सुनील दत्ता
"काहे को रोये/ सफल होगी तेरी अराधना/ दिया टूटे तो ये है माटी/ जले तो ये ज्योति बने/

एक ऐसे सुर साधक व संगीत का चमकता ध्रुव तारा आकाश में पूर्णिमा के चाँद के साथ एक ही बार चमकता है। त्रिपुरा के शाही घराने में चमका वो तारा सचिन देव बर्मन के रूप में।

सचिन दा का बचपन खेतों में लहलहाते सतरंगी आभा से सुनहले चमकते रंगों के बीच गेहूँ और धान की बालियों में गुजरता हुआ बढ़ता जा रहा था। साथ ही गाँव के हम उम्र बच्चों के साथ धूल और मिट्टी में जब भी खेलने जाते तो उनके कानो में गाँव के एक बूढ़े किसान के गाने की आवाज आती और वे खेल में ही उस गीत से अनायास जुड़ जाते। उस बूढ़े बाबा किसान के गाये गीत सचिन दा में रच बस गये थे और वो अपने जीवन के बसंत पार करते हुये भी उस गीत को न भूल पाये। ...और वो गीत सचिन दा के साथ ही उनके जीवन का प्रवाह बन गया और उनके अन्दर के संगीत के सात सुरों की लय को जगा दिया। इसके साथ ही वो इस संगीत के महासागर में आ गये। इन्हीं मार्मिक सुरों की छाँव में महान संगीतकार सचिन देव बर्मन ने संगीत की दुनिया में कदम रखा। एक अक्तूबर सन् 1906 में जन्मे कुमार सचिन देव बर्मन के दादा त्रिपुरा के महाराजा थे। उनके पिता एक कुशल चित्रकार, कहानीकार, रंग शिल्पी, के साथ शात्रीय संगीत के ख्याति लब्ध संगीतज्ञ थे। शास्त्रीय संगीत की पहली तालीम सचिन दा ने अपने पिता से प्राप्त की। सचिन दा ने लोक संगीत की विधा को अपने महल में रहने वाले दो मुलाजिमों से हासिल किया जिनके नाम माधव् और अनवर थे। बचपन से ही बर्मन दा को बंगाल के मधुर लोक संगीत से गहरा लगाव था जिसकी झलक उनके गाये गीतों में साफ़ नजर आती है। "ओरे माझी/ मेरे साजन हैं उस पार/ मैं मन मार हूँ इस पार/ ओ मेरे माझी अबकी बार/ ले चल पार मेरे साजन है उस पार"सचिन दा ने इस गीत के माध्यम से उस सुहागन नारी के अन्तर मन की व्यथा को अपने स्वर से ऐसा सहेजा है कि लगता है ये व्यथा स्वयं सचिन दा का हो और वो उसमें डूब गये हैं। लहरों से जूझते माझी की पुकार ने सचिन दा की आत्मा पर गहरा असर किया। नतीजा आज भी जब सचिन दा की आवाज आती है तो दिल को छू लेने वाली पुकार की तरह गूँजती है। पिता से शिक्षा प्राप्त करने के बाद सचिन दा ने कलकत्ता में उच्च शिक्षा में दाखिला लिया। सचिन दा के पिता चाहते थे कि दादा वकील बनें पर सचिन दादा विदेश में पढ़े और वकील बने। पर सचिन दादा का पूरा मन सुरों के सत-रंगी जाल में फँस चुका था। लिहाजा वो के सी डे के शागिर्द बन गये और इसके साथ ही रेडियो के लिये गीत गाने लगे। 1932 में उनकी मदभरी आवाज को पहली बार रिकॉर्ड में सुनाई दिया धीरे-धीरे इस आवाज का नशा लोगों के जेहन में बसता गया। सचिन दादा लोक संगीत और शास्त्रीय संगीत गायक के रूप में लोकप्रिय होते चले गये। इसी दौरान उन्हें सौभाग्य से उस्ताद फैयाज खान, अलाउद्दीन खान

और अब्दुल करीम खान, जैसे शास्त्रीय सुर स्तम्भों की सोहबत मिल गयी। उसके कुछ दिनों बाद बंगला फिल्म में अपने आवाज का हुनर दिखाने का मौक़ा फिल्म "बंदनी" से मिला जिसके संगीतकार व मशहूर कवि क्रांतिकारी काजी नजरुल इस्लाम के निर्देशन में गीत गाया। "जैसी राधा ने माला जपी श्याम की" ठीक वैसे ही उनकी संगिनी ने जपी उनके लिये। 1938 में उनकी शागिर्द मीरा दास गुप्ता सचिन दादा के जीवन में प्रवेश की मीरा दास की अहम भूमिका रही सचिन दा के जीवन में उनके संगीत निर्देशन में गीत गया और सहायक संगीत निर्देशिका के रूप में सहयोग करना। 1939 में इस सुर संगम के मिलाप से राहुल प्राप्त हुये। राहुल देव बर्मन स्वयं बड़े संगीतकार थे। इसी दरमियाँ सचिन दादा ने अपने संगीत का दायरा बढ़ाया और हिन्दी गीतों में कदम रखा। " प्रेम का पुजारी हम है रस के भिखारी हम हैं प्रेम के पुजारी " तारो भरी रात थी अपनी गली आबाद थी बचपन की भोली बात थी पहली — पहली मुलाक़ात थी "" "वो न आये फलक , उन्हें लाख हम बुलाये मेरे हसरतो से कह दो , कि वे ख़्वाब भूल जाये " " याद करोगे याद करोगे एक दिन हमको यद् करोगे तड़पोगे पर याद करोगे " " चल री सजनी अब क्या सोचे कजरा न बह जाये रोते रोते " " सुन मोरे बन्धु रे सुन मोरे मितवा सुन मोरे साथी रे होता सुखी पल मैं तू अमरलता तेरी तेरे गले माला बन के पड़ी मुस्काती रे " सचिनदा के गाये गीत जीवन के यथार्थ और संवेदन शीलता के चिर को दर्शाता है। जब सचिन दादा माँ की व्याख्या करते है अपने सुरों से " मेरी दुनिया है माँ तेरे आँचल में शीतल छाया तू दुःख के जंगल में मेरी राहो के दीये तेरी दो अंखिया गीता से बड़ी तेरी दो बतिया " तो सचिन दा सम्पूर्ण नारी जगत के उन सारे संवेदनाओ को उकेरते हैं/ आज के ही दिन यह निराला सुर साधक अपने अनन्त यात्रा पे चला गया और छोड़ गया अपना स्वर यह कहते हुये " बिछड़े सभी बारी- बारी अरे देखे जमाने की यारी क्या लेके मिले अब दुनिया से आँसू के सिवा कुछ पास नही यहाँ फूल — फूल थे दामन में यहाँ काटो की भी आस नही मतलब की दुनिया है सारी बिछड़े सभी बारी- बारी........ ऐसे महान संगीत सुर साधक को उनकी पुण्य तिथि पर शत शत नमन