परमाणु ऊर्जा के खतरों पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। शकुशिमा विधीशिका के बाद सवाल और तीखे हुए हैं, लेकिन भारत सरकार शुतुर्मुर्ग की मुद्रा अपनाए हुए है। ओबामा-मोदी परमाणु डील इसमें एक नई कड़ी है। उनहीं खतरों के संबंध में एक आलेख पिछले आम चुनाव के दौरान श्री मोदी ने गुजऱात विकास के माध्यम के साथ गुजऱात में सौरण ऊर्जा के प्रयोग की दिशा के सामने व्याप्त चर्चा की थी। जब वे गुजऱात के मुख्यमंत्री थे उन्होंने सौरण ऊर्जा व पवन ऊर्जा के क्षेत्र में लंबी चलांग लगाई थी। सन 2012 में 590 मेगावाट की क्षमता का गुजऱात के चरंकां गांव की अनुपयोगी 5 हजार एकड़ जमीन पर ‘चरंकां सोलर पार्क’ स्थापित किया था। अनुपयोगी जमीन पर लगे सोलर पैनल, सिंचाई नहरों के ऊपर सोलर पैनल तथा पवन चक्कियों की स्थापना से वैकल्पिक ऊर्जा उत्पादन की क्षमता बढ़कर लगभग 900 मेगावाट की हो गई। ‘दि हिंदू’ (5 अप्रैल 2014) में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक सन 2014 में भारत की सोलर ऊर्जा की क्षमता 2652 मेगावाट हो चुकी है जिसमें गुजऱात का हिस्सा 66 प्रतिशत है। यह सही है कि देश को बिजली की जरूरत है। अब श्री मोदी देश के प्रमुख मंत्री हैं, तथा देश के हर घर में बिजली पहुंचाने के लिए संकल्पित हैं। क्या उनसे यह उम्मीद की जा सकती है कि देश की ऊर्जा नीति निर्धारण में उनके गुजऱात के अनुभव के आधार पर रिन्यूएबल एनर्जी (पुनर्नवीनीय ऊर्जा जैसे सौर और सुस्रक्षित वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को विविधता मिलेगी। वे न्यूक्लियर ऊर्जा के मुद्दे पर क्या डॉ मनमोहन सिंह का अनुरोध करेंगे या समग्रता से चिंतन करते हुए फूंक फूंक कर कदम रखेंगे? यह तथ्य है कि दुनिया में ऊर्जा उत्पादन के लिए कोईल पर निर्भरता बहुत है। उसका कारण है आसान से उपलब्ध होने।