सजा तो हो इस घिनौने काम की
रंजना त्रिपाठी
मेरे बच्चे बैंगलोर के जिस स्कूल में जाते हैं वो यहां के मोटी रकम हड़पने वाले स्कूल्स में से एक है। हर बेस्ट का बाप मौजूद है और हम हैं कि बेस्ट देने पर तुले हैं। स्कूल का नाम है "विबग्योर हाई"। बैंग्लोर शहर में ही इस स्कूल की कई ब्रांच हैं। बाकी हैदराबाद, पूणे, मुंबई, लखनऊ कई जगहों पर यह स्कूल है। स्कूल की बड़ी-बड़ी बसें चलती हैं। अंग्रेजी माध्यम स्कूल। बड़ी-सी बिल्डिंग, बड़ा-सा ऑडिटोरियम, बड़ा-सा प्ले एरिया और सबकुछ यहां बड़ा-बड़ा है। मेरा पांच साल का बेटा फर्राटेदार अंग्रेजी बोलता है और बिटिया भी भाई की राह पर आगे बढ़ रही है। ये सब स्कूल से मिला है क्योंकि घर के भीतर तो ज्यादातर हिंदी माहौल ही रहता है। मैं हिंदी भाषी हूं और मेरी आदत में यही भाषा है। ज़रूरत न हो तो अंग्रेजी नहीं बोलती...
खैर, इसी स्कूल की एक ब्रांच कुंदानाहल्ली में भी है। हर दिन की तरह सभी बच्चे स्कूल गये और स्कूल से घर लौट आये। लेकिन उन्हीं सब हज़ारों बच्चों में से एक बच्ची थी जो 3:30 बजे (स्कूल छूटने का समय) की बजाय, 1:00 बजे ही घर पर छोड़ दी गयी। बच्ची ने घर आकर जब अपने निजी अंगों में दर्द की शिकायत की तो अभिभावक डाक्टर के पास लेकर भागे। डाक्टर बच्ची को चैक करने के बाद बताता है कि बच्ची को शारीरिक तौर पर एब्यूज़ किया गया है और रिपोर्ट आती है कि बलात्कार एक नहीं दो लोगों ने किया है।
जिस स्कूल में सैकड़ों-हज़ारों बच्चे पढ़ते हैं उसके टीचर्स प्रिंसिपल क्या दिन में पंखा झेलते हैं, जो उनके स्कूल में थर्ड फ्लोर पर बंद कमरे में हो रही घटना का उन्हें पता नहीं चलता। ऊपर से अभिभावक के साथ खड़े होने की बजाय वो उन स्पोर्ट्स टीचर्स का बचाव करते हैं, जिन्होंने छ: साल की बच्ची का मुंह बंद कर नोच-नोच कर गटक गये उसका बचपन। जब महिलाएं सुरक्षित नहीं तो ये फूल-सी बच्चियां भला कैसे सुरक्षित रह सकती हैं। महिलाएं और बच्चे दुनिया के किसी भी कोने में सुरक्षित नहीं। यदि कोई जगह सुरक्षित है तो घर और मां का आंचल। लेकिन यह आंचल साथ-साथ कहां चलता है। एक स्कूल ही ऐसी जगह होती है, जहां हम भरोसा करके अपने बच्चों को छोड़ते हैं।
वो सैंड पर कासल बनाती है, गोल गोल झूले के कई चक्कर लगाती है, स्केट्स चलाती है, कानों में आईपैड डाले अपनी सहेलियों के साथ अपनी गुलाबी साईकिल का लुत्फ उठाती है। लेकिन वो मासूम प्यारी खिलखिलाती बच्ची अब अपने शरीर को संभालना सीख जायेगी। अच्छे से जान गयी बलात्कार का दर्द। उसकी मां ने उसे नौ महीने अपनी कोख में इसलिए रखा था कि मेरी बेटी पैदा होगी। मैं उसे तरह तरह के विदेशी फूड खिलाकर बड़ा करुंगी। करीने से उसके बाल कटवाऊंगी, उसकी स्कर्ट से लेकर स्कूल बैग तक का खयाल रखूंगी और एक दिन दो बिमार लोग कहीं से आयेंगे और मेरी बच्ची को नोच खायेंगे। जैसे हम अपनी बच्चियां इन जानवरों के लिए पैदा करते हैं।
वो बच्ची अभी इतनी समझदार नहीं कि उसे बताया या समझाया जाये कि जो हुआ उसे भूल जाओ। वो तो सिर्फ अपने शरीर पर पड़े घावों और उनसे उठने वाले दर्द को महसूस कर पाती है। उसे तो मालूम भी नहीं कि बलात्कार क्या होता है। अभी वो भूल भी जायेगी, शायद उलझ जायेगी अपनी बार्बी की शादी या ड्राईंग क्लासिज़ में... लेकिन कुछ सालों बाद, जब वो समझने लगेगी? तब क्या होगा? तब वो अपने शरीर के उस हर हिस्से को उखाड़ फेंकना चाहेगी जिसका घाव तब उसके मन को छील रहा होगा। वो अब कभी पहले की तरह मुस्कुरा न सकेगी। क्योंकि ऐसी घटनाएं कभी नहीं भूली जातीं, चाहे वो किसी भी उम्र में घटी हों...
