अभी तक जो बात सामने आयी उसे सुनकर हमें ऐसा लगा कि आज हम 2015 में नहीं खड़े हैं बल्कि 100 साल पहले खड़े हैं। 1919 में फासीवाद को परिभाषित किया गया था। कई लोगों ने उसे परिभाषित किया था उसे मुसोलिनी ने भी परिभाषित किया था कि कारपोरेट और सत्‍ता का विलय होना ही फासीवाद है। इस अर्थ में इसे कारपोरेटवाद भी कहा जा सकता है। उसके तीन साल के बाद यानी 1922 में वह सत्‍ता में आ गया। कहा गया कि 1924-25 में भारत में भी लगभग वही स्थिति थी कि फासीवाद आना शुरू हो गया था। लेकिन इतनी विकट स्थिति नहीं थी। जितनी वहां थी। और आज 100 वर्ष होने को है तो भी फासीवाद क्‍या है, कैसे है, क्‍यों आया यह समझ में नहीं आ रहा है। कुछ लोगों ने कहा कि कई तरह के फासीवाद से टकराना है। कुछ लोगों ने कहा कि राजनीतिक-आर्थिक व्‍यवस्‍था की पैदाइश है तो कुछ लोगों को लगता है कि मोदी के साथ फासीवाद आया है। यहां भी जो सेमिनार का विषय है 'फासीवाद के साहित्यिक-सांस्‍कृतिक प्रतिरोध के ऐतिहासिक अनुभव, उनके वैचारिक पहलू और वर्तमान सन्‍दर्भ', लेकिन कल जो एसएमएस आया था उसमें लिखा था 'सांप्रदायिक फासीवाद'। तो हमें लगता है कि हम सभी थोड़ा कन्‍फ्यूज़ हैं क्‍योंकि हमें लगता है कि फासीवाद कारपोरेट लूट के लिए होता है और उसके विरुद्ध जनता को कमज़ोर बनाने के लिए सांप्रदायिकता का सहारा लेता है। सारी जनता को आपस में तोड़ने का, बांटने का रिश्‍वत देने की एक साजिश के तहत होता है। वह सिर्फ सांप्रदायिक ही नहीं होता, वह जातीय भी होता है। जैसे कि अभी जो तमिल लेखक पर हमला हुआ वह हमला इसलिए हुआ कि उनके लेखन या उनके उपन्‍यास से कुछ लोगों को ऐसा लग रहा था कि जाति‍ विशेष या स्त्रियों का अपमान हो रहा है। या अभी जो गोविन्‍द पानसारे की हत्‍या हुई यह भी साम्‍प्रदायिकता के कारण नहीं हुई। ये कुछ उदाहरण हैं। जो बताते हैं कि लोगों को आपस में लड़ाने के लिए कितनी तरह की चीजें होती हैं। कुछ लोग सोचेंगे कि हम लोग आदिवासी हैं, कुछ मुसलमान हैं या ईसाई हैं। इनका भी आपस में झगड़ा है... यह आज से नहीं है। (बगल से गुज़रती ट्रेन के शोर के कारण कुछ शब्‍द अस्‍पष्‍ट...)
