बजट : पिटारे में क्या है
बजट : पिटारे में क्या है
शैलेंद्र चौहान
यह कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी का पहला महीना उनके प्रभाव प्रदर्शन का रहा है। गृह मंत्रालय में डेढ़ लाख पुरानी फाइलों को नष्ट करने के उनके आदेश के बाद नौकरशाहों के होंसले पस्त हो गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को केंद्र सरकार का मुखिया बने एक महीना हो चुका है लेकिन अब भी वह 'हनीमून पीरियड' के दौर से ही गुज़र रहे हैं। जन उम्मीदें बहुत ज़्यादा हैं जो मोदी ने चुनावों के दौरान जगाईं थी लेकिन उनकी मांग अभी मंद है। इस दौर में एक क़िस्म की समझदारी और धैर्य है। वर्तमान प्रधानमंत्री के रुख एवं कार्पोरेट जगत को बेरोकटोक समर्थन से शेयर बाज़ार बेहद प्रसन्न है। उनकी नीतियों और मंशाओं को आम तौर पर सकारात्मक रूप में ही लिया जा रहा है। वित्त मंत्री अरुण जेटली वही बातें कर रहे हैं जो बाज़ार सुनना चाहता है। बाजार को यह लग रहा है कि बजट राजकोषीय मजबूती और घाटे को कम करने पर केंद्रित होगा। इसका एक संकेत तभी आ गया था जब मोदी ने रेलवे किराए में वृद्धि की, जिसे कांग्रेस सरकार वापस ले चुकी थी। इस फैसले को बिना विपक्ष से सलाह-मशविरे के पास कर दिया गया। असल में मोदी ने काम करने की अपनी पुरानी शैली को जारी रखा है। ऐसी शैली जो प्रशासन को राजनीतिज्ञों की बजाए नौकरशाहों के सहारे चलने की समर्थक है। प्रधानमंत्री वरिष्ठ अधिकारियों, ख़ासकर विभागों का नेतृत्व करने वाले सचिवों से कह चुके हैं कि वे निडर होकर काम करें। उन्हें आश्वस्त किया गया है कि वे उनके फैसलों के साथ खड़े होंगे। उनसे यह भी कहा जा रहा है कि किसी समस्या के आने पर वे उनसे सीधे मिल सकते हैं। अब इस 'समस्या' का सीधा आशय शायद उनके विभागों के मंत्रियों से हो। यही वह शैली है जिससे उन्होंने गुजरात चलाया है और अब वे इसी शैली से पूरा हिंदुस्तान चलाना चाहते हैं। तभी वे नौकरशाहों को, गुजरात मॉडल देखकर आने की बात करते हैं। यह तो तय है कि भाजपा को जो जीत हासिल हुई है व स्पष्ट बहुमत मिला है वह मोदी की व्यक्तिगत लोकप्रियता के कारण ही मिला है। इसका मतलब है कि मंत्रियों को इस कार्यशैली की आदत डालनी होगी। मंत्रियों को मोदी के शासन करने की शैली के अन्य पहलुओं के बारे में शिक्षा दी जा रही है। वह मंत्रियों से अपने 100 दिन के कार्यकाल का समयबद्ध और नतीजा दिखाने वाला एजेंडा तय करने को कह चुके हैं। मोदी ने सूचनाओं को जारी करने पर कड़ा नियंत्रण रख रखा है। मंत्री और सचिव उनकी नाराज़गी से इतने डरे हुए हैं कि पूरी तरह चुप्पी साध ली है। पार्टी नेताओं को भी संदेश पहुंच चुका है और वे भी बहुत ज़्यादा नहीं बोल रहे।
इस बीच उनका एक पैंतरा यह रहा कि उन्होंने विदेशी नेताओं से बात करने में अंग्रेज़ी की बजाए हिंदी को चुना तो उनके चाहने वाले गदगद हो गए। असल में मोदी अच्छी तरह अंग्रेज़ी नहीं बोल सकते और इसीलिए अमूमन हिंदी ही बोलते हैं। क्योंकि भारत के सामने वह गुजराती नहीं बोल सकते। यूट्यूब पर मौजूद उनके पेटेंट 'वाइब्रेंट गुजरात' की बैठकों में उनका एक वीडियो देख कर यह आसानी से समझा जा सकता है। इस वीडियो में वह अंग्रेज़ी बोलने की कोशिश करते हैं और आशावाद (ऑप्टिमिस्टिक) व निराशावाद (पेसीमिस्टिक) में गड़बड़ा जाते हैं। वह ख़ुद को निराशावादी व्यक्ति कह देते हैं जबकि उनका मतलब इसके विपरीत होता है। डिजिटल मीडिया की प्रतिक्रिया से उत्साहित मोदी ने अपने अधिकारियों को आदेश दिया कि वे भी हिंदी का इस्तेमाल करें। एक वरिष्ठ नौकरशाह ने इसे सोशल मीडिया तक खींच दिया। इसकी तत्काल प्रतिक्रिया तमिल भाषियों के अलावा मोदी के सहयोगियों की ओर से भी आई। उन्होंने मांग की कि इस आदेश को वापस लिया जाए। इस मुद्दे पर केंद्र सरकार का पीछे हट गई। मोदी का रुख़ लचीला दिखा और इस पूरी घटना को ऐसे लिया गया जैसे कुछ हुआ ही न हो। अब मोदी जी ने सभी मंत्रालयों को फेसबुक और ट्विटर जैसी सोशल साइट्स पर अनिवार्य रूप से अकाउंट खोलने के निर्देश दिए हैं ताकि सरकार के उन कार्यों के बारे में लोगों को जानकारी दी जा सके आवश्यक समझते हैं। इस दौरान इराक़ में भारतीयों के अपहरण के मामले में मोदी ने बहुत ही बुद्धिमत्ता से काम लिया। लेकिन पडोसी देशों से उनके कैसे रिश्ते होंगे यह देखना बाकी है।
हालांकि, उनकी सरकार की ओर से बड़े सवालों पर जवाब आना अभी बाकी है। क्या भारतीयों को कानून का राज वह दे सकेंगे ? गरीबों के लिए उनके पिटारे में क्या है और भारतीय नागरिकों के जीवन स्तर को वे कैसे ठीक करेंगे। अगले दो सप्ताह में आने वाले केंद्रीय बजट से जल्द ही हमें इसका जवाब भी मिल जाएगा।


