रंगकर्मी कोई ना भटकें.

रंगकर्म भटक गयो तो समझो कि कयामत है.

हबीब साहेब जो लोकरंग रंगकर्म को एकाकार कर दिहिस और लोक को भारतीय नाट्यांदोलन, यहां तक की भारतीय सिनेमा की विरासत का ऊंच मचान मकान बांधिली हो, उस विरासत की कुछ इंच जमीन में हमारो हिस्सा ह.

वे लोग जो हबीब साहेब के जीवन मरण में और मरण के इसपार भी रंगकर्म जीते रहबे करै, वे मेरे भी कुछ लगते हैंगे. रंगकर्म और रंग चौपाल पर बकबकाना हमारी काबिलियत न हो तो नहो, हमारा हक बा. यह हक हम छोड़ब नइखे.

वह तो युगमंच वाले हमका कोई रोल कबहुं ना दिहिस और राजीव कुमार और जोशी जोसेफ भी लिक्खाड़ बतौर हमें फिल्मों से जोड़ रहे वरना हम भी रंगकर्म का जलवा दिखा सकते थे. कि नई बै, चैतू?

हालांकि सविता बाबू और हमारे गुरुजी का कहना सच है कि लिख विखकर दुनिया बदलने का ख्वाब देखने वाले बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना जैसा मुआ इंसान होता है. हम भी यह खूब समझ रहे हैं. लिखने से जो पंगा मोल ले रहे हैं, भविष्य उससे सुनहरा भी नहीं रहने वाला है.

ठीक सोलह महीन बाद बेरोजगार हो जाना है, तो तजिंदगी पाले इस शौक को आखिरी समय में जारी रखने में बुरा भी नहीं है.

आज केबल टीवी का प्रसारण बंद हो गया क्योंकि हम अभी फारम जमा नहीं किये हैं. दफ्तर में हर महीने आयकर कट रहा है.

जमा उमा तो खैर कर नहीं सकते.

बाल हल्का करके लाश का बोझ घटने से रहा.

पर मकान किराये की रसीद मकान मालिक से जमा करने की कवायद पूरी न हो तो बाकी महीनों में कटौती जारी रहेगी धुँआधार.

इस बीच चश्मा, टोपी, मफलर , चप्पल हराय दिया हूं और यादें हिरणों की तरह कुलांचे मार कर भाग निकलती हुी लग रही है ऐसे कि कभी कभार अपना नाम भी याद रखना मुश्किल है. सविता की चेतावनी रोज रोज यही होती है कि किसी भी दिन दिमाग का सेल खत्म हो जायेगा.

लेकिन हर सुबह घरेलू कामकाज निपटाने का मन बनाकर बैठता हूं कि कुछ न कुछ घटित हुआ रहता है और चार दशक की आदत के मुताबिक दिलोदिमाग में खलबली मच जाती है. शुतुरमुर्ग प्रजाति में शामिल नहीं हो सका अभी.

अभी फिर सुपरसिड किये जाने के इंतजार में बांस की कृपा का इंतजार कर रहा हूं कि मुक्त विहंगई जारी रह सकें. ससुरे किसी तरह बांध दें अगर तो दो चार दिन की जिंदगी मुश्किलहो जानी है. हम पादै न सकबो, सभै जानत हो.

मसलन कल रात ही तय कर चुका था कि आज पीसी के मुखातिब नहीं होना है और सारे जरुरी काम निपटा देने है.

बाजार नहीं गया हफ्तेभर से, राशन पानी का इंतजाम कर लेना है.

सुबह अखबार देखें तो दिमाग ठनक गया कि एक पचानब्वे साल की बूढ़िया कैद कर ली गयी उनके ही परिवार के खिलाफ चुनावी इस्तेमाल के लिए सत्ता की राजनीति के तहत तो हरिचांद गुरुचांद ठाकुर की बंगाल में जो संपत्ति है, उसके सरकारी अधिग्रहण की तैयारी कर रही है सत्ता की राजनीति. बिन लिखे कैसे भड़ासे निकालें, बतइयो.

एई समय में हबीब तनवीर पर एडिट पेज है आज का. रंगकर्म की लोक विरासत पर चर्चा है. यादों का जुलूस निकल गयो रे.

हम आदत से मजबूर हैं, शंहशाहे आलम, हुजुर में गुस्ताखी हो गयो तो बाशौक शुली पर चढ़ा दें. या टांग दें फांसी पर या कर दें सर कलम.