मैं यहां एक उदाहरण देना चाहूंगा, यह रवीन्‍द्रनाथ टैगोर से जुड़ा है, शायद आप लोग पढ़े होंगे। जब टैगोर 1925 में इटली गये थे तो वहां पर एक इतालवी लेखक से उनकी मुलाकात हुई उन्‍होंने कहा कि आप विश्‍वभारती आइये और हमारे वहां के लोगों को इतालवी सिखाइये और यहां की संस्‍कृति से जुड़ी किताबें, साहित्‍य लेकर आइये ताकि लोग यहां के बारे में जान सकें। उन्‍होंने बाकायदा आफिशियल लेटर भेज दिया। उस समय तक मुसोलिनी बहुत बदनाम हो चुका था उसने इसे एक मौके के रूप में देखा। उसने भारत को लेकर कुछ सोचा नहीं था, लेकिन उसने सारी किताबों और सरकारी लाभ देकर एक आदमी को भेज दिया। टैगोर काफी खुश हुए। फिर वह मुसोलिनी से मिलने के लिए फिर 1926 में 20 मई को इटली आते हैं। 21 मई को उनकी मुलाकात मुसोलिनी से होती है। उसने कहा कि मैंने और बहुत से इटलीवासियों ने आपको पढ़ा है और उसका अनुवाद भी करा रहे हैं। टैगोर खुश हुए कि इतना बड़ा आदमी इसे पढ़ा है। तो टैगार से कहा गया कि आपको एक व्‍याख्‍यान देना है। मुसोलिनी ने कहा कि आप कला पर बोलिये। हालांकि जो मुसोलिनी का आत्‍मकथा लेखक है वह लिखता है कि कला की महत्‍ता का बखान करना उसे पसन्‍द था लेकिन एकान्‍त में वह इस बात को स्‍वीकार करने को तैयार था कि उसे कला समझ में नहीं आती और वह अंदर ही अंदर इस बात से कुढ़ता था कि कला के भ्रामक और भ्रष्‍ट सौंदर्यबोध ने इटली की राजनीतिक महानता को पीछे धकेल दिया है।
तो रवीन्‍द्रनाथ टैगोर से पूछा गया कि मुसोलिनी से मिलकर उन्‍हें कैसे लगा। उन्‍होंने जवाब दिया कि निस्‍संदेह वह एक महान व्‍यक्ति हैं। उनका दिमाग इतना तेज है कि मुझे माइकलेंजलो की छेनी याद आती है। सबसे बड़ी बात यह है कि वह एक सरल व्‍यकित हैं जिसे देखकर यह विश्‍वास करना मुश्किल हो जाता है कि वे एक निरंकुश तानाशाह हैं जैसाकि लोग कहते नहीं अघाते। इसका मतलब यह नहीं था कि टैगोर दरअसल जानते नहीं थे कि मुसोलिनी एक तानाशाह है, फासिस्‍ट है, कि इटली में वह क्‍या कर रहा है, वहां के बुद्धिजीवी देश छोड़कर भाग रहे हैं। जिस बात को वहां के अखबार भी कह रहे थे। 21 से मई से लेकर 13 जून तक टैगोर वहां रहे, वहां के राजा से मिले, ब्रिटेन के राजदूत के साथ खाना खाया। और वहां के विश्‍वविद्यालय में व्‍याख्‍यान देने के लिए गये वहां मुसोलिनी भी सामने बैठा था और उन्‍होंने वहां कहा भी कि जब तक मुसोलिनी जीवित हैं इटली सुरक्षित है। इस तरह की बातें वह लगातार कहते रहते हैं। इसके बाद वह और भी जगहों पर गये जैसे स्विट्ज़रलैंड तो लोगों ने उन्‍हें घेरा और कहा कि कैसे आप इटली चले गये और मुसोलिनी के बारे में यह कहा। लेकिन उनके पास जवाब नहीं था और नहीं दे पाये। यह अज्ञानता उनको वहां तक ले गई...
यहां हम अलग-अलग तरह के फासीवाद को समझने के लिए बहस कर रहे हैं, वह भी ठीक है लेकिन केवल बहस करके नहीं बल्कि इसके प्रतिरोध में सक्रिय होकर काम करें तो ज्‍यादा अच्‍छा होगा। बस मुझे इतना ही कहना है।
रंजीत वर्मा
(जाने-माने कवि रंजीत वर्मा का ‘फासीवाद के साहित्यिक-सांस्‍कृतिक प्रतिरोध के ऐतिहासिक अनुभव, उनका वैचारिक परिप्रेक्ष्‍य और समकालीन सन्‍दर्भ’ विषय पर 13 मार्च को हुई ‘अन्‍वेषा‘ की पहली विचार-गोष्‍ठी में वक्‍तव्‍य)