले में भीड़ ने 18 वर्षीय जाहिद रसूल को जिंदा जला दिया जिसकी बाद में इलाज के दौरान मृत्यु हो गयी।

11 दिसम्बर 2015 को गौ रक्षा टीम ने हरियाणा के करनाल में 25 वर्षीय मजदूर की हत्या कर दी।
इसी तरह 29 नवंबर 2015 को गाय तस्करी के आरोपी आबिद को पुलिस ने हरियाणा के थानेसर कस्बे में मार डाला। यहां तक कि कश्मीर के निर्दलीय विधायक अब्दुर राशिद को विधानसभा में बीफ पार्टी के आरोप में पीटा तक गया।
दो नवंबर को भाजपा नेताओं ने कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैय्या को बीफ खाने पर सर कलम करने की धमकी दे डाली।
इसी तरह झारखण्ड में 18 मार्च 2016 को लातेहर के बालुमथ जंगलों में दो लोगों का शव पेड़ से लटका पाया गया। एक 35 वर्षीय तो दूसरा 12 वर्षीय बालूगोन व नवादा गांवों का निवासी था। ये अपनी 8 भैंसों के साथ पड़ोस के पशु मेले में जा रहे थे, जिन्हें रास्ते में एक भीड़ द्वारा रोका गया और पीट कर पेड़ पर फांसी के रूप में लटका दिया गया।

यह वह तमाम गुंडा गर्दी की घटनाएं हैं जो आम लोगों के क़ानून वयवस्था हाथ में लेने से पैदा हो रही हैं।
इसके विपरीत हरियाणा में गोरक्षा के लिए 24 घंटे की हेल्पलाईन प्रारंभ की गई है। इस हेल्पलाईन के प्रारंभ होने से गो संरक्षण में मदद मिल सकती है। वहीं इसका फ़ायदा यह भी है कि उल्लंघन के नतीजे में क़ानूनी तरीके से फैसला हो सकेगा, साथ ही गुंडा गर्दी पर भी रोक लगेगी।
दूसरी ओर केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से यह समाधान हर जगह मौजूद है इसके बावजूद गोरक्षा के नाम पर ना सिर्फ क़ानून से खिलवाड़ जारी है बल्कि क़ानून को लागू करने वाले वालों की पकड़ भी कमज़ोर होती नज़र आ रही है।

संघ का हिंदुत्व, आम हिन्दुओं या भारतीयों को स्वीकार्य नहीं है
सोशल मीडिया पर गुजरात की घटना को लेकर लोग अपने विचार दर्ज कर रहे हैं, जो किसी के लिए दिलचस्पी का स्रोत हैं तो किसी के लिए वास्तविकता से परिचित होने का। वहीं इस मौके पर यह बात स्पष्ट हो रही है कि संघ का हिंदुत्व, आम हिन्दुओं या भारतीयों को स्वीकार्य नहीं है।
इसके बावजूद मीडिया मार्केटिंग द्वारा जिस तरह वह आगे बढ़ते दिखाए जा रहे हैं, सामाजिक स्तर पर वास्तविकता इसके विपरीत है। स्थिति यह है कि भाजपा हर मोर्चे पर कमज़ोर होती नजर आ रही है। मुख्य कारण यह है कि जिन वादों और दावों के साथ वह सरकार में आए थे वे सभी वादे और दावे झूठे साबित हो चुके हैं। इसमें सबसे प्रसिद्ध दावा, "सबका साथ सबका विकास" था।
देश की वर्तमान स्थिति बता रही है कि न किसी का साथ है और न किसी का विकास, अमीर और अमीर हो रहे हैं तो ग़रीब अपनी ग़ुरबत और महंगाई के चलते और अधिक परेशान है।
इस पृष्ठभूमि में न केवल सरकारों को बल्कि जनता को भी प्रभावशाली भूमिका निभाना चाहिए। ताकि दलितों, पिछड़ों और समाज के कमज़ोर वर्गों की समस्याएं कम हों। इसके लिए आवश्यक है कि सब से पहले मनुष्यों को बराबरी का दर्जा दिया जाए। और क्यों कि भगवान ने दुनिया में इंसान को सब प्राणियों में सबसे अफज़ल रक्खा है, इसलिए उसे किसी से कमतर या तुच्छ न समझा जाए। उसकी इज़्ज़त व गरिमा को बनाए रखा जाए और उन्हें रंग, नस्ल, जाति और विभिन्न वर्गों में विभाजित करके उच्च और निचला की नज़र से ना देखा जाए। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो फिर समस्याओं में इसी तरह वृद्धि होगी, जो देश और देश वासियों, दोनों के लिए अत्यंत हानिकारक है। इसलिए, जरूरी है कि इन परिस्थितियों से निकला जाए जिनसे आज हम जूझ रहे हैं, पीड़ित और परेशान हैं।