वसीम अकरम त्यागी

चारों तरफ अफरा-तफरी का माहौल सड़कों पर दौड़ती दंगाईयों की भीड़, औरतों की चीख पुकार, मासूम बच्चों के रोने की आवाजें, इससे सहज ही किसी सांप्रदायिक हिंसा का अंदाजा लगाया जा सकता है। सवाल ये नहीं सांप्रदायिक बवाल आखिर क्यों हुआ ? सवाल ये है कि उसे रोकने में प्रशासन विफल क्यों हुआ ? क्योंकि इस हिंसा के होने के कयास तो काफी समय से लगाये जा रहे थे अब से लगभग दो महीने पहले कैराना में हुयी एक कॉल गर्ल के साथ छेड़खानी की घटना भी काफी गरमायी थी जिसमें भाजपा विधानमंडल दल के नेता हुकुम सिंह और विधायक सुरेश राणा ने उस घटना को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की। उसी दिन से अंदाजा लगाया जा रहा था कि क्षेत्र में सांप्रदायिक राजनीति का बढ़ता दखल कभी भी सांप्रदायिक हिंसा को जन्म दे सकता है।

उसके बाद 27 अगस्त को जानसठ से सटे कवाल गांव में तीन हत्यायें हो गयी थीं। जो घटना आज हुयी है उसकी पटकथा तो उसी दिन तैयार कर ली गयी थी, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के समाचार पत्रों ने भावनाओं में बहकर रिपोर्टिंग की थी और उनका ये सिलसिला आज तक जारी रहा। और उम्मीद है आगे भी जारी रहेगा, क्योंकि अभी तक किसी भी प्रकार की कार्रावाई न ही इन समाचारपत्रों के खिलाफ की गयी है और न ही प्रशासन दंगाईयों की भीड़ को रोक पाया है।

ये पटकथा उसी दिन लिखी जा चुकी थी जब 27 अगस्त की रात को मुजफ्फरनगर के तत्कालीन डीएम सुरेंद्र सिंह जलते हुये मुजफ्फरनगर की परवाह किये बगैर ये कह रहे थे कि “अब उनके पास चार्ज नहीं है” जबकि उन्होंने अगले दिन साढ़े तीन बजे नये डीएम को चार्ज सौंपा था इस बीच मुजफ्फरनगर सुलगता रहा, पुलिस प्रशासन अपने क्षमता अनुसार कार्य करता रहा। ये पटकथा तब लिखी गयी थी जब पिछले शनिवार यानी 31 अगस्त को शोक सभा के रूप में होने वाली महापंचायत जिसे रोकने का प्रशासन ने आश्वासन दिया और वह उस पंचायत को नहीं रोक पाया था। यह पटकथा तब लिखी गयी थी जब अमन चैन और भाईचारे की बात करने वाले कांग्रेसी नेता हरेंद्र मलिक को उस महापंचायत के महामंच से यह कह कर उतार दिया गया था कि अब बदला लिया जायेगा और उसी दिन एक गाड़ी जिसमें मुस्लिम परिवार बैठा हुआ था, तोड़ फोड़ की गयी, पड़ोस के खतौली में एक मुसाफिर को ट्रेन से फेंका गया, वहाँ पर बवाल होते-होते बचा। इसके साथ ही बीते आठ दिनों में क्षेत्र से सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाली खबरें आती रहीं मगर प्रशासन व उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से कोई ठोस कार्रावाई नहीं की गयी।

सवाल ये है कि जब प्रशासन को बार-बार चेतावनी दी जा रही थी कि हालात खराब हो सकते हैं तो उन्हें रोका क्यों नहीं गया ? और जब एक बार छुट-पुट घटनाओं के साथ पंचायत सप्ताह भर पहले हो चुकी थी तो फिर आज उस पंचायत का दोबारा आयोजन नंगला मंदौड़ में क्यों किया गया ? सवाल ये है कि एक विशेष समुदाय के लोगों के खिलाफ नारे बाजी करने वाले असमाजिक तत्वों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गयी ? सवाल ये है कि जब मृतक “गौरव और सचिन के पिता कह चुके थे कि उनके बेटे तो इस दुनिया से जा चुके हैं इसलिये अब वे नहीं चाहते कि किसी और की जान व माल का नुकसान” हो तो फिर ये पंचायत का आयोजन किसके इशारे पर किया गया ?

सरधना विधायक संगीत सोम जिनके बेतुके बयानों की वजह से सरधना के हालात कई बार खराब होते – होते बचे हैं उन्हें पंचायत में क्यों बुलाया गया ? क्या ये लोग आज हुई इन हत्याओं जिनमें आईबीएन 7 के पत्रकार राजेश वर्मा और प्रशासन की ओर से पंचायत की वीडियोग्राफी करने वाले फोटोग्राफर इसरार अहमद के समेत क्षेत्र में हुई छ हत्याओं के लिये दोषी नहीं हैं ? जो भी हो इस मामले में सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव का दामन भी पाक नहीं है उनके दामन पर भी आज हुयी इन हत्याओं के छींटे हैं ऐसा इसलिये कहा जा रहा है क्योंकि चार दिन पहले ही जमीयत उलेमा-ए- हिंद के पदाधिकारियों ने उनसे दिल्ली आकर मुलाकात की थी जिनमें हाफिद मोहम्मद फुरकान, मौलाना मेहरबान अली, मौलाना जमालुद्दीन कासमी मौलाना ताहिर कासमी, मौलाना जाकिर शाही इमाम, अनीस अहमद, गौहर सिद्दीकी और अलहरीस टाईम्स उर्दू के उपसंपादक मूसा कासमी इत्यादि लोगों ने सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव को क्षेत्र में बढ़ते सांप्रदायिक तनाव से अवगत कराया था, जिस पर उन्होंने आश्वासन दिया था कि स्थानीय प्रशासन को सांप्रदायिक ताकतों से सख्ती से निपटने के निर्देश दिये जायेंगे।

मगर आज नंगला मंदौड़ में हुयी सांप्रदायिक हिंसा और उसके बाद क्षेत्र में फैली अफरा तफरी में वे सारे आश्वासन धरे के धरे रह गये, सांप्रदायिक ताकतें सांप्रदायकिता फैलाने में सफल हो गयीं। अब सवाल उठता है कि सांप्रदायिक हिंसा को रोकने की जिम्मेदारी आखिर किसकी थी ? जब शासन और प्रशासन के आदेशों को बहुसंख्यक समुदाय ने धता बता दिया तो ऐसे में कौन अम्न का पैगाम उन दंगाईयों को सुनाता जो क्षेत्र में निर्दोषों के खून से होली खेल रहे थे ? क्या इस सबके लिये अखिलेश सरकार दोषी नहीं है जिसके डेढ़ बरस के शासनकाल में सांप्रदायिक हिंसा की संख्या 50 से ऊपर पहुंच गयी है। अगर प्रशासन की ओर कोई ठोस कार्रवाई की जाती तो आज जिन निर्दोषों की जान इस हिंसा में गयी हैं शायद वे बच जातीं और इस तहरीर को लिख रहे लेखक के जेहन में ये किसी शायर का ये शेर हर्गिज न आता...।
प्यार सिखाने वाले बस्ते मज़हब के स्कूल गये
इस दुर्घटना में हम अपना देश बचाना भूल गये।