बदलनी होगी महिलाओं के प्रति सोच
बदलनी होगी महिलाओं के प्रति सोच
मनोहर गौर
समाज बदल रहा है। उसकी सोच बदल रही है। समाज तरक्की भी कर रहा है, लगभग हर क्षेत्र में। इसी के साथ महिलाओं के साथ छेड़छाड़, हमले और अत्याचार की घटनाएं भी बढ़ रही हैं। रोज कहीं न कहीं से, किसी न किसी घटना की खबर आ जाती है। जाहिर है कि ये वे खबरें होती हैं जो पुलिस स्टेशन तक पहुँच जाती हैं और वहाँ से अखबार की सुर्खियाँ बनती हैं। लेकिन ऐसी दर्जनों घटनाएं होती हैं जो विभिन्न कारणों से पुलिस स्टेशन तक नहीं पहुँच पातीं और वहीं दफन हो कर रह जाती हैं।
महाराष्ट्र की उपराजधानी के शहर नागपुर में मंगलवार को बस में एक लड़की द्वारा छेड़छाड़ का विरोध करने पर उसे चलती बस से नीचे फेंक दिया गया। इतना ही नहीं, बस चालक के विरोध करने पर उसे भी चाकू मारकर घायल कर दिया गया। इसके बाद हमलावर भाग गये। वैसे तो, अक्सर लड़कियाँ छेड़छाड़ को सामान्य घटना मानकर चुपचाप सह जाती हैं। कुछेक घटनाओं में ही विरोध दर्ज हो पाता है। इस तरह की घटनाओं का सामूहिक विरोध भी नहीं हो पाता, जो आज सबसे अधिक जरूरी है। बस में दर्जनों यात्री सवार थे। युवा, बुजुर्ग, स्त्री-पुरुष सब, मगर छेड़छाड़ का विरोध करने, लड़की का साथ देने कोई आगे नहीं आया। अगर लड़की के साथ सभी लोगों ने इसका विरोध किया होता तो शायद बात इतनी आगे नहीं बढ़ती।
सामूहिक विरोध की घटना प्रवृत्ति
दरअसल समाज में सामूहिक विरोध की प्रवृत्ति तेजी से खत्म होती जा रही है। समाज आत्मकेन्द्रित होता जा रहा है। हम अब किसी भी मामले का विरोध सामूहिक रूप से नहीं कर पाते। माना जाता है कि जिसके साथ घटना हो रही है वही उससे निपटे, हमें क्या। इस हमें क्या, की बढ़ती प्रवृत्ति ने ही समाज में असामाजिक तत्वों के हौसले बढ़ाये हैं। समाज में अन्याय, अत्याचार बढ़ा है। इसमें सभी शामिल हैं। चाहे फिर वे कानून बनाने वाले हों, उसका पालन करने वाले या उसका शिकार बनने वाले आम लोग। जाहिर है कि यह प्रवृत्ति किसी भी समाज के लिये घातक है। लड़कियों के मामले में तो जब तक निर्भया जैसी कोई घटना न हो, लोग घरों से बाहर निकल ही नहीं पाते। यह सही है कि रोजी-रोटी की जद्दोजहद ने इंसान को अपने में ही सीमित करके रख दिया है। लोग बड़ी मुश्किल से घर से बाहर निकल पाते हैं। ऐसी घटनाओं के बढ़ने का एक कारण यह भी रहा है। पहले शाम को लोग बस्तियों, मोहल्लों के नुक्कड़ पर या गाँव की चौपाल पर बैठकर दुनिया-जहान की बातें करते थे। अपने सुख-दुख आपस में बाँटा करते थे। अब यह प्रवृत्ति एकदम खत्म हो गयी है और लोग तब तक घरों से बाहर नहीं निकल पाते जब तक कि बहुत अधिक जरूरी न हो।
छेड़छाड़ पर गम्भीरता नहीं
तमाम कानूनों और सख्ती के बावजूद महिलाओं के खिलाफ छेड़छाड़ और यौन अपराधों के मामले कम होने का नाम नहीं ले रहे हैं। निर्भया मामले के बाद बलात्कार को लेकर सख्त कानून की माँग उठी थी। सख्त कानून बना भी, मगर बलात्कार की घटनाएं थमी नहीं। अभी पिछले हफ्ते ही एक विदेशी महिला की इज्जत को उसी के कैब चालक ने तार-तार कर दिया। वह वाराणसी से शायद दिल्ली आ रही थी। अखबारों और न्यूज-चैनलों में खबरों के अलावा घटना पर कोई प्रतिक्रिया नहीं हुयी। ऐसी घटनाओं से अखबार रोज भरे होते हैं। जहाँ तक मामला छेड़छाड़ का है तो इसे अब भी गम्भीरता से नहीं लिया जाता। न तो पुलिस ऐसे मामलों को गम्भीरता से लेती है और न ही पीड़िता का परिवार। लोग हर मामले में थाने तक जाना भी पसन्द नहीं करते। वैसे भी समाज में पुलिस की जो छवि बन गयी है उसके चलते हर व्यक्ति जहाँ तक हो सके पुलिस से बचने का ही प्रयास करता है।


