बड़े पत्रकारों का कतरनी लेखन
बड़े पत्रकारों का कतरनी लेखन
मैं बड़े पत्रकारों के ज्ञान से बहुत परेशान हूं, चूंकि उनका ज्ञान सोशल मीडिया के पढ़े लिखे अनपढ़ों को प्रभावित करता है...
प्रिय रामबहादुर जी ,
लेकिन यथावत ( 1- 15 सितंबर ) में मनोज कुमार का आलेख शुद्ध बकवास है। जदयू वही कर रही है जो भाजपा कर रही है। दोनों – और भी कुछ लोग भावनात्मक झूठ का बाजार खोल कर नारों – बैनरों से पटना और बिहार को पाट रहे हैं।
इसी अंक में सुरेंद्र किशोर का भी आलेख छपा है। इस आलेख में उनके पुराने कतरनी लेखन के अलावा कुछ भी नहीं है। पर जब उनका कतरनी लेखन तथ्यों को भी गलत ढंग से पेश करता है तो मुझे तकलीफ होती है।
उन्होने लिखा है कि “ 1967 में जब बिहार में सरकार बनने लगी तो तो संसोपा के सांसद बीपी मंडल को भी मंत्री बना दिए गए। जब संसोपा के सर्वोच्च नेता डॉ. लोहिया को पता चला तो उन्होंने कहा कि जो जिस सदन के लिए चुना गया है, वह उसी सदन में काम करे। पर मंडल चाहते थे कि उन्हें एमएलसी बना दिया जाए, ताकि वह मंत्री बने रहें। पार्टी ने इसकी इजाजत नहीं दी। तब पार्टियां ऐसे सत्तालोलुपों से समझौता नहीं करती थीं। मंडल ने सीपीआई और जनसंघ तक के विधायकों से दलबदल करवा कर महामाया सरकार गिरा दी। डॉ लोहिया चाहते तो मंडल को खुश करके सरकार बचा सकते थे।“
अब कुछ तथ्यों को जान लीजिए। महामाया सरकार 5 मार्च 1967 को बनी थी। यह विधान सभा में गिरी 28 जनवरी 1968 को। लोहिया की मृत्यु अक्टूबर 1967 में हो चुकी थी। लोहिया की इच्छा के बावजूद बीपी मंडल 6 माह मंत्री बने रहे, यानी अगस्त 1967 तक। उस दौरान उन्होंने मंत्रीमंडल से इस्तीफा नहीं दिया।
क्या लोहिया की बात पर कर्पूरी ठाकुर उनसे मार्च या अप्रैल में इस्तीफा नहीं ले सकते थे ?
इन दिनों मैं बड़े पत्रकारों के ज्ञान से बहुत परेशान हूं, चूंकि उनका ज्ञान सोशल मीडिया के पढ़े लिखे अनपढ़ों को प्रभावित करता है, इसलिए मैं इसे भी फेसबुक पर चस्पां कर दे रहा हूं।
सविनय
जुगनू शारदेय


