#Intellectuals, #war , #terror, #AAP, #parliamentary, #Left, #Communist, #Revolution, #1क्या वास्तव में ये निराशा का दौर है ? क्या भारत में कम्युनिस्ट क्रांति असम्भव है ?
रूपेश कुमार सिंह

"क्रांति कोई दावत नहीं, नुमाइश नहीं/ मैदान में बहता दरिया नहीं/ वर्गों का, रुचियों का दरिन्‍दाना भिड़ना है/ मरना है, मारना है. और मौत को खत्‍म करना है।"

क्रान्तिकारी कवि अवतार सिंह पाश के कविता की इन पंक्तियों का महत्व आज के दौर में और भी बढ़ गया है, आज जब मध्यम वर्गीय बुद्धिजीवियों के द्वारा कहा जा रहा है कि भारत ही नहीं पुरे विश्व में कम्युनिस्ट अन्दोलन वैचारिक विभ्रम का शिकार हो गया है ! सोवियत संघ और चीन का उदाहरण देकर ये समझाया जा रहा है कि भारत में कम्युनिस्ट क्रांति असम्भव है और क्रांति की लफ्फाजी करने वाली पार्टी से जुडे कुछ बुद्धिजीवियों के दक्षिँपंथी पलायन को कम्युनिस्ट पार्टी की असफलता से जोडकर देखा जा रहा है, तो प्रश्न उठता है कि क्या वास्तव में ये निराशा का दौर है ? क्या भारत में कम्युनिस्ट क्रांति असम्भव है ?

अगर हम देश की जनता की भयावहता को देखें, तो पता चलता है कि वास्तव में हम एक भयावह दौर से गुजर रहे हैं। अंधाधुंध उदारीकरण, निजीकरण और भूमंडलीकरण की अर्थिक नीतियों को लगातार दो दशकों तक निर्बाध लागू किये जाने के फलस्वरूप भारत एक गहरे अर्थिक संकट में फँस गया है। कृषि एवम् मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र गहरे ठहराव में फँसे हैं और बहुचर्चित सेवा क्षेत्र में भी वृद्धि की गति मंद पड़ने लगी है। भारत में पिछले 8 वार्षिक बजट में कॉर्पोरेट सेक्टर को दी गयी छूट की कुल राशि 5000 अरब रुपए लगभग है, यह भी सुविदित है कि कॉर्पोरेट सेक्टर ही भारतीय सार्वजानिक क्षेत्र के बैंकों का सबसे बड़ा कर्जदार है।
कॉर्पोरेट क्षेत्र को राज्य का संरक्षण अथवा कॉर्पोरेट लूट में राज्य की साँठ-गाँठ और सहभागिता घोर कॉर्पोरेट परस्त कानूनों का निर्माण कर रही है। भारतीय राजसत्ता का वर्तमान राष्ट्रीय सुरक्षा सिद्धान्त और कुछ नहीं बल्कि उसी अमरीकी सिद्धान्त का भारत में विस्तार है, जिसके तहत दुनिया पर प्रभुत्व कायम करने की रणनीति को "राष्ट्रीय सुरक्षा" के पीछे और इस्लाम विरोध को "आतंक के खिलाफ युद्ध" के परदे में ढँक कर पेश किया जा रहा है। "कठोर राज्य" का सिद्धांत- जो भारत में वस्तुतः पुलिस राज्य बना देने का ही दूसरा लुभावना नाम है, जिसमें नागरिक प्रशासन में सेना का हस्तक्षेप क्रमशः बढ़ता जा रहा है, इस सिद्धांत को लेकर तमाम बुर्जुआ राजनीतिक पार्टियों से लेकर संसदीय वामपंथी पार्टियों आपसी के बीच सहमति है। आदिवासियों को उनके जल-जंगल-जमीन से बेदखल किया जा रहा है, ताकि इन्हें कॉर्पोरेट को सौंपा जा सके! भ्रष्टाचार और महँगाई के बोझ तले देश की जनता कराह रही है!
जब शासक वर्ग देश को सर्व व्यापी संकट में धकेल रहा है और आम आदमी की जीविका और अधिकारों के खिलाफ वस्तुतः युद्ध की घोषणा कर चुका है, तब हर जगह जनता, सरकार और उनकी नीतियों के खिलाफ सड़क पर उतर रही है और आदिवासी भी अपनी जल-जंगल-जमीन को बचाने के लिये बहादुराना संघर्ष कर रहे हैं। सरकार की नीतियों से उच्च वर्ग को छोड़कर तमाम वर्गों में आक्रोश घनीभूत हो रहा है, जिस आक्रोश का विस्फोट भी कई रूप में सामने आयी है। और इस आक्रोश को दबाने के लिये एक तरफ तो भारतीय राजसत्ता पोटा, यूएपीए, एएफएसपीए, मकोका और ऑपरेशन ग्रीन हंट जैसे काले कानूनों और बर्बर अभियानों का इस्तेमाल कर रही है, तो वहीं, दूसरी तरफ, लोक-लुभावन नारे के साथ नये चेहरे को भी सामने लाया जा रहा है। आज जबकि भारत के इतिहास की घोटालों से सर्वाधिक कलंकित सरकार की कर्णधार काँग्रेस लगातार अपनी जमीन खोती जा रही है, तो वहीं, भाजपा फिर से अपनी सम्प्रदायिक छवि को मोदी के नेतृत्व में पेश करने की भरपूर कोशिश कर रही है। भ्रष्ट काँग्रेस और साम्प्रदायिक भाजपा के बीच में इस बार कॉर्पोरेट की नजर "आप" पर है, जिसकी कोई आर्थिक नीति नहीं है, कहा जाये तो, लोकतंत्र से विश्वास खोती जनता पर फिर से विश्वास दिलाने का ये आखिरी दाँव भारतीय शासक वर्ग ने "आप" पर लगाया है और इसमें वैसे लोग शामिल हो रहे हैं, जो कि कम्युनिस्ट पार्टियों में विश्वास ना होने के बावजूद भी घिसट रहे थे या फिर अपना प्रगतिशील चेहरा बचाने के लिये ही थे या फिर वो खाये-पिये-अघाये लोग शामिल हो रहे हैं, जो कि, जिंदगी में सत्ता क़ी मलाई भी चख लेना चाहता है। शासक वर्गों क़ी इस चाल को ना समझते हुये मध्यम वर्गीय बुद्धिजीवी, इसे कम्युनिस्ट आंदोलन क़ी हार के रूप में परिभाषित कर रहे हैं, इस लिये कम्युनिस्ट आंदोलन क़ी सही धारा को स्थापित करने क़ी चुनौती आज हमारे सामने है।
रूपेश कुमार सिंह, सोशल एक्टिविस्ट हैं