पुंजीवाद का यूटोपिया या ‘पुंजीवाद को पुंजीपति‍यों से बचाओ’

(फ्रांसिसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेती की पुस्तक ‘कैपिटल इन द ट्वेंटीफर्स्ट सेंचुरी’ पर टिप्‍पणी)

“ज्वार में सिरफ पुंजीपति‍यों की नावें चिपर जाती हैं” - संदीप रायजी

पिछले 16 अप्रैल को को जब फ्रांसिसी अर्थशास्त्री थॉमस पिकेती न्यूयॉर्क विश्‍वविद्यालय के प्रोशेंस्की ऑडिटोरियम में अपनी ताज़ा किताब पर पहला सेमिनार आयोजित कर रहे थे तो उनके स्‍वागत में पौल क्रुगमैन व जोसेफ स्‍तीग्लिट्‍ज जैसे नोबेल पुरस्‍कार विजेता अर्थशास्त्री और स्‍तीग्लिट्‍ज ने जिस तरह ज्ञान की शक्ति का ताज पोषित किया, उसका नतीजा ये हुआ कि पिकेती की किताब ‘कैपिटल इन द ट्वेंटीफर्स्ट सेंचुरी’ की अंगरेजी प्रकाषन के तुरन्त बाद सामने आने वाला यह जमान्‍त यूँ ही नहीं था।

विगत मार्च में अंगरेजी संस्करण के प्रकाषन के बाद से ही पिकेती की यह नई किताब ‘कैपिटल इन द ट्वेंटीफर्स्ट सेंचुरी’ लगातार चर्चाओं में बनी हुई है। यह लगातार अमेरिकी जर्नलिज्‍म के बेस्‍ट सेलर की लिस्‍ट में बनी हुई है। हम यहाँ चाहें सो अधिक पृश्‍ठों की अर्थशाष्‍त्र की इस पुस्‍तक की एक समग्र समीक्‍षा नहीं कर सकते हैं। लेकिन पिकेती की इस पुस्‍तक की एक समग्र समीख्‍षा नहीं कर सकते हैं। लेकिन पिकेती की इस पुस्‍तक की एक महत्‍वपूर्ण बात की एक संदर्भ के आधर पर इस बात की छानबीन ज़रूर कर सकते हैं कि क्‍यों अर्थशाष्‍त्र जैसे एक विषय की एक पुस्‍तक होते हुए भी इसे इतनी सफलता मिल रही है।