इन दिनों बाबा साहब आम्बेडकर बहुतों के लिए अखंड रामायण पाठ के 'मंगल भवन अमंगल हारी' सरीखे सम्पुट की तरह हो गए हैं। वास्तविक सन्दर्भों और अभिप्रायों से पूरी तरह मुक्त। इन तत्वों को ' 'Annihilation of caste' में वर्णाश्रमी 'समरसता' और 'हिन्दू राष्ट्र' की सैद्धन्तिकी की पुष्टि होती दीख रही है। जिस तरह 'बुद्ध' को विष्णु का एक अवतार मानकर उन्होंने बौद्धधर्म को देश निकाला दिया था उसी तरह आम्बेडकर को बुत बनाने की उनकी तैय्यारी है।

जिस भाजपा ने देश भर में आंबेडकर को पूजा और अनुष्ठान की उपभोग वस्तु में तब्दील करने के हौसले बुलंद किये हैं, उसी भाजपा की महाराष्ट्र सरकार के शासन में दलित अपने गाँव में सिर्फ इसलिए असुरक्षित हैं, क्योंकि उन्होंने बाबा साहब आंबेडकर के जन्मदिन समरोह के सिलसिले में सांस्कृतिक जुलूस निकाले थे। गाँव में उच्च जाति के लोगों ने इसका विरोध किया और उन्हें सार्वजानिक नल से पानी पीने से रोका और दुकानदारों से दलितों को जरूरत का सामान न बेचने का हुक्मनामा भी जारी किया। दलितों के जानवरों को भी गाँव में चरने नहीं दिया जा रहा है। इस सामाजिक बहिष्कार और हिंसा की आशंका के चलते दलितों ने प्रशासन से उन्हें शहर के नजदीक बसाने की गुहार की है। गाँव में दलितों के विरुद्ध यह भगवा आतंक डॉ. आम्बेडकर के सम्मान की नयी शैली है। पहले घर से खदेड़ो फिर 'घर वापसी' करो। कहाँ है दलितों के भगवा सूरमाँ उदित राज, रामविलास पासवान और रामदास अठावले ?

http://www.thehindu.com/news/national/other-states/dalit-families-in-maharashtra-village-want-to-relocate/article7283797.ece
वीरेंद्र यादव
वीरेंद्र यादव, लेखक प्रख्यात आलोचक हैं। उनकी फेसबुक टाइमलाइन से साभार