कमल नयन काबरा
राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन दो की सरकार ने अपने पहले बजट के समर्थन में एक बेबाक सच का सहारा लिया है। डंके की चोट पर कहा है कि ‘प्रो. बिजनेस’ यानी व्यवसाय और व्यवसायी पक्षीय और उनके प्रति सकारात्मक समर्थक-सहायक नीतियों का पालन करके वे गरीबों के पक्ष के, उनके लिए हितकर नतीजे दे सकते हैं। वर्तमान भारत की स्थिति के संदर्भ में उनके इस विचार के समर्थन में हम प्रतिष्ठित, नोबल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के विचार का भी हवाला दे सकते हैं। अभी कुछ अरसे पहले जयपुर की एक ‘साहित्यकार’ की सभा में कहा था कि 16वीं लोकसभा में वे एक व्यवसाय व्यवसायी (प्रो. बिजनेस) समर्थक, किन्तु पंथ निरपेक्ष शासकदल को देखना चाहेंगे।
पंथ-निरपेक्षता के प्रमाण खोजने के लिए तो सरकार का सालाना बजट शायद उपयुक्त मंच नहीं हो, किन्तु व्यवसायी व्यवसाय पोषक तत्वों से सन् 2014-15 का केन्द्रीय बजट लबालब भरा हुआ है। ठीक यूपीए दो की नीतियों की तरह ही, ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है: यह एक निरन्तर जारी प्रतिबद्धता की नवीनतम कड़ी भर है। किन्तु फिर भी स्पष्ट नजर आता है कि सोच, प्रतिबद्धता और राजनैतिक, सामाजिक रणनीति का खुल्लमखुला बयान, इसको किसी झाँसेबाजी के शब्दजाल से मुक्त रखना, अपने आप में उल्लेखनीय ही नहीं, प्रसंशनीय भी है। जनता को सच्चाई जानकर निर्णय करने का मौका मिल रहा है। लम्बे अरसे से जीडीपी वृद्धि, निवेश-प्रोत्साहन आदि को भारत के आर्थिक विकास का, यहाँ तक कि सामाजिक समावेशक विकास का जरिया भी बताया जाता रहा है, बिना यह बताए कि यह मूलरूप से व्यवसायों और व्यवसायियों के हितों, उद्देश्यों और स्वार्थों-हितों को बढ़ाने का रास्ता है। गैर बराबरी और व्यापक वंचना की जमीन पर व्यवसाय की आजादी गैर बराबरी के वटवृक्ष को और सींचेगी।
अचंभे की बात है कि इसके संभावित अधोगामी प्रभावों द्वारा गरीबों की हित साधना अपेक्षित मानी गयी है बिना व्यवसाय व्यवसायी पक्षधर नीतियों, कार्यक्रमों, योजनाओं के अनिवार्य रूप से ऊर्द्ध प्रवाहमान (गशिंग-अप) केन्द्रीयकृत प्रभावों से कोई छेड़छाड़ या उन पर अंकुश लगाए। आखिर छुई-मुई जैसी व्यवसायी, निवेशक, धनीमानी तबकों की अति संवेदी उद्यमिता को अक्षुण्ण रखे बिना जीडीपी यानी बाजाराधारित राष्ट्रीय उत्पादन और उसकी अनिवार्य शर्त बढ़ते निवेश को लगातार बढ़ाये रखना (जो कि प्रत्यक्ष और मूल घोषित उद्देश्य है) संभव नहीं माना गया है। विषमता वर्द्धन, धनियों को और ज्यादा धनी बनाने और राज्य द्वारा इस प्रक्रिया को सबल बनाने की जगह सीधे-सीधे, बड़ी और पहली प्राथमिकता की तरह सबको पर्याप्त, पुख्ता और सम्मानजनक रूप में आजीविका की गारन्टी आदि को राजग-दो की व्यवसाय और व्यवसायी मित्रता में जगह नहीं मिल पाती है। इन नीतियों में टैक्स कटौती का स्व-घोषित तड़का राज्य की वित्तीय क्षमता को कड़ी संकीर्ण सीमाओं में बांध देती है, खासकर राज्य द्वारा मौद्रिक प्रसार की कड़ी सीमा में बांधने को अपनी पीठ आप ठोकने का कारण मानने के चलते।
