नोएडा, 05 नवंबर, 2015

आठ महीने के बकाया वेतन की मांग को लेकर सहाराकर्मियों (मीडियाकर्मी और अन्य सहायक स्टाफ) का धरना आंदोलन जारी है। नोएडा के सेक्टर-11 स्थित कैंपस में यह धरना आज, शुक्रवार को नौवें दिन में प्रवेश कर गया है, लेकिन मालिकान और प्रबंधन की तरफ से कोई सकारात्मक रुख नहीं दिखाई दे रहा है, बल्कि वह आज भी इस आंदोलन की तोड़ने की साज़िशों में ही व्यस्त है।

संकट की शुरुआत

सहारकर्मी जिसमें पत्रकार और गैर पत्रकार दोनों शामिल हैं, लंबे समय से वेतन संकट से जूझ रहे हैं। इस संकट की शुरुआत करीब दो साल पहले सहारा-सेबी के विवाद के समय से ही हो गई थी। संस्थान के चेयरमैन सुब्रत रॉय के तिहाड़ जेल जाने के बाद यह संकट बढ़ गया और मीडियाकर्मियों व अन्य सहायक स्टाफ का वेतन रोका जाने लगा। यहां साफ कर दें कि सहारा की अन्य व्यापारिक गतिविधियों और सहारा-सेबी के विवाद मीडिया का कभी कोई लेना-देना नहीं रहा। इसके अलावा इस संकट के बाद भी सहारा के अन्य संस्थानों जैसे पैराबैंकिंग, हॉस्पिटल, होटल इत्यादि में नियमित वेतन दिया जा रहा है। इससे साफ है कि सुब्रत रॉय ने अपनी किसी रणनीति के तहत मीडिया जिसमें राष्ट्रीय सहारा अखबार और इलेक्ट्रॉनिक चैनल (समय नेशनल, सहारा समय यूपी-उत्तराखंड, सहारा समय बिहार-झारखंड, सहारा समय मध्य प्रदेश-छत्तीसगढ़, सहारा समय राजस्थान और आलमी सहारा) शामिल हैं, के नोएडा मुख्यालय समेत देशभर में फैले कर्मचारियों का वेतन पहले देरी से और अब बिल्कुल न देने की चाल चली।

कैसे बढ़ा बकाया?

शुरुआत में वेतन लेट किया गया। 30 दिन बाद मिलने वाला वेतन 40 दिन और फिर 50 दिन बाद दिया जाने लगा। इस तरह कर्मचारियों का कंपनी पर बकाया बढ़ने लगा। फिर बीच में वेतन पूरी तरह रोक दिया गया। दो महीने में भी वेतन न मिलने पर संस्थान में हाहाकार मच गया। काफी जद्दोजहद और दबाव के बाद आधे माह का वेतन देने की शुरुआत की गई, लेकिन यह आधे माह की सैलरी भी 40 से 50 दिन में दी गई। इस तरह सितंबर तक कर्मचारियों की केवल फरवरी तक की सैलरी क्लियर की गई। और अब सितंबर के बाद तो आधे माह की सैलरी भी नहीं दी गई। इस तरह अक्टूबर तक कर्मचारियों का कंपनी पर आठ महीने का वेतन बकाया हो गया है। और अब नौवें महीने की शुरुआत हो गई है, जिसमें दीपावली जैसा प्रमुख त्योहार भी सामने है और सभी कर्मचारी बेहद परेशान और विचलित हैं।

कर्मचारी लंबे समय से बकाया वेतन के भुगतान और हर माह नियमत वेतन की मांग करते रहे लेकिन मालिकान और प्रबंधन के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी। मालिकान और प्रबंधन इस बीच सिर्फ रोज़ नये-नये बहाने और झांसे देता रहा। दबाव बढ़ने पर कर्मचारियों पर कार्रवाई और संस्थान बंद करने की धमकी भी दी गई।

भुखमरी के हालात

ज़बर्दस्त आर्थिक संकट के चलते सहाराकर्मी भारी शारीरिक और मानसिक कष्ट में हैं और अब स्थिति भूखों मरने की आ गई है। सभी कर्मचारी भारी कर्ज़ के बोझ तले दब गए हैं। आसपास के दुकानदारों ने उधार देने से मना कर दिया है और पूरी सामाजिक प्रतिष्ठा भी दांव पर लग गई है। बैंक लोन की किस्त जमा नहीं हो पा रही है, यहां तक कि फीस न दे पाने के कारण कर्मचारियों के बच्चों के नाम स्कूल से कट रहे हैं और बहुतों को अपना परिवार गांव भेजना पड़ा है। इस संकट और तनाव के चलते कई सहाराकर्मी गंभीर रूप से बीमार हो गए हैं और कई की तो जान तक चली गई है।

ऐसे हालात में कर्मचारियों ने एकजुटता बनाते हुए दबाव और बढ़ाया तो प्रबंधन ने अक्टूबर माह में कंपनी के प्रमुख सुब्रत रॉय से तिहाड़ जेल में कर्मचारियों के प्रतिनिधिमंडल की दो बार भेंट कराई, लेकिन दोनों ही बार वार्ता विफल रही और कोरे आश्वासन के सिवा कुछ नहीं मिला। कर्मचारियों ने सुब्रत रॉय से “एक्जिट गेट” भी मांगा यानी उनसे कहा गया कि अगर आप हमारा पूरा हिसाब कर दें तो हम संस्थान छोड़कर जाने को भी तैयार हैं, लेकिन इसकी भी इजाज़त नहीं दी गई।

भूखों मरने के हालात पर सुब्रत रॉय का संवेदनहीन बयान देखिए। उनका कहना है कि- भूख से कोई नहीं मरता, ज़्यादा खाने से मरता है।

ईपीएफ घोटाला?

पता चला है कि सिर्फ़ वेतन ही नहीं सहारा ने कर्मचारियों की भविष्य निधि (ईपीएफ) में भी घोटाला किया है। क्योंकि पीएफ का ब्योरा मांगने पर भी नहीं दिया जा रहा। सहारा पीएफ का पैसा सरकार के पास जमा न करके एक ट्रस्ट के नाम पर अपने पास ही रखता है, लेकिन प्रबंधन के सूत्र ही बताते हैं कि एक साल से कर्मचारियों का पीएफ का पैसा भी खाते में जमा नहीं किया गया है।

आर-पार की लड़ाई

ऐसे हालात में अब सहाराकर्मियों ने “सहारा मीडिया वर्कर्स यूनियन” (यूनियन का पंजीकरण अभी प्रक्रियाधीन है।) के नाम से अपनी एकजुटता बना ली है और नोएडा कैंपस में ही इसकी सदस्यता संख्या 1000 से ऊपर पहुंच गई है। यूनियन के बैनर तले धरना आंदोलन की कार्रवाई शुरू कर दी है। इसी के तहत 28 अक्टूबर से सहारा के नोएडा कैंपस में धरना जारी है। कर्मचारी इस बार किसी झांसे में न आते हुए अपना हक़ लेने पर डटे हैं। इसके लिए सहारा कर्मियों ने लेबर कमिश्नर से लेकर सुप्रीम कोर्ट और मुख्यमंत्री कार्यालय से लेकर प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) तक मुहिम छेड़ दी है।