मेरे पिता भी रंग कर्मी थे. सिनेमा तो वेदेखते ही थे क्योंकि कैशोर्य में वे वनगांव इलाके के दत्तोपुकुर में भारत विभाजन से पहले अकेले आकर सिनेमा हाल में लाइटवाले की भूमिका में थे. जात्रा में वे फीमेल पार्ट भी करते थे और आंदोलनों के नेता भी हुए ठहरे.

किस्सा यूं सुना है कि जब पुलिन बाबू और उनके साथी कम्युनिस्टों के बंगाल में ही शरणार्थियों को बसाने के आंदोलन के विपरीत अंडमान में शरणार्थियों के होमलैंड और बाकी भारत में कहीं भी शरणार्थियों को बसाने का आंदोलन कर रहे थे.

बाकायदा पुलिनबाबू कोलकाता के सबसे बड़े श्मशान घाट केवड़तल्ला में शरणार्थी पुनर्वास की मांग लेकर अनशन पर बैठ गये तो अपने ही कामरेड कामरेड ज्योति बसु से उनकी ऐसी ठनी कि दोनों में फिर जिंदगी पर कोई संवाद जो नहीं हुआ सो नहीं हुआ और पुलिनबाबू अपने साथियों समेत ओड़ीशा के चरबेटियाकैंप में पहुंच गये.

चरबेटिया में ताउजी भी थे और हमारे चाचाजी तबभी पुलिस में नौकरी कर रहे थे कोलकाता में. पिताजी कुंआरे थे.

परिवार एकजुट हुआ तो बारिपदा में बिजनेस पुनर्वास के तहत बसाये गये बसंत कुमार कीर्तनिया की तेरह साल की कन्या बसंतीदेवी हमारी दादी शांत देवी और हमारी ताई को पसंद आ गयी क्योंकि कन्या गोरी थी और उनके बाल घुटने तक पहुंच रहे थे.

पिताजी की उम्र तनिको ज्यादा ही थे.

हमारी माताजी को अपने मायके से बहुत ही जल्द बिछुड़ना पड़ा ऐसे कि उत्तराखंड की तराई में अपने नाम बाद में बसाये गांव बसंतीपुर का मोह उनका इतना घनघोर हुआ कि मायके तो क्या, गांव की सरहद से बाहर जाना भी गवारा न हुआ कभी उनको.

हमारे गांव के बुजुर्गों का कहना है कि जात्रा का मंचन हो रहा था चरबेटिया कैंप में तो कैंप कमांडर भी अभिनय कर रहे थे. पौराणिक किसी कथा पर यह लोक रंगकर्म का मंचन था.

पुलिनबाबू फीमेल रोल में थे. तो जो पात्र का प्ले कर रहे थे कमांडर साक्षात ब्राह्मण देवता , उन्हें विधवा भाभी को लात मारना था.

समझा जा रहा थाकि प्ले एक्ट करेंगे पुलिनबाबू लेकिन वे पात्र में इतने रम गये कि उन्हें याद ही नहीं रहा कि लात जिसे मारनी है वे स्रवेस्र्वा कैंप कमांजर हैं और वे ओड़ीशा में शरणार्थी आंदोलन के नेता हैं जो बंगाल से इसी आंदोलन की वजह से खदेड़ दिये गये रहे. यह भी याद नहीं रहा कि वे शूद्र हैं और जिन्हें लात मारनी है, वे हुए भूदेवता ब्राह्मण कुलीन.

तो क्या था, पीड़ित विधवा की लात चल गयी जमकर और मंचन सुपरहिट.

इसके बाद बहुत जल्दी पुलिनबाबू और उनके तमाम साथी 1952 में चरबेटिया से तराई के घनघोर अरण्य में भेज दिये गये और कोई ठीक से नहीं बता पाया कि उस लात की गूंज हिमालयतक पहुंची कैसे कैसे.

जो बाद में तराई में तेलंगना की तर्ज पर 1958 में ढिमरी ब्लाक में किसानों की बगावत में तब्दील हो गयी और उससे पहले 1956 में बड़का शरणार्थी आंदोलन हुआ , जिसके गर्भ से निकला बसंतीपुर. उदयनगर और पंचाननपुर भी.

बहरहाल रंगकर्म की उस लात की वजह से बसंतीपुर और मेरे जनम की कथा कितनी जुड़ी है, हम ठीक टीक नहीं कह सकते .