कुछ साल पहले तक स्थिति इतनी खराब नहीं थी। मैं बचपन से ही बड़ी तेज़ बच्ची हुआ करती थी। चीखना, चिल्लाना, काट लेना, नोच लेना... ये सब मुझे अच्छे से आता था। इसलिए मेरे बारे में कोई सोचता भी तो शायद मेरा उग्र व्यवहार सोचकर दूर हो जाता होगा। फिर भी मैंने बचपन के दिनों में अपने ही घर में आनेवाले कई मर्दों में ऐसी कुंठा पायी है। हम सही और गलत स्पर्श महसूस कर पाते हैं। भले ही वो स्पर्श गालों तक ही सीमित हो। मैं आज तक ऐसे गंदे बिमार लोगों को नहीं भूल पायी जो बेटा जी बेटी जी करके मुझे अपने पास बुलाते थे। वो तो मैं ऐसी नकचढ़ी थी बचपन से कि खतरा सूंघ लेती थी। पर आज भी ऐसे बिमार लोगों को भूली नहीं हूं... कई मिले और कई मिलेंगे अभी तो मेरे बुढ़े होने तक... फिर आज की वो बच्ची जिसे दो लोगों ने बारी-बारी से अपनी गंदी और घटिया मानसिकता का शिकार बनाया, वो भला कैसे भूल पायेगी? अब वो अपने नजदीक आनेवाले हर पुरुष से नफ्रत करेगी, फिर रिश्ता चाहे कोई भी हो। बच्चों और महिलाओं के लिए बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं है ये दुनिया। किसी पर भरोसा मत करो। स्कूल में इतने घंटे बच्चों को अकेले छोड़ देना हमारी मजबूरी है। स्कूल के अलावा कहीं मत छोड़ो। जब तक कि वे अपनी रक्षा खुद करना नहीं सीख जाते। स्कूल से लेकर प्ले एरिया तक बच्चों की हर एक गतिविधि पर नज़र रखना ज़रूरी है। फरक नहीं पड़ता बच्चा लड़का है या लड़की। समय ने दोनों की सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है।
एनवल डे पर बड़े-बड़े हार्डिंग लगवा देना, बड़े से ऑडिटोरियम में हर तीसरे महीने प्रोग्राम रख देना, किसी बहुत बड़े सैलेब्रिटी को मोटी रकम देकर खरीद लाना और स्कूल का प्रचार प्रसार करवाना... लेकिन बच्चों की सुरक्षा के मामले में हमेशा ज़ीरो ही साबित होना। मोटी रकम लेनेवाले ये स्कूल हमारे बच्चों की सुरक्षा को लेकर कितने सतर्क हैं ये तो देखते बनता है। आये दिन किसी न किसी स्कूल में सुनने देखने को मिल जाता है ये सब। ज्यादातर मामलों में धंधा बंद होने के डर से स्कूल सच दबाने की कोशिश करते हैं। सेक्शन बढ़ाते जायेंगे, एडमिशन लेते जायेंगे, बिल्डिंग बड़ी से और बड़ी होती जायेगी, लेकिन...!!!
मैं या कोई भी अपने बच्चों को निकाल कर किसी दूसरे स्कूल में नहीं डालेंगे। इसलिए क्योंकि दूसरे स्कूल में भी ये सब हो सकता है। नहीं होगा, इसकी गारंटी कोई नहीं ले सकता। आप कुछ नहीं कर सकते, लेकिन ज्यादा से ज्यादा इस पोस्ट को शेयर करके जागरुकता की इस मुहीम में शामिल तो हो सकते हैं।
रंजना त्रिपाठी, कामकाजी महिला हैं, फेसबुक पर महिलाओं की समस्याओं पर काफी सक्रिय हैं। उनकी फेसबुक टाइमलाइन से साभार।