जाहिर है राज्य अपनी बिना पर सामाजिक सुरक्षा, जन कल्याण तथा और व्यवसायी वर्गों के लिये जीवन की सुख सुविधाएँ और गुणवत्ता सुधारने और उनकी उत्पादन क्षमता स्थापित करने और बढ़ाने के लिए मात्र क्षमता स्थापित करने और बढ़ाने के लिए मात्र सांकेतिक खर्च कार्यक्रम ही अपने हाथों में ले पाती है। मुख्यतः चलते आ रहे कार्यक्रमों की लकीर पीटते रहने और उन्हें घोषित रूप से घटाने हटाने का साहस नहीं जुटा सकने के कारण हमने ईमानदारी से अपनी नीतियों का रूप खुलकर सार्वजनिक करने के राजग-दो के वक्तव्य की प्रशंसा से इस लेख की शुरूआत की थी किन्तु भूलना नहीं चाहिए कि राजनैतिक ईमानदारी की सीमाएँ लांघना भी एक हद तक ही देखा गया है।
अनेक बड़े छलावों भुलावों की नींव पर ही तो सोलहवीं लोकसभा का चुनाव लड़ा गया था। अब किस्तों में हमें उनके पीछे छिपे सचों को उजागर होने की प्रतीक्षा करनी होगी।
लोकसभा चुनाव के कटु तथा अतिरंजित धुआंधार प्रचार में अर्थव्यवस्था की दयनीय स्थिति पेश की गई थी। इस साल की सरकारी आर्थिक समीक्षा में दिए गए नवीनतम आंकड़ों से इसकी पुष्टि भी होती है। अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिए राजग-दो सरकार के बजट को पहला बड़ा बहुमुखी प्रयास माना जा सकता है। देश की तात्कालिक तथा दीर्घकालिक चुनौतियों (महंगाई, बेरोजगारी, सामान्य सामाजिक सेवाओं तथा आधारभूत सुविधाओं की गहन अपर्याप्तता) को सभी रेखांकित करते रहते हैं। इनके दुष्प्रभाव से आम जन दुखी है। आम आदमी की पक्षधर अर्थव्यवस्था की आस लोग दशकों से लगाए हुए हैं। ऐसा तो नहीं हो पाया किन्तु दो भिन्न दिशाओं में चल रही नावों की सवारी करने के लिए मूल स्वरूप राजकीय राजस्व की अपर्याप्तता, विदेशी लेन-देन का बढ़ता घाटा, बैंक कर्जों का डूबते खाते में जाना, कर चोरी तथा देश से काले धन का पलायन ने अर्थव्यवस्था के रीढ़ को कमजोर अवश्य कर दिया है। इससे राष्ट्रीय आय की वृद्धि दर में सुस्ती तो आई ही है, इसने अर्थव्यवस्था के प्रबंधन संचालन की विफलता और कमजोरी को भी प्रकट किया है।
पिछले, 23-24 सालों से चली आ रही नीतियों ने थोड़े अरसे के लिए अच्छी वृद्धि दर दी जरूर लेकिन फिर वे अनिवार्यतः अपनी मंथर गति और अघोषित गुप्त गतिविधियों में लिप्त हो गईं। बीते दो तीन दशकों में बड़ी कम्पनियों को दिन दूना रात चौगुणा मुनाफा हुआ है, परन्तु मजदूर और आम आदमी की स्थिति दयनीय हुई है। आंकड़ों पर गौर किया जाए तो पिछले तीन दशकों के फैक्टरी उत्पादन में मजदूरी वेतन आदि का अनुपात 40.6 प्रतिशत से घटकर 22 प्रतिशत के इर्द-गिर्द हो गया हैं 1980 के दशक के मुकाबले इस सदी के पहले दशक में मुनाफों का हिस्सा दो गुणा हो गया है। संगठित रोजगार की ओर किसी का ध्यान नहीं है। पक्के संगठित रोजगार की वृद्धि दर करीब 6 प्रतिशत वृद्धि दर के औसत के साथ मात्र 0.5 प्रतिशत रह गई है।
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