अमित शंकर राय

पिछले 42 सालों में विभिन्न सरकारें 'लोकपाल' पर कितनी गंभीर रही हैं यह किसी से छुपा नहीं है. अन्ना के अनशन के पहले दिन रामलीला मैदान में हुई प्रेस वार्ता में जब एक पत्रकार ने प्रशांत भूषण से पूछा कि क्या सरकार से आगे होने वाली हर वार्ता यहीं जनता के बीच मैंदान में होंगी ? यह बिल ड्राफ्टिंग की प्रक्रिया में पारदर्शिता का मुद्दा था. श्री भूषण का उत्तर जानने से पहले जरा नॉर्थ ब्लाक के कमरा न 41 में हुई ज्वाइंट ड्राफ्टिंग कमेटी की प्रथम दो बैठकों की कार्यवही के अंशों पर नज़र डालें -

प्रथम बैठक (अप्रैल 16, 2011)
अन्ना - " बिल ड्राफ्टिंग के सरकारी कामकाज में पारदर्शिता के लिए 'वीडियो रेकॉर्डिंग' कराई जाये. इस पूरी प्रक्रिया को लोगों से गुप्त न रखते हुए उन्हें भी इसमें शामिल किया जाये"
प्रणब मुख़र्जी - (बैठक का अंत करते हुए ) " कमेटी के सारे विचार-विमर्श ऑडियो रिकॉर्ड होंगे"

दूसरी बैठक (मई 02, 2011) को हुई जिसमे अन्ना और अरविन्द केजरीवाल ने पुनः वीडियो रेकॉर्डिंग का मुद्दा उठाते हुए उसे लागू करने करने की मांग की. उनके अनुसार इससे वक्ता निर्धारण (स्पीकर आइडेन्टफकेशन) होगा और किस सदस्य के कमेटी में क्या विचार रहे यह स्पष्ट होगा जो ऑडियो रेकॉर्डिंग में संभव नहीं . लेकिन कमेटी के सरकारी नुमाइंदों जो यह कदापि यह नहीं चाहते थे की जनता उन पांचों वक्ताओं को विचार-विमर्श के दौरान पहचाना जा सके. अंततः ऐसा नहीं हुआ .
अब चलते हैं प्रशांत जी के जवाब पर, उन्होंने कहा की सरकार की नियत में शुरू से खोट है उसने वीडियो रेकॉर्डिंग से साफ़ मना कर दिया और टीम अन्ना के लगातार अनुरोध पर केवल ऑडियो रेकॉर्डिंग के लिए तैयार हुई और अब उसके भी टेप / सीडी जारी करने की हमारी मांग पर भी ध्यान नहीं दे रही है. यहाँ सबसे रोचक तथ्य यह है की स्वेक्छा या मांग पर छोड़िए सरकार तो आरटीआई की वैधानिक बाध्यता के बाद भी ऐसा नहीं कर रही .
वाराणसी के आरटीआई कार्यकर्ता अमित शंकर ने लोकपाल ज्वाइंट ड्राफ्टिंग कमेटी की बैठकों की रेकॉर्डिंग के विषय में जून 23, 2011 को पीऍमओ की लोक सूचना अधिकारी सुश्री संयुक्ता राय को सूचना अधिकार के अंतर्गत आवेदन कर विभिन्न जानकारिया मांगी. पीऍमओ ने यह आवेदन कार्मिक लोक शिकायत एवं पेंशन मंत्रालय के अधीन आने वाले कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) के सचिव को यथोचित कारवाही के लिए अंतरित कर दिया. कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ही लोकपाल से जुड़े मामले देख रहा है. अपने जुलाई 21, 2011 के उत्तर में डीओपीटी के अंडर सेक्रेटरी और लोक सूचना अधिकारी अमरजीत सिंह ने यह तो माना की बैठकों की ऑडियो रेकॉर्डिंग हुई है लेकिन आश्चर्यजनक रूप से अपने पास इन टेप / सीडी की उपलब्धता से इंकार कर दिया. लोकपाल से जुडी जानकारियां साझा करने के लिए उत्तरदाई इस सूचना अधिकार का यह कथन भ्रामक या यूँ कहें एक 'सफ़ेद झूठ' है. अगर यह मान भी लिया जाये की विभाग के पास टेप नहीं हैं तो उसने आवेदन को, आरटीआई के प्रावधानों के अधीन, उस कार्यालय या अधिकारी को क्यों नहीं भेजा जिसके अधिकार में यह टेप / सीडी है. यहाँ दाल में कुछ काला नहीं पूरी दाल ही काली है.

अमित शंकर ने एक और रोचक तथ्य पर प्रकाश डालते हुए कहा की उन्हें विभाग द्वारा वीडियो रेकॉर्डिंग न होने का कारण सदस्यों में 'आम सहमति' का आभाव बताया गया जबकि डीओपीटी की वेबसाईट पर उपलब्ध विवरण से यह साफ़ है की टीम अन्ना की वीडियो रेकॉर्डिंग की मांग पर केवल गृह मंत्री चिदंबरम ने विरोध दर्ज किया था जबकि बाकि चारों मंत्री मौन थे फिर भी कमिटी के अध्यक्ष प्रणब मुख़र्जी ने एक तरफ़ा फरमान सुना कर इसे सिरे से ख़ारिज कर दिया.