प्रोफ़ेसर यशपाल वैज्ञानिक थे, बहुत ही ज्यादा विद्वान् भी थे, लेकिन इन सबके बाद वो एक सहज इंसान थे, एक बड़े दिलवाले
प्रोफ़ेसर यशपाल वैज्ञानिक थे, बहुत ही ज्यादा विद्वान् भी थे, लेकिन इन सबके बाद वो एक सहज इंसान थे, एक बड़े दिलवाले
प्रोफ़ेसर यशपाल !
मन बार-बार 2007 की स्मृतियों में खो जा रहा जब पहली बार यशपाल जी से मिले थे. वी.वी. गिरी नेशनल लेबर इंस्टिट्यूट में एक तीन सप्ताह की एडमिनिस्ट्रेटिव ऑफिसरों के अंतर्राष्ट्रीय स्तर की ट्रेनिंग कार्यक्रम था. उसी के समापन कार्यक्रम में यशपाल जी को बुलाना निश्चित किया गया था. उस प्रोग्राम से जुड़े होने की वजह से उनको निमंत्रण देने और उनकी रजामंदी लेने मुझे जाना पड़ा था. मैं उनसे मिलने को लेकर उत्सुक भी था.
खैर मैं नोएडा उनके घर पहुंचा और उनको निमंत्रण दे उस कार्यक्रम में मुख्या अतिथि के बतौर शामिल होने का निवेदन किया.
एक बात साथ ही बता दूँ कि हमारी मुलाक़ात यहीं तक औपचारिक रही. बाद में औपचारिकताओं ने कब साथ छोड़ दिया पता भी न चला.
उन्होंने मुझसे सवाल कर दिया कि आख़िर उन्हें मुख्य अतिथि क्यों बनाना चाहते हैं? मंत्री वगैरह को क्यों नहीं बुला लेते? वे इन कामों में माहिर भी हैं और तुम्हारे इंस्टिट्यूट के लिए बाएं हाथ का काम...
फिर उन्होंने ये भी जानना चाहा कि आखिर वहाँ उन्हें मुख्य अतिथि बनाने को कैसे दिमाग में बात आई...
खैर मैंने भी बिना लाग लपेट उन्हें बता दिया ... वो सारी बात सुन मुस्कुराते हुए मेरी पीठ थपथपाया. मैंने कहा मतलब आप आ रहे हैं न...
कहे कि यदि स्वास्थ्य ने साथ दिया तो वो आना पसंद करेंगे. खैर फिर वो कार्यक्रम में आये. उनका लेक्चर और बातचीत सुनने का मौक़ा मिला. अपनी बात रखने का बहुत ही सहज अंदाज और सबकी बातें भी बहुत ही गौर और ध्यान से सुन रहे थे.
कार्यक्रम बाद उन्होंने घर जाते वक़्त मुझे भी साथ ले लिया. मैं बाहर से ही आने की इजाज़त मांगी तो नहीं मिली. कहे कि पहले घर चलो. फिर थोड़ी देर बैठक में बैठने व चाय पीने के बाद वो अपने स्टडी रूम कम लाइब्रेरी में ले गए... वो कमरा न होकर लाइब्रेरी ही था. पूरे कमरे में अलमारियों की कई कतारें और किनारे मेज व कुर्सियां.. मैं पहले दिन एक झलक इस कमरे का देखा था और जिज्ञासा बढ़ी थी मगर संकोच और सभ्यतावश न गया था. लेकिन शायद उन्होंने ये बात नोट की थी. न तो वहाँ जाकर बैठने की क्या जरूरत... मैंने कहा कि इस कमरे में तो यदि खाना पानी समय समय पर मिलता रहे तो आदमी महीनों बाहर न निकलने पर भी बोर न होगा... वे बच्चों में भी बहुत सहज रहते थे. हम लोगों के साथ इंस्टिट्यूट में एक कंप्यूटर ओपरेटर लड़की थी जो देखने में अपनी उम्र से छोटी लगाती थी तो उसको चिढाये कि लेबर इंस्टिट्यूट में चाइल्ड लेबर... बाद में उसे कितने दिनों तक हम लोग चाइल्ड लेबर कह चिढाते रहे ! वो उन्हें भी जब अपनी उमर बताने लगी तो कहने कि लगे कोई बात नहीं 14 बरस के बाद मान्य हो जाता है ...
वो वैज्ञानिक थे, बहुत ही ज्यादा विद्वान् भी थे, लेकिन इन सबके बाद वो एक सहज इंसान थे, एक बड़े दिलवाले और उसमें स्नेह की निर्झर लहरियां बहती रहती थीं.
उस सहज सह्रदय व्यक्तित्व को सलाम!
(मसऊद अख्तर की फेसबुक टाइईमलाइन से साभार)


