बहुत कुछ कहती हैं शंभू यादव की कवितायें
बहुत कुछ कहती हैं शंभू यादव की कवितायें
राम जी तिवारी
दखल प्रकाशन से कवि-मित्र शंभू यादव का कविता संकलन ‘एक नया आख्यान’ आया है। यह उनका पहला संकलन है और इसमें कुल 55 कवितायें हैं, जो पिछले दो दशकों में लिखी गयी हैं। ‘प्रतिरोध’ के मूल स्वर को समेटे इन कविताओं में, उपर से देखने पर एक अजीब तरह का ‘खुरदुरापन’ और कभी-कभी तो भाषा के स्तर पर ‘अनगढ़पन’ भी दिखाई देता है, लेकिन जैसे ही आप इनके भीतर प्रवेश करते हैं आपको यह स्वर अपना लगने लगता है, भाने लगता है और यही इनकी असली ताकत है।
बतौर पाठक मेरे मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि हम कविताओं में क्या पढ़ना चाहते हैं और जितनी बार मुझे उत्तर मिलता है उतनी बार वह वह मुझे अपने समय और समाज की तरफ ही ले जाता है। संवेदनाओं और कथ्यों की तरफ ही ले जाता है। वह कभी भी भाषा और शिल्प के स्तर पर सिमटता नहीं है। यह अलग बात है कि इसके द्वारा अपनी कविताओं को चमकाया जा सकता है, उन्हें सजाया – सँवारा जा सकता है, लेकिन बात तो अंततः वहीं पहुँचती है जिसमें कुछ कहने और सोचने के लिये होता है। तो, मेरे लिये इनका महत्व इतना ही है कि इनसे ‘विधा’ का निर्वाह हो जाये। यह कत्तई नहीं कि इनकी आड़ में बिना किसी बात के भी कविता लिख दी जाये।
शंभू की कवितायें इन्ही अर्थों में मुझे अपने दिल के करीब लगती हैं। बिल्कुल उस अफ्रीकी सिनेमा की तरह जिसके पास कहने के लिये बहुत कुछ है। उस अमेरीकी सिनेमा की तरह नहीं, जिसके पास सिर्फ बात और पैसा बनाने के लिये सिनेमा है। यदि आप कविता में बहुत सफाई चाहते हैं और वह आपके लिये एक जादू दिखाने की चीज है, तो आपके लिए यह संग्रह नहीं है, जैसा कि शंभू यादव अपनी एक कविता ( ‘कविता में जादू और सजग मैं’ ) में कहते भी हैं। लेकिन यदि आप अपने समय और समाज को करीब से देखना-समझना चाहते हैं, अपने चेहरे की सुन्दरता या भयावहता को परखना चाहते हैं, तो यह संग्रह एक आईना लेकर आपके सामने खड़ा दिखायी देता है। मुझे ख़ुशी है, कि आज भी ऐसी कवितायें लिखी जा रही हैं, और आज भी ऐसे संग्रह प्रकाशित किये जा रहे हैं।
तो बधाई मित्र ‘शंभू’ आपको इस ‘तेवर’ और ‘कहन’ के लिये। उम्मीद करता हूँ कि यह आगे भी बरकरार रहेगा।