बहरहाल बसंतीपुर बसानेवाले आंदलनकारियों ने जो पहला काम पुनर्वास मिलते ही किया, वह था बसंतीपुर जात्रा पार्टी का निर्माण और वह जात्रा पार्टी धूम मचाती रही दशकों तक. हमारे गांव के लोग जात्रामाध्यमे न सिर्फ अपने लोक को जी रहे थे बल्कि उनके अंदर बाहर वह बंगाल जिंदारहा करै है, जिनसे वे हमेशा के लिए बेदऎखल हो गये.

पुलिनबाबू आंदोलनकारी थे. जात्रा के मैनेजर और अधिकारी दूसरे लोग थे.

जात्रा निर्देशक गांव में बसा दिये गये थे तो बेहतरीन कलाकारों की शरणस्थली भी बसंतीपुर. संगीत टीचर हमारे घर में.

हर नये नाटक के पाठ के मौके पर सारे गांव के लोगों की बैठक होती थी. कास्टिंग भी पुलिनबाबू ही करते थे चाहे अभिनय करे ना करें. अभिनय करें तो फीमेल रोल के अलावा खलनायक वगैरह वगैरह का रोल करने से भी उंन्हें खास परहेज ना था.

दिनेशपुर शरणार्थी उपनिवेश में तब बंगाल से आकर बस गये थे किंवदंती बांग्ला अभिनेता विकास राय के भाई डा.निखिल राय भी. वे घनघोर रंगकर्मी थे.

उनकी बेटी और उनके दामाद भी रंगकर्मी. दिनेसपुर में पहली ओरिजिनल फीमेल डां.निखिल राय की बेटी थी, जिसका बेटा हुआ सुबीर गोस्वामी, मेरा भाई और फिल्म निर्देशक, रंगकर्मी सुबीर गोस्वामी.

दिनेशपुर में मचन का रिवाज न था. जात्रा की परंपारा के मुताबिक चारों तरफ दर्श और बीचोंबीच जात्रा.

सुबीर गोस्वामी के पिता माता और नाना ने मिलकर बांग्ला में पहला थिएटर का मंचन किया था दिनेशपुर में आंदोलन से बनी आईटीआई के प्रांगण में रवीद्र जयंती के मौके पर. तब हुआ यह कि मुझे थिएटर शुरु होने से पहले पाठ करना था रवींद्र की विख्यात कविता हे मोर दुर्भागा देश. एसे रिफ्यूजी भारत विभाजन की त्रासदी पर मंतव्य मान रहे थे. जबकि विभाजन से पहिले ही कवींद्र रवींद्र जात रहे.

हुआ यही कि गांव में बिजली होती न थी. जो मंच बवाया गया, उसपर विंग में खड़े बांस के खंभे के सहारे मुझे आय़ी ठहरी मूसलाधार नींद.

दिनेशपुर हाई स्कूल में छठी में दाखिल हो गया था मैं और तब बांग्ला में तुकबंद कविता लिखने भी लगा था और हमारे बांग्ला टीचर विधान बाबू को पक्का यकीन था कि एकदिन मेरे बड़े कवि बन जाने की पूरी संभावना है.

सुबीर के माता पिता को ऐसी कोई गलतफहमी न थी.

उन्हें लगा कि फिलहाल उस वक्त तक शरणार्थियों के बीच रंवींद्र ही मुझसे बड़े कवि थे तो मुझसे रवींद्र की कविता के लिए तैयार रहने को कह गया.

अपने कवित्व के प्रदर्शन से वंचित मन मसोस कर दिनेशपुर में पहले थिएटर के मंचन के लिए देर तक इंतजार करते करते मैं सो गया क्योंकि दृश्य का माहौल, सेट तैयार करने में अनभ्यस्त लोगों को वक्त बहुत लग गया.

ऐसे में मैं बिजली के तार के संपर्क में आ गया और जोर का झटका लगा, नींद तहस नहस हो गयी और तभी परदा उठ गया.

दिलो दिमाग हिल गया था और पूरी देह कांप रही थी. तब जो हे मोर दुर्भागा देश, जादेर करेछो अपमान, मैंने आवृत्ति की तो आवाज में अनचाही कंपन और उतार चढाव से जो समां बंधा, उससे सबको लगा कि मैं भी रंगकर्मी हुआ ठहरा.

