बप्पा रे बप्पा येद्दियुरप्पा
बप्पा रे बप्पा येद्दियुरप्पा
सच यह है कि सारे पद पार्टी की कृपा से ही मिलते हैं । इसमें भी असली सच है कि पार्टी के नेता की कृपा से मिलता है
भारत में एक बड़ा महान पद हुआ करता है । इस महान पद का जलवा गजब का होता है । इसके पास अपना विशेषाधिकार होता है । अकसर इसका विशेषाधिकार इसकी पार्टी के पास होता है । पार्टी की कृपा से ही यह पद उसे मिलता है । यूं तो सच यह है कि सारे पद पार्टी की कृपा से ही मिलते हैं । इसमें भी असली सच है कि पार्टी के नेता की कृपा से मिलता है । माना यह जाता है कि जिस किसी व्यक्ति को यह पद मिलता है वह अपनी पार्टी से इस्तीफा दे देगा । उसका निष्पक्ष होना लोकतंत्र के लिए जरूरी माना जाता है । वह सब कुछ होता है लेकिन निष्पक्ष नहीं होता । अपनी पार्टी के प्रति समर्पित होता है । आखिर पद से मुक्ति के बाद पार्टी ही काम आती है । यह पद हैं अध्यक्ष ,विधान सभा और राज्यों के राज्यपाल । पहला पदधारी एक ही काम में काम का साबित होता है कि कैसे उसकी पार्टी की सरकार बचाई जाए । दूसरा एक ही काम जानता है कि राज्य सरकार उसकी पार्टी की नहीं हुई तो कैसे राज्य सरकार को हड़काया जाए । आखिर संवैधानिक पद जो ठहरा । कितनी ताकत है संविधान की , अगर इसे आप जानते और समझते हैं तो कुछ भी कर सकते हैं । गया वह जमाना कि जब लोग जगहंसाई से डरते थे । अब तो यह माना जाता है कि बदनाम हुए तो क्या हुआ नाम तो हुआ । आजकल इस खेल के गोल्ड मेडल विजेता हैं कर्नाटक के मुख्य मंत्री बप्पा रे बप्पा येद्दियुरप्पा । हालांकि उनका पद संवैधानिक नहीं है � राजनीतिक है । लेकिन पूर्व कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज और कर्नाटक विधान सभा के अध्यक्ष � के जी बपैय्या का पद संवैधानिक है । पद का पता तभी चलता है जब पद का सद्उपयोग किया जाता है । यह सद्उपयोग कुछ भी नहीं होता । एक की आंख से दुरुपयोग होता है तो दूसरे की नजर से सिर्फ उपयोग होता है । उपयोग क्या है या तो सद्उपयोग का दुरुपयोग है या जिसकी लाठी उसकी भैंस होता है । 11 अक्तूबर को इसी फारमूले के तहत कर्नाटक विधान में सरकार जीत गई । विधान सभा अध्यक्ष ने राज्यपाल की चेतावनी को नहीं माना कि विधान सभा में 6 अक्तूबर की स्थिति में बदलाव न लाएं । पर विधान सभा अध्यक्ष भी संवैधानिक हैं । उन्होने 11 अक्तूबर के पहले 16 विधायकों को सदन की कार्यवाही से अयोग्य घोषित कर दिया । हिसाब बराबर । इनमें से 11 भाजपा के विधायक थे और 5 निर्दल । बस येद्दियुरप्पा को बहुमत मिलना ही था मिल गया । । राज्यपाल ने राष्ट्रपति शासन की सिफारिश कर दी । फिर कहा कि 14 अक्तूबर को दुबारा विश्वास मत हासिल करो । इसे कहते हैं लोकतंत्र । कभी कर्नाटक के कारण ही अदालती फैसला आया था कि विधान सभा ही तय करेगा सरकार का बहुमत । विधान सभा ने कर दिया । अब दुबारा भी कहेंगे तो कर देंगे । आखिर विधान सभा क्या है संविधान का बप्पा रे बप्पा येद्दियुरप्पा !


