जुगनू शारदेय

यह फारमूला यूपीए 2 ने विकसित किया है । फारमू

ला बहुत पुराना है । आदि काल से ले कर इंटरनेट काल तक यह विकसित हुआ है । इस फारमूला से जिस मर्ज का इलाज होता है , वह कभी कभी बहुत बढ़ जाता है । जितनी भी दवाएं दी जाती हैं , सब बेअसर हो चुकी होती हैं । तब फारमूला में कुछ घटा बढ़ा कर फिर से रोगी को कभी खिलाया जाता है , कभी पिलाया जाता है । समझिए कि यह बीमारी कठिन बोली में मधुमेह , और आसान बोली में डायबिटिज जैसी बीमारी है
। इस पर दवाओं का कोई खास असर नहीं होता । बस संयम और आदतों पर नियंत्रण रख कर ही इससे बचा जाता है । बस वैसी ही बीमारी भ्रष्टाचार है । इसी
भ्रष्टाचार को संयमित और नियंत्रित रखने के लिए यह फारमूला यूपीए 2 ने विकसित किया है ।
आप यह जानते हैं कि किसी भी फारमूले को विकसित करने के लिए काफी कुछ खोज बीन और प्रयोग करने पड़ते हैं । यूपीए 2 की अम्मा कांग्रेस पार्टी को
भ्रष्टाचार मिटाने की और भ्रष्टाचार के साथ जीने का बड़ा ही भारी अनुभव है । आपको तो याद ही होगा कि एक बार एक न्यायधीश पर , क्षमा करें न्यायमूर्ति और माननीय लिखना या कहना भूल गया , संसद में महाअभियोग चला था । सबके सामने न्यायमूर्ति और माननीय का कारनामा और धनप्रियता उजागर हो रही थी । बस लोकसभा को फैसला लेना था कि उन्हें दंडित किया जाए या बाइज्जत बरी किया जाए । समझदार वकील के पास एक और हथियार होता है संदेह का लाभ । लेकिन संसद में एक ही हथियार होता है वोट । वोट के बल पर न्यायमूर्ति और माननीय दंडित नहीं हुए । थोड़ी सी खोजबीन के बाद यह भी पता चल जाएगा कि उस समय संसद में न्यायमूर्ति और माननीय के वकील जो साहब थे कहीं आजकल माननीय मंत्री न पाए जाएं । इस प्रकार के अनेक माननीय ने मिल कर यह फारमूला विकसित किया है । जैसे आजकल कर्नाटका में भ्रष्टाचार मिटाने के लिए महामहिम हंसराज भारद्वाज कुछ नया फारमूला विकसित कर रहे हैं । जब यह यूपीए 1 में माननीय कानून मंत्री होते थे तो इटालवी व्यापारी क्वात्रची की संपत्ति उसे वापस मिले इसमें पूरी मदद की थी ।
कितने किस्से सुनाएं जाएं । हमाम में लोग नंगे तो होते ही हैं गंदे भी होते हैं । आखिर नहाओगे तो बदन का मैल पानी में मिलेगा ही । कभी एक कहावत कही जाती थी कि पैसा हाथ का मैल होता है । अब इंटरनेट काल में कहा जाता है कि भ्रष्टाचार हाथ का ही नहीं दिमाग का भी मैल होता है । बस एक और मिसाल । कितना बोर करुं आपको , कुछ तो भ्रामक जनता पार्टी के लिए छोड़ दूं ।
लोग यह समझते हैं कि केंद्रीय सतर्कता आयुक्त थॉमस साहब को केसआ नियुक्त करने के पीछे सरकार से भूल हो गई । यह गलत समझ है । वह तो फारमूला विकसित करने के प्रयोग मात्र थे । ऐसा कभी हो सकता है कि हमारे ईमानदार श्री प्रधानमंत्री , काबिल श्री गृह मंत्री से यह बात छूट जाए कि उन पर एक पुराना मुकदमा चल रहा है । दोनों श्री – श्री ने विपक्ष के बयान श्री सुषमा स्वराज के याद दिलाने के बाद भी थॉमस साहब को केसुआ बना दिया । अब मामला फिर अदालत में है । होता रहे । थॉमस साहब शान से कहते हैं कि अभी भी मैं केसुआ हूं ।
तो यह फारमूला यह है कि हम सब ईमानदार श्री हैं । अदालत श्री का क्या है, आखिर वहां भी तो वोट हो जाता है । काजग से साबित हुआ कि केसुआ पर
पामोलिन खरीद की गड़बड़ी का आरोप ही गलत था क्योंकि यथाप्रस्तावित पर उन्होने अपनी स्वीकृति दी थी । कोई कुछ कहे बढ़िया है – फारमूला यूपीए 2!