डांट न पड़े, इस डर से जाहिर है कि मैंने बिजली वाली बात किसी को बतायी ही नहीं और मेरी आवृत्ति मेंउतार चढ़ाव भरे कंपन मेरे रंगकर्म के खाते में दर्ज हो गया अनचाहे.

आज सबहोसुबह एई समय पढ़ते वक्त तराई में अपनी पहचान कायम रखने की गरज से अछूत अंत्यज शरणार्थी बंगालियो के हर गांव में, ट्रेजिट कैंप में जात्रा के धुआंधार अभिनय की लोक परंपराओं का पूरा माहौल ने मुझे मेरी नियमित दिनचर्या से बेदखल कर दिया ठहरा. फिर वही करंट छू गयो रे.

फिर वही आगरा बाजार में खड़ा हो गया मैं.

हबीब तनवीर के नाचा गम्मत और उनके रंग कर्म में छत्तीसगढ़ी अंत्यज गांववालों की केंद्रीय भूमिका को किसी विचारधारा और सौंदर्यशास्त्र की नजर से देखने लायक विशेषज्ञ जाहिर है कि मैं हूं नहीं.

फिरभी शायद सच यह भी है, कि कमसकम मेरा सच यह है कि हबीब जिनके साथ तजिंदगी काम करते रहे, वे सारे लोग मेरे अपने थे.

जैसे नाचा गम्मत जादूगर निसार मियां पहली ही मुलाकात में मेरे परिवार में शामिल हुए ठहरे और मेले में बिछुड़े दो भाई जैसे वर्धा में ढेर सारे छात्रों और छात्राओं के मेले में फिर मिल गयो.

वो ससुरा चैतू भी वहीं मिल गया ठहरा और रोज रोज अजब गजबे करतब से मैं भद्र भाषा में जो लिखने जाता हूं, तत्सम शब्दों के बदले वह तद्भव में बदल रहा है जैसे कि रातों रात मैं असमिया बन गया और झमाझम नाचने लगा बिहु बेमौसम झमाझम झमाझम. बिना किसी रिहर्सल के.

असमिया में एक भी तत्सम शब्द खोजना मुश्किल है और अहम जनगोष्ठी की यह भाषा लेकिन संस्कृत से मुक्त है. बांग्ला, मराठी, ओड़िया और मलयालम तो संस्कृतगरिष्ठ ऐसी भाषाएं हैं जो छंदबद्ध ढंग से बोलो तो वैदिकी ऋचाओं की गूंज पैदा कर दें.

इसके विपरीत अपनी कुमांयूनी, गढवाली और गुर्खाली, गुरमुखी, हिंदी और बांग्ला की तमाम बोलियों में तद्भव की बहार ऐसी है, मुहावरों की बौछार इतने रंगीन हैं कि बोलने वाले ससुरे रंगकर्मी न बने तो कछु बन ही नहीं सकत है, चैतू. लोक में श्लील अश्लील की तमीज इतनी दुरुस्त है कि का कहिं. हम मौके के बाबत भाखा का मिजाज अनोख.

पश्चिम बंगाल से पूरी तरह कटे होने की वजह से सांस्कृतिक तौर पर लोक विरासत की स्मृतियों में जी रहे हैं हमारे लोग अभौ अठारवीं उनीसवीं सदी में. हमारे लोग बोलियों में कहते हैं. बोलियों में ही लिखा करे हैं.

विकास के हर उपकरण से लैस होने के बावजूद जब भी वे बांग्ला बोले हैं कहीं, तो वह पूर्वी बंगाल की बयार होती है और लोक बोलता है. जेसे हमने तराई मे पांचवे और छठे दशकों में पूरे रंग में देखा है. वहीं हाल ठेठ पंजाबी का है, जो तराई में धड़ल्ले से बोली जाती है.

वही माटी लेकिन पूंजी है हबीब तनवर की जो नाचा गम्मत के पोर पोर में बसौ है.

यह कोई तिलस्म नहीं है और न नाचा के कलाकार हवा में तलवार भांजते अय्यार हैं.

वे खून मांस दिल दिमाग और मजूत कलेजे वाले लोग हैं जिंदा जो मर मर कर जिंदा होने का करतब दिखाते हैं रोज. मुर्दा हुई रही जिंदगी को जिंदगी को जिंदा कर देते हैं. रंगकर्म.

