बहन जी के खिलाफ गुस्सा क्यों नहीं है?
बहन जी के खिलाफ गुस्सा क्यों नहीं है?
अमलेन्दु उपाध्याय
उत्तर प्रदेश में विधान सभा चुनाव अब नजदीक ही हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की तरफ से ही आगामी चुनाव का रिहर्सल शुरू हो चुका है। आरोप प्रत्यारोप का नया दौर पूरे शबाव पर है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से प्रदेश में बढ़ते अपराधों पर न तो मीडिया में आज से चार और पांच साल पहले जैसी बेचैनी है और न जनता में ही इन अपराधों के प्रति वैसा गुस्सा देखने को मिल रहा है जैसा पूर्ववर्ती मुलायम सरकार के दौरान देखने को मिला करता था। हालांकि जो माफिया और अपराधी मुलायम सरकार की बदनामी का कारण बने थे वे सारे के सारे मायावती के साथ खड़े हैं और उनके कारनामे वही हैं जो आज से चार और पांच साल पहले थे। बल्कि ईमानदारी से कहा जाए तो प्रदेश के सारे माफियाओं की रानी आजकल बहन मायावती हैं और उनका कौशल है कि वर्षों पूर्वांचल की धरती को रक्त रंजित करने वाले माफिया मुख्तार अंसारी और ब्रजेश सिंह दोनों उनके बगलगीर थे। इसी तरह जिन धनंजय सिंह को मायावती ने पिछली सरकार में जेल भिजवाया था वो अब बहन जी के कारवां की शोभा बढ़ा रहे हैं।
प्रदेश में लगातार बलात्कार बढ़ रहे हैं और बहन जी के खास सिपहसालारों पर बलात्कार और हत्या के आरोप लग रहे हैं। संभवतः यह हिन्दुस्तान की पहली और इकलौती ऐसी राज्य सरकार है जिसके एक दर्जन से ज्यादा विधायकों और मंत्रियों पर दुराचार के आरोप हैं। इसके बावजूद ऐसी खबरें दो चार दिन सुर्खियों में रहने के बाद़ गायब हो जाती हैं। इसके पीछे हमारे मीडिया की भी अहम भूमिका है।
पहले तो हमारे मीडिया के लोग अभी भी कांशीराम के थप्पड़ की मार से उबरे नहीं हैं। बहन जी के खिलाफ आक्रामक होते ही उन्हें यह थप्पड़ याद आने लगता है और फिर उनकी आवाज खुद-ब-खुद मद्धिम पड़ जाती है। दूसरे एक और अहम कारण है कि मीडिया में अधिकांश महत्वपूर्ण स्थानों पर ब्राह्मण काबिज हैं और यह वे लोग हैं जिन्होंने 2007 के विधान सभा चुनाव से पहले बाकायदा एक मुहिम बहन जी के पक्ष में और मुलायम सिंह के विरोध में चलाई थी। याद है एक बड़े अखबार के एक ब्राह्मण राजनीतिक संपादक ने तो मायावती की जीत के बाद इसे 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बराबर बड़ी क्रांतिकारी घटना कह दिया था। अब इस तबके के सामने दोहरा संकट है। पहला तो यही कि किस तरह वे अब मायावती सरकार के कुकर्मों के खिलाफ खुलकर बोलें जिन्होंने मायावती की जीत को 1857 से बड़ी क्रांति कहा था। दूसरा अगर बोलते हैं तो इसका फायदा प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी या कांग्रेस को नहीं मिलेगा बल्कि इसका सीधा फायदा मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी को मिलेगा। जो यह भद्रजन नहीं चाहते।
मामला साफ है कि राम मंदिर के पक्ष में उच्च न्यायालय का विवादास्पद फैसला आ जाने के बावजूद न तो भाजपा अभी उत्तर प्रदेश में अपने पैरों पर खड़ी हो पाई है और न कांग्रेसी युवराज का जादू कांग्रेस को यहां जिन्दा कर पा रहा है। इसलिए अगर मायावती सरकार के खिलाफ कोई रिएक्शन पैदा होता है तो उसका सीधा फायदा स्वाभाविक तौर पर मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी को होगा क्योंकि पिछले साढ़े तीन साल में मायावती सरकार की कारगुजारियों के खिलाफ सपा ही सड़कों पर उतरी है। भले ही यह उसकी मजबूरी रही हो, क्योंकि मायावती ने दुर्भावनावश जुल्म भी उसके कार्यकर्ताओं पर किए। इसके बावजूद अगर बसपा के सताए लोगों को कोई अपना हमदर्द दिखाई पड़ता है तो वह समाजवादी पार्टी ही है। इसलिए हमारे मीडिया के शहंशाह मायावती के खिलाफ बोलते तो हैं लेकिन उतना ही जितना उनकी टीआरपी के लिए जरूरी होता है, लेकिन उस तरह मायावती के खिलाफ मुहिम नहीं चलाते जैसी मुलायम सिंह के खिलाफ चलाते थे।
