कमलदीप
इस ठंड में कोई परेशान हो या न हो हमारे पप्पन लाला के चेहरे पर थोक के भाव परेशानियां नाचती दिख रही हैं। पप्पन वैसे तो मोहब्बत के शहर आगरा की पैदाइश हैं, लेकिन पेट के भूगोल का इंतजाम दिल्ली में लगी सरकारी नौकरी के बूते चल रहा है। सप्ताह में एक बार दिल्ली से आगरा नाप लेते हैं। पप्पन इस बार पुराने घर आए तो नाक सांड़ की तरह फूल-फूलकर फुफकार मार रही थी। अचानक मेरे नैन उनसे जा भिड़े तो फट से उंगली हिलाकर मुझे बुलाया और फूट पड़े- क्यों बे, तुम भी आम आदमी बन गए।
मैं यकायक इस प्रश्न को समझ नहीं पाया। मुंह से निकलती भाप और मेरी इस नासमझी को भांप पप्पन बोले- काश, मैं पिछले साल ही मफलर खरीद लेता। मैंने कहा- मफलर का क्या है, चाहे जब खरीद लो। आज ही चलो। वे बोले- हां, अब तो बड़ा मिल रहा है न। अबे, केजरी के फैशन ने सब डंप कर दिया है। दिल्ली तो दिल्ली, ताजमहल और पागलखाने पर इतराने वाले इस शहर में भी मफलर धड़ाधड़ आम आदमी से चिपककर गायब होने लगे हैं। और तो और जहां सर्दी नहीं पड़ती, वहां भी मफलर सप्लाई हो रहे हैं। इस आम आदमी के चक्कर में शामत हम जैसों की आई हुई है, जिनके कानों में सरर.. से ठंड घुस जाती है। पहले तो अपनी सरकारी कुर्सी ठंड में भी गर्मी का अहसास करा देती थी, मगर वह भी अब ‘ठंडी’ पड़ गई है।
मैंने कहा- ठंडी! वह कैसे? अपनी तरफ उंगली करते हुए बोले- अबे, यह जो पप्पन है न, हर मिनट छप्पन छापता था, घूसखोरी के पनारे से नकद नारायण दिन भर सरकते थे। एक सियासी सफाई कर्मचारी ने ईमानदारी के चोगे से पनाले का मुंह ही बंद कर दिया। अब बताओ, दोनों तरफ से ठंड में मरूं नहीं तो क्या करूं।
मैंने कहा- आप नाहक चिंता करते हो, इस बार बेशक मफलर नहीं मिल रहे, अगली सर्दी में इन्हें कोई फ्री में भी नहीं लेगा।
काश, ऐसा हो जाए। भाप के साथ पप्पन के शब्द फूटे। मैंने चुटकी लेते हुए कहा- भईया, अभी तो ‘वो’ दिल्ली दूर है। गुजरात के स्याह आसमां पर उड़ने वाली केसरिया पतंगे, संसद के ऊपर भी उड़ेंगी। आपकी इच्छा पूरी हो जाएगी।
पप्पन बोले- अबे, अब इतना आसान नहीं है। झाड़ू उठ गया तो पतंग तो फटेगी ही, आसमान में भी छेद हो जाएगा। और अगर तबीयत से उछल गया, तो संसद की कुर्सियों पर आम आदमी की ही तशरीफ सबसे ज्यादा टिकी मिलेगी।
पप्पन बोले- अब तो नए मुहावरे पैदा हो रहे हैं। कल की ही बात है एक कह रहा था, क्यों बे, बड़ा केजरीवाल हो रहा है। मतलब कि ईमानदार बन रहा है। भईया, जो भी आम आदमी में घुस रहा है, ईमानदारी की ‘क्रीम’ पहले पोत लेता है।
मैं बोला- लाला, इन बड़े दलों को अब समझना चाहिए कि लोकतंत्र ने बदलाव की नई चाशनी को चखना शुरू कर दिया है। वह कभी नहीं चाहेगी इस चाशनी में भ्रष्टाचार की कोई मक्खी बैठे।
लाला बोले- गुरु यह तो है। अब तो अमेठी भी कान अमेठने लगी है। यही चिंता तो बहन को है, जो हाथ पर जीत की राखी बांधने को आतुर है। उधर अपने फेंकू की चाय भी ठंडियाने लगी है। पप्पन का बोलना जारी था- कहीं ऐसा न हो कि यूपी में भी झाड़ू फिर जाए।
मैंने कहा- यह तो ठीक है, लेकिन ध्यान रख- मफलर के बाद, गर्मियों में डील डौल वाली कमीजों के लाले पड़ जाएंगे। अब खास मत बन, बदलाव की इस बयार में तू आम हो जा। फिर आदमी तो तू है ही।
कमलदीप, पत्रकार व व्यंग्यकार हैं। कल्पतरू एक्सप्रेस से जुड़े हुए हैं।