इन्हीं हबीब तनवीर के नया थिएटर में काम करत रहे हमार भाई अभिजीत, जात्रा के सबसे बड़े कलाकार चंद्र बाबू के बड़का बेटवा. जिनके घर दिनेशपुर में दुर्गा पूजा के मौके पर जो जात्रा मंचन के वक्त मुझे नींद लागी गयो और तब मैं शायद दूसरी कक्षा में पढ़ता था, खुदै चंद्रबाबू मुझे गोद में उठाकर ले गये रहे.

तो रात में नींद ही में मैंने उनकी बिस्तर पर पेशाब कर दिया और मारे शर्म के पौ फटने से पहले पैदल ही पैदल बसंतीपुर की तीन मील की दूरी तय कर आया. जब अभिजीत का जनम ही नहीं हुआ था. चंद्रबाबू के घर में मैं तब भी उनका बेटा था. आज भी हूं.

तराई में मेरी आंदोलन गतिविधियों में कोई न सही, चंद्रबाबू जरुर शामिल रहे हैं.

उस अभिजीतवा को हबीब तनवीर के नये थिएटर में देखने के बाद चंद्र बाबू और दिनेशपुर के तमाम अछूत अंत्यज मेहनतकश लोगों के रंगकर्म से छत्तीसगढ के नाचा और हबीब तनवीरे के नये थिएटर को अलहदा करना मेरे लिए मुश्किल है.

उसी अभिजीत से मैं सख्त नाराज हूं.

इतना नाराज कि इस बार मैं चंद्रबाबू से मिला भी नहीं कि उनके घर जाऊं तो अभिजीतवा से कहीं मुलाकात न हो जाये.

यहीच अभिजीतवा ने हबीब तनवीर पर पहला शोध करके पीएचडी हासिल करने वाला तराई के बंगालियों में बहला बच्चा बना तो हमारी छाती सचमुचै छप्पन इंच चौड़ी हो गयी.

सचमुचै. मोदी की तरह झूठमुठ नइखे.

वसुधा के संपादक रहे प्रोफेसर कमला प्रसाद ओकर शोध गाइड रहे.

बरसों पहले मुझसे कमलाप्रसाद जी की दिल्ली में जेएनयू गेस्टहाउस में मुलाकात हुई तब , जब साहित्य अकादमी के अध्यक्ष पद के लिए खड़ी थी महाश्वेता देवी और हम सारे लोग दिल्ली में बैठे थे. कृपा शंकर चौबे इस गोलबंदी के पीछे था.

तब कमलाप्रसाद जी ने पूछा कि अभिजीत कहां है, उसके शोध पर किताब छापनी है और तभी मुझे पता चला कि अभिजीत ने नया थिएटर छोड़ दिया है.

मैंने बाद में अभिजीत से पूछा तो उसने जो बताया , उसका लब्बोलुआब यह था कि नगीन से उसका थोड़ा टकराव हो गया रहले.

अब का कहि, हबीब साहेब कि विरासत कोऊ हल्की चीज न रहे और नगीन बेहतरीन ढंग से हबीब साहेब की वहीच विरासत संभाले रही हैं और मेरे हिसाब से अभिजीतवा को नगीन की इस मुश्किल घडी में बाकी तमाम रंगकर्मियों के साथ खड़ा होना ही था.

वह तराई के बच्चों को लेकर रंगकर्म में जबतक सक्रिय था और हबीब साहेब जबतक जिंदा रहे, अभिजीत के भाजपाई हो जाने के बावजूद, यहां तक कि मुझसे नैनीताल से भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने की पेशकश करने के बावजूद मुझे उससे भारी उम्मीदें थीं. जब भी तराई गया, बिना फेल उससे मिलता रहा हर बार. अब वह निठल्ला है.

मैंने अपने गांव और तराई और पहाड़ के बेहतरीन कलाकारों रंगकर्मियो की सोहबत में अपना बचपन कैशोर्य जिया है, जिन्हें कभी कोई बड़ा मंच नहीं मिला और जिनकी कला का परिष्कार नहीं हुआ.

हम दिलोदिमाग से चाहते थे कि अभिजीत उनका नेतृ्तव करते हुए नैनीताल में बूढ़े हो रहे जहूर आलम के अधूरे काम को आगे बढ़ायें.

वह मुझसे ज्यादा पढ़ा लिखा हो गया है और शायद उसे मुझसे पारिवारिक संबंधों के बावजूद बात करने में संकोच होता हो. हबीब साहेब के साथ काम करने से पहले वह लखनऊ में भारते