दूसरी तरफ अगर जनता में मायावती के खिलाफ वैसा गुस्सा नहीं पनप रहा जैसा चार साल पहले मुलायम सिंह की सरकार के खिलाफ पनपा था तो उसका भी कारण साफ है। मुलायम सिंह के कार्यकाल में आम जनता में रोष का प्रमुख कारण उनकी जाति रही। पूरे प्रदेश में छांट-छांट कर यादव दरोगा तैनात किए गए जिन्होंने अपने जुल्मों से मुलायम सरकार की खूब किरकिरी कराई। उस दौरान शायद ही कोई यादव दरोगा रहा हो जो थानाध्यक्ष न बना हो। इसके अलावा जितने भी महत्वपूर्ण पद थे उन पर यादव अधिकारियों की तैनाती की गई और जब जनता इन अफसरों के द्वारा सताई गई तब उसका स्वाभाविक रोष मुलायम सिंह के खिलाफ जागा।
इसी तरह हर जिले में एक मिनी मुख्यमंत्री का रुतबा हासिल सपा नेता खूब स्याह सफेद करता रहता था और मुलायम सिंह कन्या विद्या धन और बेरोजगारी भत्ता बांटते रहते थे। बलिया से लेकर गाजियाबाद तक और झांसी से लेकर बरेली तक हर जिले में किसी न किसी यादव मिनी मुख्यमंत्री का आतंक था। बलिया में अंबिका चौधरी, आजमगढ़ में बलराम यादव, गोरखपुर में जयप्रकाश यादव, झांसी में दीपक यादव, एटा में रामेश्वर यादव, बदायूं में बनवारी सिंह यादव, फिरोजाबाद में हरिओम यादव और रामवीर यादव, बरेली में वीरपाल सिंह यादव, गाजियाबाद में जितेन्द्र यादव ऐसे ही प्रतापी मिनी मुख्यमंत्री थे। लिहाजा इन मिनी मुख्यमंत्रियों के खिलाफ जनता का गुस्सा मुलायम सरकार के खिलाफ गुस्से में तब्दील हुआ।
ऐसा नहीं है कि मायावती के शासनकाल में ऐसे मिनी मुख्यमंत्री नहीं हैं। लेकिन मायावती ने सिर्फ अपनी जाति के ही मिनी मुख्यमंत्री पैदा नहीं किए बल्कि इन्हें कई जातियों में बांटा। मसलन नसीमउद्दीन सिद्दीकी, बाबू सिंह कुशवाहा, अवधपाल यादव, मुनकाद अली, रामचन्द्र प्रधान, नकुल दुबे, नरेन्द्र कश्यप, स्वामी प्रसाद मौर्या, जयवीर सिंह, आनन्द सेन, नन्दगोपाल नन्दी जैसे मिनी मुख्यमंत्री मायावती की जाति के नहीं हैं। लिहाजा न तो मायावती की बिरादरी के लोग उस तरह से बौराए जैसे मुलायम सिंह के शासन काल में साइकिल पर भी ‘यादव मेल’ लिखाकर आदमी बौरा जाता था। इसलिए जैसा गुस्सा मायावती सरकार के खिलाफ लोगों में जगना चाहिए था वैसा नहीं जगा।
यहां यह भी ध्यान देने की बात है कि मायावती ने जो लूट का अपना तंत्र विकसित किया है वह उनका निजी लूटतंत्र है, उसका उन्होंने अपनी जाति के लिए सामान्यीकरण नहीं किया। जबकि मुलायम सरकार में यह एक जाति विशेष का लूटतंत्र था। अकेले गाजियाबाद जिले में, जो प्रदेश का सर्वाधिक मलाईदार जिला माना जाता है, मुलायम सरकार में सारे महत्वपूर्ण पदों पर अधिकारी यादव थे। इसलिए भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ जनता का गुस्सा एक जाति विशेष के खिलाफ गुस्से में तब्दील हो गया।
यही कारण हैं कि प्रदेश में बढ़ते अपराध, भ्रष्टाचार और लालफीताशाही के बावजूद जनता में वैसा गुस्सा नहीं देखा जा रहा जो होना चाहिए था।


